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the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

जमनालाल बजाज एवं महात्मा गांधी तथा अन्य

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर, प्राध्यापक, सम्पादक एवं भाषाविद्‍

गॉंधी अन्तर्राष्ट्रीय शोध संस्थान, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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जमनालाल बजाज एवं महात्मा गांधी तथा अन्य

महात्मा गांधी- सन्‍ 1920 में एक तीस वर्षीय नवयुवक आया और कहने लगा, मैं आपके पास कुछ मांगने आया हूं.

मांगों, जो मांगना है दूंगा, बशर्ते वह मेरे सामर्थ्य के बाहर न हो

मुझे आप अपने पुत्र देवदास की तरह मानें, उस नवयुवक ने कहा.

मुझे मंजूर है, पर इस सारी घटना में तुम्हारी स्थिति याचक जैसी नहीं हुर्इ, दाता मिलाकर तुम्हीं हुए.

वह नवयुवक जमनालाल बजाज थे.

सन्‌ 1942 में गांधीजी ने हरिजन में लिखा कि जमनालाल और मेरे सम्बंधों की घनिष्ठता तुम जानते ही हो. मेरा कोर्इ भी ऐसा काम नहीं था, जिसमें उसने मुझे तन मन से सहयोग न दिया हो.

महात्मा गांधी के सम्पर्क में आने से पहले ही वह लोकमान्य की देश भक्ति से प्रभावित थे, स्वराज्य मेरा जन्म सिद्ध अधिकार है, और मैं उसे लेकर रहूंगा, यह उनकी अंतरात्मा तक उतरा था. उनके द्वारा सम्पादित हिन्दी संस्करण के लिए उन्होंने सौ रुपये चंदा भी भेजा था.

सरदार वल्लभार्इ- बापू ने अपना सच्चा पुत्र खो दिया, जानकी देवी और उनके परिवार ने छाया, देश ने सच्चा कर्मयोगी, कांग्रेस ने सुदृढ स्तम्भ, गोमाता ने अपना सच्चा हितू, अनेक संस्थाओं ने अपना संरक्षक और हम सबने अपना सगा भार्इ खो दिया.

मैं नहीं मानता कि कोर्इ भारत में आपके जितना अतिथि सत्कार का बोझ उठा सकता है. यदि कोर्इ इतना बोझ उठाने को तैयार हो जाये तो भी आपकी तरह सारा कुटुम्ब उसके अनुकूल तो नहीं हो सकेगा.

जमनालाल बजाज- बापू मेरे आदर्श हैं. मेरे लिए दिशासूचक ध्रुव तारे की तरह हैं और वह मेरे पिता हैं. मैं निष्ठापूर्वक उनके आदेशों का पालन करता हूं. उनका प्रेम ही मेरा जीवन है.

जयपुर जिले के एक छोटे से गांव काशी का वास में गरीब कनीराम किसान यहां जन्में जमनालाल बजाज, वर्धा के एक बडे सेठ बच्छराज के यहां पांच वर्ष की आयु में गोद लिये गये थे. सेठ वच्छराज सीकर के रहने वाले थे. उनके पूर्वज सवा सौ साल पहले नागपुर में आकर बस गये थे. विलासिता और ऐश्वर्य का वातावरण इस बालक को दूषित नहीं कर पाया, क्‍योंकि उनका झुकाव तो बचपन से अध्यात्म की ओर था.

मैं गोद क प्रथा को उस समय भी पसंद नही करता था. मुझे याद है कि मुझे अपने जन्म के माता-पिता से भी बहुत अर्से तक इस बात की शिकायत रही कि उन्होंने मुझे गोद दे दिया. मेरी इच्छा के विरूद्ध भी पिताजी के प्रति अंत तक यह भाव थोडा बहुत बना रहा. हांलाकि मैं तो सब तरह से सुखी गोंद में दिया गया था.

जमनालाल की सगार्इ दस वर्ष की अवस्था में हो गयी थी. तीन वर्ष बाद जब जमनालाल 13 वर्ष के हुए तथा जानकी 9 वर्ष की हुर्इं, तो उनका विवाह धूमधाम से वर्धा में हुआ.

उन्होंने खादी और स्वदेशी अपनाया और अपने वेशकीमती वस्त्रों की होली जलार्इ. जमनालाल जी ने अपने बच्चों को किसी फैशनेबल पब्लिक स्कूल में नही भेजा, बल्कि उन्हें स्वेच्छापूर्वक वर्धा में आरम्भ किये गये विनोबा के सत्याग्रह आश्रम में भेजा.

1922 में अपनी पत्नी को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा कि मैं हमेशा से यही सोचता आया हूं कि तुम और हमारे बच्चे मेरे ही कारण किसी प्रकार की प्रतिष्ठा अथवा पद प्राप्त न करें. यदि कोर्इ प्रतिष्ठा अथवा पद प्राप्त हो, तो वह अपनी-अपनी योग्यता के बल पर हो. यह मेरे, तुम्हारे, उनके सबके हित में है.

अखिल भारतीय कोषाध्यक्ष की हैसियत से खादी के उत्पादन और उसकी बिक्री बढाने के विचार से देश के दूर-दराज भागों का दौरा किया, ताकि अर्धबेरोजगारों को फायदा पहुंच सके. 1935 में गांधी जी ने अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ की स्थापना की. इस नये संघ के लिए जमनालाल बजाज ने बडी खुशी से अपना विशाल बगीचा सौंप दिया. जिसका नाम गांधी ने जी स्वर्गीय मगनलाल गांधी के नाम पर मगनाडी रखा. 1936 में अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन नागपुर के बाद तुरंत ही जमनालाल जी ने वर्धा में देश के पश्चिम और पूर्व के प्रांतों में हिंदी प्रचार के लिए, राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की स्थापना की, तथा उसके लिए राशि इकट्ठा की. इसके कुछ ही समय बाद वह हिन्दी साहित्य सम्मेलन मद्रास के अध्यक्ष चुने गये. अपने इस पद का उपयोग उन्होंने राष्ट्रभाषा आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में किया. जमनालाल जी इसके अतिरिक्‍त मन, प्राण से हिन्दू मुस्लिम एकता और अछूतोद्धार के काम में जुट गये. वास्तव में वे देश के प्रथम नेता था, जिन्होंने वर्धा में अपने पूर्वजों के लक्ष्मीनारायण मंदिर के द्वार 1928 में ही अछूतों के लिए खोल दिये थे.

जवाहरलाल नेहरु- हममें से ज्यादातर लोग तो एक-दूसरे जैसे थे और इसलिए हम लोगों में से किसी के बिना भी काम चल सकता था. यानी हमारी जगह कोर्इ दूसरा भी ले सकता था. मगर यह कह सकते हैं कि जमनालाल जी अपने ढंग के निराले व्यक्ति थे. उनके ढंग के बहुत लोग आंदोलन में नहीं थे, जो वैसी निष्ठा लेकर आये हों, और उसे आंदोलन में प्रतिष्ठित किया हो. हम इसलिए उनकी ज्यादा इज्जत करते थे. उनकी अचल निष्ठा और र्इमानदारी ने उन्हें हम सबके निकट आत्मीय बना दिया था.

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद- जमनालाल जी केवल व्यापारी समाज के प्रतिनिधि नही थे, उन्होंने अपनी त्याग की भावना, देशभक्ति तथा सत्य के प्रति अटलता के बल पर समाज के सभी वर्गों का विश्वास और स्नेह प्राप्त किया था.

उनमें अद्वितीय व्यवहारिक क्षमता थी, जिसके कारण वह कठिन से कठिन मसले पर भी आसानी से निर्णय ले लेते थे. विशेषकर लोक संस्थाओं की सम्पत्ति या राशि के बारे में उनकी यह प्रतिभा और भी विलक्षण हो जाती है. वह इस बात पर जोर देते है कि जनता द्वारा इकट्ठा किया गया पैसा ठीक से खर्च होना चाहिए. उसका ठीक-ठीक हिसाब होना चाहिए. वह लाख रुपये का दान सहर्ष कर देते हैं, पर एक भी पार्इ की फिजूलखर्ची उन्हें पसंद नहीं है.

श्री मन्नारायण- उनका सबसे बडा गुण जो कहीं और मिलना असम्भव है, यह था कि वह कार्यकर्ताओं को चुन-चुन कर जहां-तहां से पूर्व निश्चित किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए और विभिन्न रचनात्मक संस्थाओं के लिए तैया कर लेते थे.

जमनालाल की इच्छा वर्धा को भारत का हृदय स्थल बनाने की इच्छा थी. इसलिए उन्होंने महात्मा गांधी से विनोबा भावे को साबरमती आश्रम से बुला लेने की प्रार्थना की और आग्रह किया कि वे आकर वर्धा में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना करें. तद्नुसार विनोबा जी सन्‍ 1921 में वर्धा आये और बजाजवाडी के छप्पर में यह संस्था प्रारम्भ कर दी. यह सत्याग्रह आश्रम कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित करने का केन्द्र बना. जमनालाल जी ने सबसे पहले अपने ज्येष्ठ पुत्र कमलनयन एवं भतीजे राधाकृष्ण बजाज को भेजा. वहां उन्होंने अन्य आश्रमवासियों की तरह कठोर जीवन व्यतीत किया.

महात्मा गांधी ने 1930 में दांडी सत्याग्रह के समय सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा की थी कि स्वराज्य प्राप्ति होने तक वह साबरमती आश्रम नहीं जायेंगे. जमनालाल जी ने इसे स्वर्ण अवसर मानकर गांधी जी को वर्धा आने के लिए आमंत्रित किया. किन्तु सरदार पटेल गांधीजी को बारडोली आश्रम में रखने के पक्ष में थे. किन्तु जमनालाल जी उन्हें वर्धा रहने के लिए राजी करने में सफल हो गये.

गांधी जी- सरदार की थोडी नाराजगी सहन करने के भी मैं जमनालाल जी की इच्छा देखकर वर्धा में रहने का निश्चय किया है. बापू आगे लिखते हैं कि वर्धा के इस बगीचे के बदले मुझे सरदार गुजरात में आसानी से दस बगीचे दिलवा सकते थे. पर मैंने दस बगीचों का मोह छोडा कि वह मुझे वहां जमनालाल बजाज नहीं दिलवा सकते.

कुछ समय रहने के बाद गांधीजी ने जमनालाल बजाज के सामने किसी गांव में रहने की इच्छा की. उन्होंने उन्हें कर्इ गांव दिखाये, अंत में उन्होंने वर्धा से चार मील दूर सेगांव में जाकर रहना तय किया. यह गांव जमनालाल बजाज की मालगुजारी में आता था. यह गांव जमनालाल जी को उस मुखिया की विधवा ने दिया था, जिसने कुछ वर्षों पहले जमनालाल जी से 75000 रुपये उधार लिये थे. मुखिया अपने जीवन काल में इस कर्ज को नहीं उतार सका था. उसकी मृत्यु के बाद उसकी विधवा पत्नी ने जमनालाल जी को कर्ज  की एवज में गांव ले लेने की प्रार्थना की थी.

वहां आश्रम प्रारम्भ करने लायक जमीन थी. 30 अप्रैल, 1936 को गांधीजी, महादेव भार्इ, जमनालालजी तथा अन्य कुछ लोग के साथ पैदल सेगांव आये जो बाद में सेवाग्राम आश्रम कहलाया. इस समय अस्थायी तौर पर महात्मा गांधी के लिए एक कुएं के पास आम और अमरूद के पेड के बीच एक बांस की झोपडी बना दी गयी थी. इसी बीच जमनालाल जी ने सेगांव में रहने के लिए मिट्टी की दीवारों तथा खपरैल की एक झोपडी बनवायी. इसमें दस फुट चौडा चौदह फुट लम्बा बीच में एक कमरा था. जिसके चारो ओर बरामदे थे. पिछले दरवाजे में एक छोटा सा स्नान गृह था. कर्इ महीनों तक इस कुटियां के एक कोने में बापू रहे, दूसरे में कस्तूरबा, तीसरे में महादेव भार्इ और चौथे में एक मेहमान जो बापू से मिलने सेवाग्राम आ गये थे. इस कोने में बादशाह खान महीनों तक रहे. इसके कोर्इ एक बरस बाद कस्तूरबा के लिए अलग कुटिया बनवायी गयी और गांधीजी उसके बाद उस कुटिया में चले गये, जिसे खुद मीराबेन ने गांव में अपने रहने के लिए बनवाया था. यही वह कुटिया है, जो बापू कुटी के नाम से जानी जाती है. पहली कुटिया को आदि निवास कहते हैं.

जमनालाल जी बजाज प्रायः रोज ही ज्यादातर पैदल और एकाध बार अपनी आक्‍सफोर्ड गाडी में गांधीजी से मिलने और उन्हें कोर्इ असुविधा तो नहीं है, यह देखने के विचार से सेवाग्राम जाया करते थे. आश्रमासियों के लिए कुछ और कुटियों का प्रबंध कर दिया था. बाद में आश्रम के प्रबंधक चिमनलाल शाह इस कुटिया में रहते थे. बाद में गांधीजी के मित्र रूस्तमजी रहे. गांधीजी ने इस भवन का नाम रूस्तम भवन रख दिया था. महादेव भार्इ के लिए एक अलग कुटिया बनवा दी गयी. किशोरलाल भार्इ के लिए एक अलग कुटिया बनवा दी गयी. ये सभी निवास स्थानीय सामग्री से बनवाये गये थे. गांव की बनी र्इंटे, खप्परें, इमारती लकडी और पलस्तर आदि काम में लाये गये.

जमनालाल बजाज ने आश्रम के बाजू में नर्इ तालीम से सम्बंधित निवास, छात्रालय और शिक्षालय आदि बनवा दिये और बहुत जल्दी यह अहाता भारत की नयी तालीम गतिविधियों का केन्द्र बन गया. नर्इ तालीमी संघ के अहाते के अतिरिक्‍त सेवाग्राम में अखिल भारतीय खादी संघ का केन्द्रीय कार्यालय स्थापित हुआ. यह पहले साबरमती में था. यहां सेवाग्राम लाया गया. जमनालाल बजाज और श्रीकृष्णदास जाजू ने चरखा संघ के अहाते को स्परुप देने की जिम्मेदारी अपने ऊपर उठायी और आश्रम से दो फर्लांग दूर इसका निर्माण हुआ. हमेशा की तरह जमनालाल बजाज ने इन संस्थाओं के लिए कार्यकर्ता जुटाये.

अतिथियों को वर्धा से सेवाग्राम लाने के लिए जमनालाल जी ने एक पुरानी फोर्ड गाडी के पिछले हिस्से को ऐसी गाडी में बदलवा दिया था, जिसमें बैल जोते जा सकें. जमनालाल जी ने एक सेकेंड हैंड कार अतिथियों की सुविधा के लिए खरीद ली थी.

जमनालाल बजाज ने अतिथियों को रहने के लिए छोटा पीला बंगला खरीद लिया. इस बंगले पीछे बरामदे में पलथी मार कर भोजन होता था. कांग्रेस के नेतागण इसे पसंद करते थे. मौलाना आजाद के आने पर एक कुर्सी और टेबल लगा दी जाती थी, घुटने की चोट के कारण वे बैठकर भोजन नहीं कर पाते थे. सरोजिनी नायडू को तली हुर्इ मिर्च बहुत पसंद थी. राजाजी को रसम पसंद था, जवाहरलाल जी को आलू, ब्राउन ब्रेड और मक्‍खन. मौलाना आजाद को रोटियां पसंद थी और बादशाह खां को खिचडी में गरम घी. शंकरदेव अंत में दूध भात और मक्‍खन लेते थे. जयरामदास उबली हुर्इ सब्जियां और आचार्य कृपलानी को सब्जियों का गर्म सूप और उस पर मलार्इ अच्छी लगती थी. जमनालाल बजाज और उनकी पत्नी जानकी देवी अतिथियों की पसंद का बहुत खयाल रखते थे.

त्याग की दृष्टि से उनका अंतिम कार्य सर्वश्रेष्ठ रहा. देश के पशुधन की रक्षा का काम उन्होंने अपने लिए चुना था और गाय को उसका प्रतीक माना था. इस काम में वे इतनी एकाग्रता और लगन के साथ जुट गये थे कि जिसकी कोर्इ मिसाल नहीं.

उनका सबसे बडा काम गो-सेवा का था. वैसे तो यह काम पहले भी चलता था, लेकिन धीमी चाल से. इससे उन्हें संतोष न था. उन्होंने इसे तीव्र गति से चलाना चाहा और इतनी तीव्रता से चलाया कि खुद ही चल बसे. अगर हमें गाय को जिंदा रखना है तो हमें भी उसकी सेवा में अपने प्राण खोने होंगे.

 

जमनालाल जी कार्यकर्ताओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं देते थे, वह उनके बच्चों की शिक्षा का भी प्रबंध करते थे. बीमार पड जाने पर उनकी चिकित्सा भी करवाते थे. वह ऐसे लोगों के बच्चों की सूची भी रखते थे और उनकी शादी बहुत कम खर्च में करवा देते थे. इसी कारण गांधीजी उन्हें स्नेह से शादी काका भी कहते थे.

कपास के व्यापार में मंदी के कारण आपस में प्रतिस्पर्धा  तीव्र हो गयी तथा अधिकतर व्यापारियों ने वजन बढाने के लिए कपास की गांठों को गीला करके बेर्इमानी शुरु कर दी. जमनालाल जी के मुनीमों और सहयोगी डायरेक्‍टरों ने भी स्वामिभक्ति के कारण प्रतिस्पर्धा में रहने की सलाह दी. पर जमनालाल जी ने इसे दृढता से अस्वीकृत कर दिया.

सन् 1918 में सरकार ने जमनालाल बजाज को राय बहादुर की पद्दवी से अलंकृत किया. इसके लिए जब जमनालाल बजाज ने गांधीजी सलाह मांगी तो उन्होंने कहा- नये सम्मान का सदुपयोग करो. सम्मान और पदवी इत्यादि खतरनाक चीजे हैं. उनका सदुपयोग की जगह दुरुपयोग अधिक हुआ है. मैं चाहूंगा कि तुम उसका सदुपयोग करो. यह तुम्हारी देशभक्ति या आध्यात्मिक उन्नति के आडे नहीं आयेगा. 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव पारित हुआ, तो जमनालाल जी ने अपनी पद्दवी लौटा दी. 1920 में नागपुर अधिवेशन की स्वागत समिति के निर्विरोध अध्यक्ष चुने गये. बापू ने अध्यक्ष पर पद उनके चयन को स्वीकृति दे दी.

गांधीजी ने जब पर्दे के बहिष्कार की बात चलार्इ तो सबसे पहले उन्होंने अपनी पत्नी जानकी देवी को पर्दा छोड देने को कहा. कर्इ मारवाडी परिवारों ने उनसे यह प्रेरणा ग्रहण की.

जानकी देवी ने चरखे पर सूत कातना शुरु कर दिया. वह खादी की साडियां पहनने लगी. विदेशी कपडों की होली में पूरे परिवार के कर्इ हजार के कपडे इसमें जलाये गये. जमनालाल बजाज का शादी में पहना हुआ बेशकीमती दुपट्टा भी इस आग से नहीं बच सका.

अपनी पत्नी से उन्होंने कहा कि अब हम और तुम कोर्इ विदेशी कपडा नहीं पहन सकते. अब सारे परिवार को खादी पहनना चाहिए और सादा जीवन व्यतीत करना है. हमारे पारिवारिक मंदिर में भी अब कोर्इ विदेशी कपडा नहीं होना चाहिए, इसका तुम ध्यान रखोगी.

रीति-रिवाजों के अनुसार गहने केवल विधवा ही उतारती हैं. जानकी देवी के गहने त्याग से समाज में सनसनी फैल गयी. उन्होंने औरतों से कहा- गहनों से अनावश्यक र्इर्ष्या उत्पन्न होती है. उनके चोरी हो जाने का भय हमेशा बना रहता है. उनके पहनने से उन अंगों के स्वास्थ्य को भी थोडा बहुत खतरा रहता  है. विशेषकर नाक और कान के बारे में तो यह बात ज्यादा लागू होती है. उन पर खर्च किया पैसा नाहक फंस जाता है. उनसे मिलने वाला ब्याज तो गया ही. इसीलिये उसी पैसे को बच्चों की अच्छी शिक्षा और गरीबों की मदद में क्यों न लगायें.

अछूतोद्धार कार्यक्रम की शुरुआत भी जमनालाल बजाज ने अपने घर से की. उन्होंने कर्इ नौकरों को घर के कामकाज के लिए रखा तथा वर्धा के हार्इ स्कूल और बम्बर्इ के मारवाडी विद्यालय में हरिजन विद्यार्थियों को प्रवेश की छूट दे दी. हरिजनों के साथ कर्इ बार सामूहिक भोजन का आयोजन किया. इसके कारण उनके जाति के लोगों ने उन्हे जाति से भी बाहर कर दिया. पर जमनालाल पर इस जाति बहिष्कार का कोर्इ असर नहीं हुआ.

झंडा सत्याग्रह- 1923 में नागपुर में झंडा सत्याग्रह हुआ. इस अवसर पर जमनालाल बजाज ने शांत किन्तु दृढ स्वर में कहा- हम राष्ट्रीय झंडे का अपमान नहीं सह सकते. राष्ट्र के वैभवशाली इस प्रतीक के सम्मान की पूरी रक्षा की जायेगी. पहली मर्इ से हमारा सत्याग्रह प्रारम्भ होगा. इस उद्देश्य के लिए किसी भी बलिदान के लिए तैयार रहें. सत्याग्रह विज्ञान के अनुसार अत्याचार सहते हुए विरोधी का हृदय परिवर्तन करना है. विरोधियों के लिए हमारे मन में घृणा नहीं होनी चाहिए, यह ऐसा पहलू है, जिसे हमें हमेशा याद रखना है. जमनालाल बजाज को गिरफ्तार करके 18 महीने के लिए जेल भेज दिया गया.

चक्रवर्ती राजगोपालाचारी- जमनालालजी पर यह लादी हुर्इ सजा दूर हो जानी चाहिए.

सेठ जमनालाल जी जिसे पात्र समझते थे, उसे बिना किसी जाति, धर्म, आयु, और स्थान भेद के अपनाते थे.

मौलाना मोहम्मद अली- मौलान साहब ने जब यह खबर सुनी तो उन्होंने तार में लिखा- शाबास! बनिये का पाव छूने का जी हो रहा है.

हकीम अजमल खां- आपको झंडा सत्याग्रह के शानदार संचालन के लिए बधार्इ!

जमनालाल बजाज- साहित्य मेरा क्षेत्र नहीं है. लेकिन बचपन से ही मैंने भारत की एक सामान्य भाषा की जरूरत को महसूस किया है. हमारी राजनैतिक गतिविधियों अंग्रेजी माध्यम से होने के कारण जनसाधारण न तो लोकशिक्षण ही पा सकते हैं और न उससे कोर्इ प्रेरणा ग्रहण कर पाते हैं. देश की अपनी तीस साल की विनम्र सेवा अवधि में इस दृढ निश्चय पर पहुंचा हू कि जब तक हमारी एक राष्ट्रभाषा नहीं होगी, तब तक सही अर्थों में राष्ट्रीय एकता नहीं हो सकती.

दांडी सत्याग्रह- दांडी सत्याग्रह में जानकी देवी का भांजा प्रहलाद सत्याग्रहियों के दल में चुना गया. जमनालाल जी इस बात के लिए उत्सुक थे कि उनका ज्येष्ठ पुत्र कमलनयन भी इस इस सत्याग्रह दल में शामिल रहे. गांधीजी कमलनयन को दल में शामिल कर तो लिये किन्तु बीमार होने के कारण वह बहुत कमजोर था. उन्होंने कुछ दिन इस कूच में भाग लिया. किन्तु फिर अस्वस्थता के कारण उन्हें गुजरात विद्यापीठ में जाकर पढने की सलाह दी गयी.

इसलिए पहले स्वास्थ्य लाभ करने को कहा. धरासना में जब बापू जी को गिरफ्तार किया गया तो इस अवसर पर जानकी देवी और उनकी पुत्री मदालसा भी उपस्थित थीं. कस्तूरबा गांधी की सलाह पर उन दोनों ने अपने को गिरफ्तारी के लिए प्रस्तुत नहीं किया. बल्कि काम बढाने के लिए बिहार तथा बंगाल के दौरे पर चली गयीं. जानकी देवी को 1932 के प्रारम्भ में गिरफ्तार करके छः महीने के लिए जेल भेज दिया गया.

जयपुर सत्याग्रह- 1931 में जमनालाल जी के प्रयत्नों के कारण जयपुर राज्य प्रजा मंडल की स्थापना हुर्इ. 1936 में यह मंडल सक्रिय रूप से काम करने लगा. 30 मार्च, 1938 को जयपुर राज्य ने अचानक एक आदेश निकाल दिया कि सरकार की आज्ञा के बिना जयपुर राज्य में किसी भी सार्वजनिक संस्था की स्थापना नहीं की जा सकेगी. इस आदेश का मुख्य निशाना प्रजा मंडल की गतिविधियों को व्यर्थ करना था. मंडल का वार्षिक अधिवेशन 8 व 9 मर्इ को जमनालाल जी की अध्यक्षता में घोषित किया जा चुका था. उन दिनों जयपुर के एक अंग्रेज दीवान बीकैम्प सेंटजान को जमनालाल की लोकप्रियता पसंद नहीं थी. 4 जुलार्इ, 1938 को बात बहुत बढ गयी और जयपुर पुलिस ने एक रेलगाडी पर गोलियां चला दी. जिसमें अनेक राजपूत मरे और घायल हुए. सीकर के राजपूत और जाट भडक उठे और लगा कि खून की नदियां बहने लगेंगी. जब जमनालाल बजाज ने इस शर्मनाक परिस्थिति का समाचार सुना तो उन्होंने चाहा कि दोनों में सुलह हो जाये. सीकर जमनालाल जी का जन्म स्थान था. उन्होंने हिंसा के बजाय लोगों को अहिंसक बने रहने की सलाह दी. 30 दिसम्बर 1938 को जयपुर राज्य में फैले हुए अकाल का लेखा-जोखा करने तथा राहत कार्य करने के लिए जमनालालजी सवार्इ माधोपुर स्टेशन पर दूसरी गाडी का इंतजार कर रहे थे. इतने में इंस्पेक्‍टर जनरल आफ पुलिस श्री एफ. एस. यंग ने उनको एक आदेश दिया, जिसमें यह लिखा हुआ था कि रियासत में उनके प्रवेश और गतिविधियों के कारण शांति भंग होने का खतरा है. इसलिए वे रियासत की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते. किन्तु मुझ पर लगार्इ गर्इ निेषेधाज्ञा ने प्रजा मंडल की आंखें खोल दी. इसके कारण जमनालाल जी के नेतृत्व में सत्याग्रह किया गया. अंत में जयपुर रियासत को अपनी गलती स्वीकार करनी पडी. इसमें कोर्इ संदेह नहीं कि जमनालाल बजाज रियासतों में रहने वाली प्रजा के अधिकारों के सच्चे संरक्षक थे और वह अपने जीवन के अंत तक देशी राज्यों में नागरिक स्वतंत्रता के लिए अनथक संघर्ष करते रहे.

श्री लक्ष्मीजी से प्रार्थना है कि मां सद्‍बुद्धि देवे तथा सत्य के साथ व्यापार करने तथा रोजगार करने में ही लाभ होवे, जिसे देश तथा दुखी जनता के कार्य में लगाने की बुद्धि देवे.

मुझे पूरा विश्वास है कि निःस्वार्थ भाव से जनसेवा करते रहने से ही शीघ्र मोक्ष प्राप्त हो सकती है. अगर कोर्इ मुझे ये कहे कि इस तरह देश सेवा करने वालों को सौ जन्म में भी मोक्ष प्राप्ति नहीं होती तो भी मुझे कोर्इ चिंता नहीं होती. एक प्रकार से आनंद ही होता. पवित्रता के साथ जनसेवा करते-करते कर्इ जन्म भी हो जावें तो क्‍या फिक्र? केवल मनुष्य को इस बात पर विचार रखना चाहिए कि कहीं वह मायाजाल में फंस कर मनुष्य जन्म के आदर्श को न भूल जाये और अभिमान में प्रवृत्त होकर इस नरदेह का पतन न करे.

 

जिस दिन महात्मा जी के पुत्र वात्सल्य के योग्य हो सकूंगा, वही समय मेरे जीवन के लिए धन्य होगा. महात्मा जी को अनुपम दया से अपनी कमजोरियों को कम से कम तो थोडा-बहुत पहचानने लगा हूं.

महात्मा जी क कार्य में मैं अपने आपको विलीन हुआ पाने लगा. वे मेरे जीवन के मार्गदर्शक ही नहीं, पितातुल्य हो गये हैं. मैं उनका पांचवा पुत्र बन गया.

मौलाना अबुल कलाम आजाद- 1920 से देशसेवा में उन्होंने अपना जीवन समर्पण कर दिया था. तब से जीवन के अंत तक वह देश की सेवा करते रहे. वह अपनी विविध प्रवृत्तियों के कारण प्रथम श्रेणी के राष्ट्रीय नेता हो गये थे.

बालकों का शिक्षण सत्याग्रह आश्रम, साबरमती, वर्धा या इसी प्रकार के कोर्इ उच्च ध्येय तथा चरित्र बल वाले तपस्वी सज्जन जहां कार्य करते हों, वहां रख देने का प्रबंध करें.

उनके हृदय और उनके घर के दरवाजे राष्ट्रीय कार्यकर्ताओं के स्वागत के लिए हमेशा खुले रहते थे. उन्होंने केवल पैसा कमाना ही नहीं सीखा था, परंतु वे उसे व्यय करना भी जानते थे. आज वे हमारे बीच में नहीं हैं, परंतु उनकी सेवाओं के फल हमेशा ताजा रहेंगे और उनकी स्मृति कभी धुधली नहीं होगी.

महादेव भार्इ देसार्इ- त्याग और कष्ट सहने में वे किसी भी कांग्रेसी से पीछे नहीं रहे. कर्इ बार जेल गये और तीसरे दर्जे के कैदी की अनेक मुसीबतें सहीं.

रचनात्मक कार्य का कोर्इ अंग ऐसा नहीं था, जिसमें उन्होंने कोर्इ रस नहीं लिया हो और पूरी तरह हाथ न बंटाया हो. यदि मनुष्य को सेवा छलकता हुआ ऐसा जीवन मिले तो वह भगवान से और क्‍या चाहे? सेवारूपी यशोधन उन्हें मिल गया था.

राजपूताने से मन में अधिक प्रेम रहता है. इसी कारण राजपूताने के लिए अधिक दुख होता है. इतने वर्षों के अनुभव से अन्य कार्यकर्ताओं का तो प्रश्न ही क्‍या, मुझे अपने ही मित्रों की कार्य पद्धति और अव्यवहारिक भूलों के कारण तथा पारस्परिक प्रेम और विश्वास की कमी के कारण कर्इ बार दुख पहुंचा है.

विनोबा जी के प्रति दिनोंदिन श्रद्धा बढती जा रही है. परमात्मा यदि मुझे इस देह से उनकी श्रद्धा के योग्य बना सकेगा तो वह समय मेरे लिए धन्य होगा. मुझे दुनिया में बापू पिता और विनोबा गुरु का प्रेम दे सकते हैं. अगर मैं अपने को योग्य बना सकूं.

महात्मा गांधी- ऐसा कोर्इ काम मैंने नहीं किया, जिसमें जमनालालजी का पूरा सहयोग तन- मन धन से न रहा हो. जिसको राजकाज कहते हैं, उसका न मुझे शौक था, न उनको. वे उसमें पडे, क्‍योंकि मैं उसमें पडा. लेकिन मेरा सच्चा राजकाज तो था रचनात्मक कार्य और उनका भी राजकाज यही था.

उन्होंने मेरे सभी कामों को पूरी तरह अपना लिया था. यहां तक कि मुझे कुछ करना ही नहीं पडता था. ज्योंही मैं किसी नये काम को शुरु करता वे उसका बोझ खुद उठा लेते थे. इस तरह मुझे निश्चित कर देना, मानों उनका जीवन कार्य ही बन गया था.

रामेश्वरी नेहरु- गांधीजी के रचनात्मक कार्य के प्रत्येक अंग के चलाने में उनका बडा भारी हाथ था. वे नये भारत के निर्माण स्तम्भ थे. उनके पवित्र हाथों और शुद्ध हृदय से चलाये हुए कार्यों से ही जिन्हें उन्होंने अपने जीवन और प्राणशक्ति से सींचा, भारत उन्नति के मार्ग पर आगे बढ रहा है.

वे उन थोडे लोगों में से थे कि जो सोचते थे और कहते थे, वही करते थे. भारी धनराशि का स्वामी होते हुए भी सादा जीवन बिताते थे. धन का सच्चा उपयोग करते थे, बाहरी दिखावे और विलासिता में एक पैसा भी व्यर्थ न खोकर लाखों रुपयों का दान काल और पात्र देखकर करते थे.

जमनालाल बजाज- हम र्इश्वर को जगन्माता, जगत्पिता और पतितपावन कहते हैं, और उसी के मंदिर में उसके असहाय, निरीह पुत्रों को जाने से रोकते हैं. यह मानना है कि जो खुद पतित पावन है, वह अछूत के सम्पर्क से अपवित्र कैसे हो जायेगा.

जीवन में मैं इसे इस तरह बरतना चाहता हूं कि मरते समय कोर्इ मुझे अपना शत्रु समझने वाला न हो.

मुझे किसी व्यक्ति का मोह नहीं है. जो कार्यकर्ता अच्छे हैं और अच्छी रीति-नीति से सच्चार्इ का काम करते हैं, मैं उनका साथी हूं. जिनकी रीति नीति में खराबी और गंदगी मालूम होती है, उनका साथ छोड देता हूं.

अपने प्रतिपक्षी से जल्दी समझौता करो. अगर किसी के प्रति तुम्हारे दिल में कुछ गुस्सा हो तो सूर्य को नहीं डूबने दो. सूर्यास्त के पहले ही उसके पास चले जाओ और उससे बातचीत कर लो. बापूजी कहते हैं कि मेरे लिए ये वाक्‍य वेद वचन से कम नहीं थे, यही अहिंसा की जड हैं.

मेरी कन्याओं की सगार्इ विवाह 16 वर्ष तक बिलकुल न किया जाये. बाद में उनकी इच्छा हो तो उस मुताबिक सगार्इ विवाह का प्रबंध कर दिया जावे. अगर उनमें से कोर्इ आजन्म कुमारिका ब्रह्मचारिणी रहना चाहे तो अवश्य उसका उत्साह बढाया जाये तथा उस मुताबिक प्रबंध कर दिया जाये.

हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि हिन्दी र्इमान की भाषा है, प्रेम की भाषा है, राष्ट्रीय एकता की भाषा है, और आजादी की भाषा है.

देश के जो नुमाइंदें धारा सभाओं में गये हैं, उनका यह कर्तव्य है कि वे ऐसी कोशिश करें, जिससे राष्ट्रभाषा की तालीम हरेक भारतीय के लिए लाजमी बनायी जा सके.

मेरी खुद की राय यह है कि जिस प्रांत के लोगों में काम करना हो, उस प्रांत विशेष की भाषा का ही उपयोग किया जाये.

मैं जैसे-जैसे सत्य की खोज में आगे बढ रहा हूं, वैसे-वैसे मुझे यह बात स्पष्ट दिखायी दे रही है कि सत्य में सब कुछ समा जाता है.

1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह आंदोलन में जेल से रिहार्इ के बाद जमनालाल जी बापूजी की सहमति से आनंदमयी मां से मिलने और अपनी आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षा को संतुष्ट करने का उपाय जानने की दृष्टि से देहरादून गये. राजपुर आश्रम में मां से मिलने के बाद जमनालाल जी ने गांधीजी को एक पत्र लिखा-

मेरा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बहुत अच्छा है. मुझे स्वाभाविक जीवन जीने का यहां अवसर प्राप्त हुआ है. मुझे मां का स्नेह भी इस सीमा तक प्राप्त हो रहा है कि मुझे इससे संतुष्टि प्राप्त होती है. मां अहिंसा और प्रेम की जीती-जागती मूर्ति ही हैं. वातावरण भी मौन और कीर्तन का है. मां निरक्षर हैं किन्तु कठिन से कठिन विषयों को बडी स्पष्टता के साथ समझती है और सदा आनंदमयी बनी रहती हैं.

कहा जाता है कि यद्यपि मां विवाहित हैं, किन्तु जीवनभर ब्रह्मचारिणी रहीं. सत्य के प्रति उनका बडा आग्रह है. यहां जीवन बहुत सीधा-साधा है.

आनंदमयी मां के आश्रम का वातावरण पवित्र और प्रेमपूर्ण है. मेरा मन यहां कुछ और दिन ठहरने का होता है. पिता की तरह मुझे बापू और मां आनंदमयी के रूप में मुझे माता मिल गयीं.

वर्धा लौटने के बाद मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण फरवरी 1942 में जमनालाल जी का एकाएक देहावसान हो गया.

बचपन में कुछ ऐसे तरुणों के सम्पर्क में आया, जिनका आचरण अच्छा नहीं था. मैंने यह भी देखा कि सम्पन्न घरों में काम करने वाले नौकर भी बच्चों को जवानी में गुमराह करने की कोशिश करते हैं. किन्तु भगवान की कृपा से अपने स्वाभाविक भय, संकोच और लज्जा ने मुझे बचा लिया. जैसे ही मुझे लगता है कि कोर्इ नौकर इस दृष्टि से खराब है, मैं उसे नौकरी से अलग कर देता था.

मुझे इस बात का विश्वास हो गया है कि माता-पिताओं को अपने बच्चों में योग्य और सत्संगति के द्वारा निर्भयता, सत्य और पवित्रता के गुणों का समावेश करने का सदा प्रयत्न करना चाहिए. मेरी समझ में बच्चों और बडों के मन से बुरे विचारों को दूर रखने और बुरी आदतें न पडने देने के लिए आवश्यक है कि उन्हें श्रम साध्य और उपयोगी कार्य में लगाकर रखा जाये, जिससे उनके मन को भटकने का अवसर ही न मिले.

गैया चाहे कितनी छोटी क्‍यों न हों, चाहे एक वर्ष की ही क्‍यों न हों, उसे देखकर हमारे दिल में मातृभाव ही जाग्रत होता है. इसलिए गोमाता की सेवा का यह व्रत मैंने लिया है.

अपनी धर्मपत्नी श्री जानकी देवी के लिए मेरे मन में बहुत ही आदर व प्रेम है. तथा कर्इ प्रसंगों में मैं उन्हें अपने से अधिक पवित्र व निर्मल मानता हूं. उनके सहवास में अपने जीवन के ध्येय में मुझे स्वतंत्रतापूवर्क आगे बढने का मौका मिला.

मेरे बाद व्यवसाय कार्य बंद कर दिया जाये. अगर व्यसाय कार्य किया ही जाये तो वह सत्यता के साथ व जिस व्यवसाय से देश को पूरा लाभ पहुंचता हो, वही करना चाहिए. बाकी बन सके, वहां तक व्यवसाय के झगडे में न पडकर आत्मशुद्धि के व्यवसाय में ही जीवन बिताने की चेष्टा करना, मेरे पीछे रहने वालों को मेरी सलाह है. साधारण खर्च निर्वाह करना.

सच्चार्इ व्यापार की उन्नति का मूल है. जल्दी लाभ उठा लेने के लोभ से जो लोग आतुर होकर कुछ झूठ या धोखे का उपयोग करते हैं, सम्भव है कि एक दो बार सफल हो जायें, पर उनका व्यापार चिरस्थायी नही हो सकता. साख से बढकर व्यापारी का कोर्इ सहायक नहीं है.

राजकुमारी अमृतकौर- स्त्री जाति की उन्नति के विषय में उनकी श्रद्धा इतनी अटूट थी कि अंत में वे सफल ही रहे. उन्होंने अपनी लडकियों को लडकों के समान ही शिक्षा की सारी सुविधायें दी. व्याह के मामले में उन्होंने उनको अपने साथी का चुनाव करने की स्वतंत्रता दी.

महिलाश्रम वर्धा शायद उनकी सबसे प्रिय संस्था थी. वे अक्‍सर मुझसे कहा करते थे कि जीवन के हर क्षेत्र में वे स्त्रियों को सफलतापूर्वक आगे बढते देखना चाहते हैं. वे चाहते  थे कि स्त्रियां निर्भय बनें, सादा जीवन बितायें, देश की सेवा में अपने आप को खपा दें और इस योग्य हो जायें कि पुरुषों के सामने दृढता से डटी रहें.

वे विशेष व्यक्ति थे. उनकी जगह कोर्इ नहीं ले सकता. उनका प्रेम और स्वभाव ऐसा था कि सबको जीत लेते थे. उनकी सादगी, नम्रता, नियम पालन की शक्ति व निस्वार्थता से मैंने काफी सीखा.

21 दिसम्बर, 1940 को सेवाग्राम में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के अन्य महत्वपूर्ण नेताओं के साथ जमनालाल बजाज को भी गिरफ्तार कर लिया गया. बा और बापू ने उन्हें अपने हाथ की कती सूत की माला पहनार्इ और स्नेहपूर्ण आशीर्वाद दिया. पुलिस की गाडी में बिठाकर उन्हें नागपुर की जेल लाया गया, मुकदमा चला और उन्हें नौ महीने की कैद और पांच सौ रुपये जुर्माना हुआ. उन्हें जेल में विनोबा का साथ मिला. स्वास्थ्य गिरने के कारण उन्हें कुछ समय पहले 3 जून 1941 को रिहा कर दिया गया.

दुर्भाग्यवश जमनालाल बजाज अहिंसक क्रांति के माध्यम से विदेशी शक्ति के खिलाफ राष्ट्र जागरण का ऐतिहासिक दृश्य देखने को हमारे साथ नहीं रहे.

जमनालाल जी ने अपने लिए कुछ नियम बना रखे थे-

  1. किसी भी कागज पर बिना पढे हस्ताक्षर मत करो.
  2. इस उम्मीद में कहीं भी धन नहीं लगाना चाहिए कि केवल फायदा होगा.
  3. नहीं कहने में आगा-पीछा नहीं करना चाहिए. हरेक व्यक्ति जो सफल होना चाहता है, उसमें दूसरों को अपने वक्‍तव्य पर राजी करने की ताकत होनी चाहिए.
  4. अपरिचितों से सावधान रहो. इसका अर्थ यह नहीं कि उनसे संदेह का व्यवहार करो.
  5. व्यापार का हिसाब किताब साफ सुथरा और सच्चा होना चाहिए. हर चीज हिसाब से होनी चाहिए.
  6. किसी व्यक्ति की जमानत लेने से पहले उसके बारे में सब कुछ जान लो.
  7. पार्इ-पार्इ का हिसाब रखो.
  8. समय के बिलकुल पाबंद रहो और यदि किसी को किसी काम के लिए निश्चित समय दिया है तो उस पर दृढता से पालन करो.
  9. तुम सचमुच जितना कर सकते हो. उससे अधिक करने की किसी को आशा मत बधाओं.

10. र्इमानदारी के साथ चलों, किन्तु इसलिए नहीं कि तदनुसार चलने से लाभ होता है.

11. जो करना चाहते हो आज ही कर डालो.

12. केवल सफलता का ही विचार करो, सफलता की ही बात करो और तुम देखोगे कि तुम सफल हो गये हो.

13. अपने शरीर और आत्मा की शक्ति पर विश्वास करो.

14. कठिन शर्म करने में शर्म की कोर्इ बात नही है.

15. साफ बात कहने में कभी नहीं हिचकिचाना चाहिए.

जमनालाल बजाज कोर्इ भी काम अपनी पत्नी यहां तक कि बच्चों से पूछे बगैर नहीं करते थे.

अपने कारखानों और व्यापारिक पेढियों आदि में काम करने वाले लोगों के प्रति जमनालाल जी ने सदा न्याय और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करने का जीवन भर प्रयत्न किया. अपने ही लाभ के किसी संकीर्ण विचार ने उनके मानवीय और न्यायप्रिय दृष्टिकोण को कभी धुधला होने नहीं दिया.

श्रमिक संघ की की एक बैठक के सामने बोलते हुए जमनालाल बजाज ने मजदूरों को जोर देकर कहा कि उन्हें अपने अधिकारो के साथ उत्पादन बढाने के प्रति अपने कर्तव्यों पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए. यदि  उद्योग से उत्पादन नहीं बढता तो अधिक मजदूरी या महगार्इ भत्ते को बढाने की मजदूरों की मांग स्वीकार करना मिल मालिक के लिए लगभग असम्भव हो जाता है.

जमनालाल जी के जीवन और व्यक्तित्व के कर्इ पहलू थे. इनमें उनके व्यापार करने का तरीका एक महत्वपूर्ण तरीका था. वह सत्य और अहिंसा के असाधारण समर्थक थे. आजकल व्यापार में र्इमानदारी किस प्रकार बनायें रखें, यह एक बडी समस्या हो गयी है. वास्तव में व्यापार की नींव सत्य पर ही रखी जा सकती है. र्इमानदारी, सच्चार्इ, वचन का पालन, बराबरी का व्यवहार, ममता मिश्रित न्याय, सहयोगियों एवं सेवकों से अपने परिवार को लोगों की तरह बर्ताव, सबके सुख-दुख में भाग लेना, अध्यवसाय, कुशलता, हिसाब-किताब की पक्‍की जानकारी, दूरदर्शिता, समाज कल्याण के प्रति चिंता और सूझ-बूझ इत्यादि वैश्य के ऐसे धर्म हैं, जिन्हें उससे अलग नहीं किया जा सकता है. किन्तु आजकल लक्ष्मी की जगह पैसा बैठ गया है. झूठ को कुशलता समझा जाता है, क्रूरता को चतुरार्इ, व्यापार से सच्चार्इ को निकाल कर फेंक दिया गया है. ऐसी हालत में जमनालाल बजाज जी जैसे लोगों के बारे में सोचना कल्याणकारी है.

एक बार कमलनयन बजाज ने बापू को बताया कि 1920 और 1942 के बीच जमनालाल जी ने जितना कमाया था, उससे कहीं अधिक सार्वजनिक कार्यों के लिए दान दे दिया था.

महात्मा गांधी ने लिखा है कि ट्रस्टीशिप का मेरा सिद्धांत कोर्इ समय साधक सिद्धांत नहीं है और वह किसी प्रकार का मुखौटा तो है ही नहीं. जमनालाल बजाज ने यह दिखा दिया था कि यदि सच्ची प्रेरणा हो तो कोर्इ भी व्यापारी इस दुर्बलता को जीत सकता है.वह इसी तरह गांधीवादी विचार धारा के अनुकूल सम्पत्तिवान बने.

जमनालाल जी ने विनोबा की प्रतिभा को पहचाना और उन्हें अपना आध्यात्मिक गुरु मान लिया.

जमनालाल जी को विनोबा जी के साथ दो बार जेल में साथ रहने का विरल संयोग प्राप्त हुआ. पहली बार नागपुर में झंडा सत्याग्रह के समय सन्‍ 1923 में और फिर दूसरी बार 1931-32 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में धूलिया जेल में.

विनोबा भावे- जमनालाल जी की आकस्मिक मृत्यु के एक दिन बाद 12 फरवरी 1942 को परमधाम आश्रम, पवनार में बिनोबा जी ने कहा कि जमनालाल जी अनेक गुणों के निधान थे. किन्तु उनकी सबसे बडी खूबी यह थी कि वह अपनी किसी भी काम की सफलता को उसकी बाहरी उपलब्धि के आधार पर न जांच कर इस आधार पर जांचते थे कि उन्होंने जो सेवाकार्य किया है, उसके फलस्वरूप व आंतरिक रूप से किस हद तक शुद्ध और उन्नत हुए हैं. जिस किसी रचनात्मक काम से उनके मन और हृदय अधिक पवित्र बन पाते हैं. उनके लिए वही वास्तविक काम होता था. जिस व्यक्ति ने ऐसी स्थिति में शरीर छोडा हो, उसकी कभी मृत्यु नहीं हो सकती है.

जमनालाल जी ने अपने शरीर को समाज सेवा में चंदन की तरह घिस-घिस कर क्षीण कर दिया था. भगवान ने उन्हें जो गुण दिये थे, उनका उपयोग उन्होंने अपने स्वार्थ के लिए न करके, दूसरों के लिए किया. हमें भी ऐसा ही करना चाहिए.

यह सही है कि जमनालाल जी असाधारण व्यक्ति तो थे ही नहीं. किन्तु यह बिलकुल सच है कि पिछले तीस वर्षों में किसी दूसरे जमनालाल ने जन्म नहीं लिया.

जमनालाल जी का उत्तराधिकारी होना हंसी का खेल नहीं है. तुम बेटे की हैसियत से उनके उत्तराधिकारी हो. और चूकि मैं उनका माना हुआ पिता हूं, उस रूप में मैं अपने को उनका उत्तराधिकारी समझता हूं. यह मेरा काम है कि उनकी कीर्ति को अकंलकित और उज्ज्वल बनाये रखूं.

गांधीजी प्रायः लडकियों को सलाह देते थे कि वे अपने बाल कटवा डालें और त्यागपूर्ण जीवन व्यतीत करें. उन्होंने मदालसा को भी बाल कटवा लेने को राजी किया. ओर सन्‍ 1933 की दीवाली के दिन खुद अपने हाथ से उसके सिर का बोझ उतार दिया.

जमनालाल बजाज की छोटी बेटी उमा को उन्होंने कहा कि मुझमें इसमें कोर्इ शक नहीं है कि तू अपनी अंग्रेजी सुधारने का पूरा प्रयत्न करेगी. दक्षिण भारत अपने संगीत के लिए प्रसिद्ध है. अच्छी तरह संगीत सीखना.

जमनालाल जी का विश्वास था कि मनुष्य का अंतिम कर्तव्य इंद्रियों की वासना से मुक्‍त होना है. वह अपने सारे कामों को इसी कसौटभ पर जांचते थे कि वह निष्काम वृत्ति के निकट पहुंच रहे हैं या नहीं. वह समय-समय पर अपने सभी अनुभव बापू के सामने रखने का प्रयत्न करते रहते थे. जब उन्हें लगता था कि बापू बहुत व्यस्त हैं तो निःसकोच मेरे पास आकर सब कुछ दिल खोल कर सुनाते थे. वह प्राणमन से मन की शुद्धि के लिए व्याकुल थे और मुझे इसमें कोर्इ संदेह नहीं है कि उन्होंने मन की इसी सिथति में शरीर छोडा.

डॉ. राजेन्द्र प्रसाद-  आपने मेरे लिए जो कुछ किया है, उसके लिए मैं किन शब्दों में आपको धन्यवाद दूं. केवल भगवान ही इन सब बातों को जानता है और आपने जो मुझे मदद पहुंचार्इ है, वह उसके लिए आप पर कृपालु होगा.

जमनालाल जी के बच्चे सरोजिनी नायडू को अपनी दादी मां ही मानते थे और खाने की जो-जो चीजें उन्हें पसंद होती, उन सब का खयाल रखते.

कांग्रेसाध्यक्ष चुने जाने के बाद सुभाषचंद्र बोस भी कर्इ बार बजाजवाडी में ठहरे. जमनालाल जी ने उन पर स्नेह और आदर की वर्षा की और उनकी सुविधाओं का पूरा ध्यान रखकर उन्हें किसी प्रकार के बेगानेपन का भान नहीं होने दिया.

जमनालाल बजाज का सबसे बडा गुण केवल प्रमुख राष्ट्रीय नेताओं के साथ अनौपचारिक तथा पारिवारिक सम्बंध बना लेने की क्षमता ही नहीं थी, वह असंख्य सामाजिक और रचनात्मक कार्यकर्ताओं के साथ भी बिना जाति, धर्म, भाषा, आर्थिक स्तर तथा प्रांत भेद के – सभी के साथ समान रूप से घुलमिल जाते थे.

श्री विजयराघवाचार्य-  हमारे नौजवानों को अपने देश की साहसयुक्‍त, निःस्वार्थ और शांतचित्त के साथ सेवा करने का उदाहरण आपसे बढकर दूसरा नहीं मिल सकता.

काका साहब कालेलकर- वे कार्य का महत्व जितना समझते थे, उससे भी अधिक कार्यकर्ताओं को अपना सकते थे, यही उनकी विभूति की खूबी थी.

कण्डस्वामी चेट्टी- मैंने आपके अंदर सामाजिक सुधार और राष्ट्रीयता की भावना पराकाष्ठा को पहुंची हुर्इ पायी है.

स्वामी आनंद- जयपुर में आपने जिस धीरज, दक्षता और मधुर तत्परता से जो विजय प्राप्त की है, वह देशी राज्यों में बापू की रीति-नीति को मिली ऊपर से दिखायी देने वाली पश्चात गति के समय में कुसुमकुंज जैसी है.

हीरालाल शास्त्री- सेठ जी गुणों की खान थे. उनका मानव प्रेम अनुपम था. उनकी सरलता और स्पष्टवादिता आश्चर्यजनक थी. उनकी वीरता अनुकरणीय थी. वे सादगी की प्रतिमूर्ति थे. ठोस आदमी थे. कम से कम कहना और अधिक से अधिक करना सेठ जी का अटल सिद्धांत था. सार्वजनिक कार्यकर्ताओं को वे अपने परिवार का अंग मानते थे. और यह मानकर उनकी सहायता करते थे. सेठ जी की सहन शक्ति अटूट थी और उनके विशाल हृदय में असीम उदारता भरी हुर्इ थी.

जमनालाल जी ने कोर्इ विशेष शिक्षा नहीं प्राप्त की थी. उन्हें हिन्दी, अंग्रेजी, गुजराती और मराठी का साधारण ज्ञान था. लेकिन प्रतिभा के विकास के लिए वास्तव में जिस सामग्री की जरूरत थी, वह उन्हें प्राप्त थी. आत्म निरीक्षण, विचार युक्‍त जीवन, सतत जागृति, विचार, उच्चार और आचार में मेल साधने की प्रवत्ति इनसे उनकी बुद्धि में एक चमक आ गयी थी.

पट्टाभि सीतारमैया- गांधीजी का विचार है कि धनिक वर्ग के संरक्षक के रूप में समाज के लाभ के लिए अपने धन-दौलत की व्यवस्था करता है. एक तरह से वह समाज का संरक्षक है. इस प्रकार गांधी जी की परिभाषा की कसौटी पर एक ही व्यक्ति खरा उतरता है. यदि ऐश्वर्य सेवा वृत्ति में सहायक है, तो केवल एक ही व्यक्ति ऐसा है, जिसने अपने ऐश्वर्य अपने देशवासियों के कष्टों और मुसीबतों को कम करने की भरसक चेष्टा की है. यदि अहिंसा का अर्थ यह है कि उसके कारण शत्रु या मित्र या ऊंच-नीच में किसी प्रकार के भेदभाव की गुंजाइश नहीं रहती, तो सिर्फ एक ही व्यक्ति ऐसा है, जिसके विशाल हृदय में मनुष्य और पशु के लिए एक समान भाव रहता है. उसके लिए दोनों की ही सहायता करना सेवा कार्य था. यदि पृथ्वी पर जन्म लेकर मनुष्य का परम कर्तव्य मानव जीवन से पूर्ण लाभ उठाना है, तो एक ही व्यक्ति ऐसा है, जिसका जीवन इतना व्यापक और कठोर परिश्रम करने वाला था. यदि इस नश्वर जगत में जीवन की सफलता का मूल्यांकन जीवन की अवधि के बजाय व्यक्ति के नैसर्गिक गुणों के आधार पर किया जाता है तो केवल एक ही व्यक्ति ऐसा है, जो अपने त्याग, आत्मोत्सर्ग, संयम, निर्मोही और विरक्‍त तथा विनम्र स्वभाव, सद्‍भाव और मनुष्यमात्र के प्रति अपने प्रेमभाव के कारण अपने जीवन को सफल कह सकता है और वह व्यक्ति है- सेठ जमनालाल बजाज.

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