GANDHI IN ACTION network

the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

Questions on Education with Mahatma Gandhi—XVI

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

E-mail- dr.yadav.yogendra@gandhifoundation.net;             dr.yogendragand...

 

मैं बुनकर, किसान और शिक्षक के लड़कों में कोई भेद नहीं होने दे सकता – महात्मा गांधी

मैं ऐसी स्थिति लाना चाहता हूं, जिसमें सबका सामाजिक दरज़ा समान माना जाय। मजदूरी करने वाले वर्गों को सैकड़ों वर्षों से सभ्‍य समाज से अलग रखा गया है और उन्‍हें नीचा दरज़ा दिया गया है। उन्‍हें शूद्र कहा गया है और इस शब्‍द का यह अर्थ किया गया है कि वे दूसरे वर्गों से नीचे हैं। मैं बुनकर, किसान और शिक्षक के लड़कों में कोई भेद नहीं होने दे सकता।

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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आर्थिक समानता अहिंसापूर्ण स्वराज्य की मुख्य चाबी है- महात्मा गांधी

रचनात्‍मक काम य‍ह अंग अहिंसापूर्ण स्‍वराज्‍य की मुख्य चाबी है। आर्थिक समानता के लिए काम करने का मतलब है, पूंजी और मजदूरी के बीच के झगड़ों को हमेशा के लिए मिटा देना। इसका अर्थ यह होता है कि एक ओर सो जिन मुठ्टीभर पैसे वाले लोगों के हाथ में राष्‍ट्र की संपत्ति का बड़ा भाग इकठ्टा हो गया है, उनकी संपत्ति को कम करना और दूसरी ओर से जो करोड़ो लोग अधपेट खाते और नंगे रहते है, उनकी संपत्ति में वृद्धि करना। जब तक मुठ्टीभर धनवानों और करोड़ों भूखे रहने वालों के बीच बेइन्‍तहा अन्‍तर बना रहेगा, तब तक अहिंसा की बुनियाद पर चलने वाली राज्‍य-व्‍यवस्‍था कायम नहीं हो सकती। आज़ाद हिन्‍दुस्‍तान में देश के बड़े-से-बड़े धनवानों के हाथ में हुकूमत का जितना हिस्‍सा रहेगा, उतना ही गरीबों के हाथ में भी होगा; और तब नई दिल्‍ली के महलों और उनकी बगल में बसी हुई गरीब मजदूर-बस्तियों के टूटे-फूटे झोंपड़ों के बीच जो दर्दनाक फर्क आज नज़र आता है वह एक दिन को भी नहीं टिकेगा। अगर धनवान लोग अपने धन को और उसके कारण्‍ा मिलने वाली सत्‍ता को खुद राजी-खुशी से छोड़कर और सबके कल्‍याण के लिए सबके साथ मिलकर बरतने को तैयार न होंगे, तो यह तय समझिये कि हमारे देश में हिंसक और खूंख्‍वार क्रांति हुए बिना न रहेगी। ट्रस्‍टीशिप या सरपरस्‍ती के मेरे सिद्धांत का बहुत मज़ाक उड़ाया गया है, फिर भी मैं उस पर कायम हूं। यह सच है कि उस तक पहुंचने यानी उसका पूरा-पूरा अमल करने का काम कठिन है। क्‍या अहिंसा की भी यही हालत नहीं है? फिर भी 1920 में हमने यह सीधी चढ़ाई चढ़ने का निश्‍चय किया था।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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विकेन्द्रीकरण ही भारत के विकास का विकल्प- महात्मा गांधी

मेरी सूचना है कि यदि भारत को अपना विकास अहिंसा की दिशा में करना है, तो उसे बहुत-सी चीजों का विकेन्‍द्रीकरण करना पड़ेगा। केन्‍द्रीकरण किया जाय तो फिर उसे कायम रखने के लिए और उसकी रक्षा के लिए हिंसाबल अनिवार्य है। जिनमें चोरी करने या लूटने के लिए कुछ है ही नहीं ऐसे सादे घरों की रक्षा के लिए पुलिस की जरूरत नहीं होती। लेकिन धनवानों के महलों के लिए अवश्‍य बलवान पहरेदार चाहियें, जो डाकुओं से उनकी रक्षा करें। यही बात बड़े-बड़े कारखानों की है। गांवो को मुख्‍य मानकर जिस भारत का निर्माण होगा उसे शहर-प्रधान भारत की अपेक्षा-शहर-प्रधान भारत जल, स्‍थल और वायुसेनाओं से सुसज्जित होगा, तो भी-विदेशी आक्रमण का कम खतरा रहेगा।

 

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समाजवाद का आधार आर्थिक समानता है – महात्मा गांधी

आज तो बहुत ज्‍यादा और इसलिए बहुत भद्दी आर्थिक असमानता है। समाजवाद का आधार आर्थिक समानता है। अन्‍यायपूर्ण असमानताओं की इस हालत में, जहां चंद लोग मालामाल हैं और सामान्‍य प्रजा को भरपेट खाना भी नसीब नहीं होता, रामराज्‍य कैसे हो सकता है?

 

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समाजवाद के आर्थिक सिद्धांत जानने के बाद मैंने ट्रस्टीशिप का सिद्धांत बनाया- महात्मा गांधी

फर्ज कीजिये कि विरासत के या उद्योग-व्‍यवसाय के द्वारा मुझे प्रचुर सम्‍पत्ति मिल गई। तब मुझे यह जानना चाहिये कि वह सब समपत्ति मेरी नहीं हैं, बल्कि मेरा तो उस पर ईतना अधिकार है कि जिस तरह दूसरे लाखों आदमी गुजर करते हैं उसी तरह मैं भी इज्जत के साथ अपना गुजर भर करूं। मेरी शेष सम्‍पत्ति पर राष्‍ट्र का हक है और उसी के हितार्थ उसका उपयोग होना आवश्‍यक है। इस सिद्धांत का प्रतिपादन मैंने तब किया था, जब की जमींदारों और राजाओं की सम्‍पत्ति के संबंध में समाजवादी सिद्धांत देश सामने आया था। समाजवादी इस सुविधा-प्राप्‍त वर्गों को खतम कर देना चाहते हैं, जब की मै यह चाहता हूं कि वे ( जमींदार और राजा-महाराजा ) अपने लोभ और सम्‍पत्ति के बावजूद उन लोगों के समकक्ष बन जायें जो मेहनत करके रोटी कमाते हैं। मजदूरों को भी यह महसूस करना होगा कि मजदूर का काम करने की शक्ति पर जितना अधिकार है, मालदार आदमी का अपनी सम्‍पत्ति पर उससे भी कम है।

 

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अहिंसक व्यक्ति ही ट्रस्टीशिप के सिद्धांत का पालन कर सकता है- महात्मा गांधी

यह दूसरी बात है कि इस तरह के सच्‍चे ट्रस्‍टी कितने हो स‍कते हैं, अगर सिद्धांत ठीक हैं, तो यह बात गौण है कि उनका पालन अनेक लोग कर सकते हैं या केवल एक ही आदमी कर सकता है। यह प्रश्‍न आत्‍मविश्‍वास का है। अगर आप अहिंसा के सिद्धांत को स्‍वीकार करें, तो आपको उसके अनुसार आचरण करने की कोशिश करनी चाहिये, चाहें उसमें आपको सफलता मिले या असफलता। आप यह तो कह सकते हैं कि इस पर अमल करना मुश्किल है, लेकिन इस सिद्धांत में ऐसी कोई बात नहीं है जिसके लिए यह कहा जा सके कि वह बुद्धिग्राह्रा नहीं है।

 

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ट्रस्टीशिप सिर्फ कल्पनामात्र नहीं – महात्मा गांधी

आप कह सकते हैं कि ट्रस्‍टीशिप तो कानून-शास्‍त्र की एक कल्‍पना मात्र है; व्‍यवहार में उसका कही कोई अस्तित्‍व दिखाई नहीं पड़ता। लेकिन यदि लोग उस पर सतत विचार करें और आचरण में उतारने की कोशिश भी करते रहें, तो मनुष्‍य-जाति के जीवन के नियामक शक्ति के रूप में प्रेम आज जितना प्रभावशाली दिखाई देता है, उससे कहीं अधिक दिखाई पड़ेगा। बेशक, पूर्ण ट्रस्‍टीशिप तो युक्लिड की बिन्‍दु की व्‍याख्‍या की तरह एक कल्‍पना ही है और उतनी ही अप्राप्‍य भी है। लेकिन यदि उसके लिए कोशिश की जाए, तो दुनिया मे समानता की स्‍थापना की दिशा में हम दूसरे किसी उपाय से जितनी दूर तक जा सकते हैं, उसके बजाए इस उपाय से ज्‍यादा दूर तक जा सकेंगे। …… मेरा दृढ़ निश्‍चय है कि यदि राज्‍य मे पूंजीवाद को हिंसा के द्वारा दबाने की कोशिश की, तो वह खुद ही हिंसा के जाल में फंस जायेगा और फिर कभी भी अहिंसा का विकास नहीं कर सकेगा। राज्‍य हिंसा का एक केन्द्रित और संघटित रूप ही है। व्‍याक्ति में आत्‍मा होती है, परंतु चूंकि राज्‍य एक जड़ यंत्र मात्र है इसलिए उसे हिंसा से कभी नहीं छुड़ाया जा सकता। क्‍योंकि हिंसा से ही तो उसका जन्‍म होता है। इसीलिए मैं ट्रस्‍टीशिप के सिंद्धांत को तरजीह देता हूं। यह डर हमेशा बना रहता है कि राज्‍य उन लोगों के खिलाफ, जो उससे मतभेद रखते हैं, बहुत ज्‍यादा हिंसा का उपयोग न करे। लोग यदि स्‍वेच्‍छा से ही ट्रस्टियों की तरह व्‍यवहार करने लगें, तो मुझे सचमुच बड़ी खुशी होगी। लेकिन यदि वे ऐसा न करें तो मेरा खयाल है कि हमें राज्‍य के द्वारा भरसक कम हिंसा का आश्राय लेकर उनसे उनकी सम्‍पत्ति ले लेनी पड़ेगी।… ( यही कारण है कि मैंने गोलमेज़ परिषद में यह कहा था कि सभी निहित हित वालो की सम्‍पत्ति की जांच होनी चाहिये और जहां आवश्‍यक मालूम हो वहां उनकी सम्‍पत्ति राज्‍य को… मुआवजा देकर या मुआवजा दिये बिना ही, जहां जैसा उचित हो, अपने हाथ में कर लेनी चाहिये। ) व्‍यक्तिगत तौर पर तो मैं यह चाहूंगा की राज्‍य के हाथो में शक्ति का ज्‍यादा केन्‍द्रीकरण न हो, उसके बजाय ट्रस्‍टीशिप की भावना का विस्‍तार हो। क्‍योंकि मेरी राय में राज्‍य की हिंसा की तुलना में वैयक्तिक मालिकी की हिंसा कम हानीकार है। लेकिन यदि राज्‍य की मालिकी अनिवार्य ही हो, तो मै भरसक कम-से-कम राज्‍य की मालिकी की सिफारिश करूंगा।

 

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समाज के हर चीज की व्यवस्था भारतीय संस्कृति के अनुरूप होनी चाहिए- महात्मा गांधी

आजकल यह कहना फैशन हो गया है कि समाज को अहिंसा के आधार पर न तो संघटित किया जा सकता है और न चालाया जा सकता है। मैं इस कथन का विरोध करता हूं। परिवार में जब पिता अपने पुत्र को अपराध करने पर थप्‍पड़ मार देता हैं, तो पुत्र उसका बदला लेने की बात नहीं सोचता। वह अपने पिता की आज्ञा इसलिए स्‍वीकार कर लेता है कि इस थप्‍पड़ के पिछे वह अपने पिता के प्‍यार को आहत हुआ देखता है, इसलिए नहीं की थप्‍पड़ उसे वैसा अपराध दुबारा करने से रोकता है। मेरी राय में समाज की व्यवस्था इस तरह होनी चाहिये; यह उसका एक छोटा रूप है। जो बात परिवार के लिय सही है, वही समाज के लिए भी सही है; क्‍योंकि समाज एक बड़ा परिवार ही है।

 

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अहिंसा एक सामाजिक गुण है- महात्मा गांधी

मेरी धारणा है कि अहिंसा केवल वैयक्तिक गुण नहीं है। वह एक सामाजिक गुण भी है और अन्‍य गुणो की तरह उसका भी विकास किया जाना चाहियें। यह तो मानना ही होगा कि समाज के पारस्‍परिक व्‍यवहारों का नियमन बहुत हद तक अहिंसा के द्वारा होता हैं। मैं इतना ही चाहता हूं कि इस सिद्धांत का बड़े पैमाने पर, राष्‍ट्रीय और अंतर्राष्‍ट्रीय पैमाने पर विचार किया जाय।

 

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ट्रस्टीशिप का सिद्धांत कोर्इ नर्इ चीज नहीं – महात्मा गांधी

मेरा ट्रस्‍टीशिप का सिद्धांत कोई ऐसी चीज नहीं है, जो काम निकालने के लिए आज गढ़ लिया गया हो। अपनी मंशा छिपाने के लिए खड़ा किया गया आवरण तो वह हरगिज नहीं है। मेरा विश्‍वास है कि दूसरे सिद्धांत जब नहीं रहेंगे तब भी वह रहेगा। उसके पिछे तत्‍वज्ञान और धर्म के समर्थन का बल हैं। धन के मालिकों ने इस सिद्धांत के अनुसार आचरण नहीं किया है, इस बात से यह सिद्ध नहीं होता कि वह सिद्धांत झूठा है; इससे धन की मालिकों की कमजोरी मात्र सिद्ध होती है। अहिंसा के साथ किसी दूसरे सिद्धांत का मेल नहीं बैठता। अहिंसक मार्ग की खूबी यह है कि अन्‍यायी यदि अपना अन्‍याय दूर नहीं करता, तो वह अपना नाश खुद ही कर डालता है। क्‍योंकि अहिंसक असहयोग के कारण या तो वह अपनी गलती देखने और सुधारने के लिए मजबूर हो जाता है या वह बिलकुल अकेला पड़ जाता है।

 

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धनवान पैसा किस तरह कमाते हैं, इस पर विचार होना चाहिए- महात्मा गांधी

मै इस राय के साथ नि:संकोच अपनी सम्‍मति जाहिर करता हूं कि आमतौर पर धनवान-केवल धनवान ही क्‍यों, बल्कि ज्‍यादातर लोग-इस बात का विशेष विचार नहीं करते कि वे पैसा किस तरह कमाते हैं। अहिंसक उपाय का प्रयोग करते हुए यह विश्‍वास तो होना ही चाहिये की कोई आदमी कितना ही पतित क्‍यों न हो, यदि उसका इलाज कुशलतापूर्वक और सहानुभूति के साथ किया जाय तो उसे सुधारा जा सकता हैं। हमें मनुष्‍यों में रहने वाले दैवी अंश को प्रभावित करना चाहिये और अपेक्षा करनी चाहिये कि उसका अनुकूल परिणाम निकलेगा। यदि समाज का हर एक सदस्‍य अपनी शक्तियों का उपयोग वैयक्तिक स्‍वार्थ साधने के लिए नहीं, बल्कि सबके कल्‍याण के लिए करे, तो क्‍या इससे समाज की सुख-समृद्धि में वृद्धि नहीं होगी ? हम ऐसी जड़ समानता का निर्माण नहीं करना चाहते, जिसमें कोई आदमी योग्‍यताओं का पूरा-पूरा उपयोग कर ही न सके। ऐसा समाज अंत में नष्‍ट हुए बिना नहीं रह सकता। इसलिए मेरी सलाह बिलकुल ठीक है कि धनवान लोग चाहे करोड़ों रूपये कमायें (बेशक, ईमानदारी से) ; लेकिन उसका उद्देश्‍य वह सारा पैसा सबके कल्‍याण में समर्पित कर देने का होना चाहिये। ‘ तेन त्‍यक्‍तेन भुंजीथा: ‘ मंत्र में असाधारण्‍ा ज्ञान भारा पड़ा है। मौज़ुदा जीवन-पद्धति की जगह, जिसमें हर एक आदमी पड़ोसी की परवाह किये बिना केवल अपने ही लिए जीता है, सर्व- कल्‍याणकारी नयी जीवन-पद्धति का विकास करना हो, तो उसका सबसे निश्चित मार्ग यही है।

 

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हमारे पुरखों ने भोग की हद बांध दी थी – महात्मा गांधी

हमने देखा कि मनुष्‍य की वृत्तियां चंचल उसका मन बेकार की दौड़-धूप किया करता है। उसका शरीर जैसे-जैसे ज्‍यादा देते जायें वैसे-वैसे ज्‍यादा मांगता जाता है। ज्‍यादा लेकर भी वह सुखी नहीं होता। भोग भोगने से भोग की इच्‍छा बढ़ती जाती है। इसलिए हमारे पुरखों ने भोग की हद बांध दी। बहुत सोचकर उन्‍होंने देखा कि सुख-दु:ख तो मन के कारण है। अमीर अपना अमीरी की वजह से सुखी नहीं है, गरीब अपनी गरीबी के कारण दुखी नहीं है। अमीर दुखी देखने में आता है और गरीब सुखी देखने में आता है। करोड़ों लोंग तो गरीब ही रहेंगे, ऐसा देखकर पूर्वजों ने भोग की वासना छुड़वाई। हजारों साल प‍हले जो हल काम लिया जाता था उससे हमने काम चलाया। हजारों साल पहले जैसे झोंपड़े थे उन्‍हें हमने कायम रखा। हजारों पहले जैसी हमारी शिक्षा थ‍ी वही चलती आई। हमने नाशकारक होड़ को जगह नहीं दी। सब अपना-अपना धंध करते रहे। उसमें उन्‍होंने दस्‍तूर के मुताबिक दाम लिये। ऐसा नहीं था कि हमें यंत्र वगैरा की खोज करना ही नहीं आता था। लेकिन हमारे पूर्वजों ने देखा की लोग अगर यंत्र वगैरा की झंझट में पड़ेंगे, तो गुलाम ही बनेंगे और अपनी नी‍ति को छोड़ देंगे। उन्‍होंने सोच-समझकर कहा कि हमें अपने हाथ-पैरों से जो काम हो सके वही करना चाहिये। हाथ-पैरों का इस्‍तेमाल करने में ही सच्‍चा सुख है, उसी में तन्‍दुरूस्‍ती है। उन्‍होंने सोचा कि बड़े शहर कायम करना बेकार की झंझट है। उनमें लोग सुखी नहीं होंगे। उनमें धूर्तो की टोलियां और वेश्‍याओं की गलियां पैदा होंगी; गरीब अमीरों से लूटे जायेंगे। इसलिए उन्‍‍होंने छोटे गांवों से ही संतोष माना। उन्‍होंने देखा की राजाओं और उनकी तलवार की बनिस्‍बत नीति का बल ज्‍यादा बलवान है। इसलिए उन्‍होंने राजाओं को नीतिवान पुरूषों-ऋषियों और फकीरों-से कम दरजें का माना। ऐसी जिस प्रजा का गठन है, वह प्रजा दूसरों को सिखाने लायक है; वह दूसरों से सीखने लायक नहीं है।

 

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पहले इस राष्ट्र की सभी चीजें नियम के मुताबिक चलती थीं – महात्मा गांधी

इस राष्ट्र में अदालतें थीं, वकील थे, डॉक्‍टर-वैद्य थे। लेकिन वे सब ठीक ढंग से नियम के मुताबिक चलते थे। सब जानते थे कि ये धंधे बड़े धंधे नहीं हैं। और वकील, डॉक्‍टर वगैरा लोगों में लूट नहीं चाहते थे, वे तो लोगों के आश्रित थे। वे लोगों के मालिक बनकर नहीं रहते थे। इन्‍साफ काफी अच्‍छा होता था। अदालतों में न जाना लोगों का ध्‍येय था। उन्‍हें भरमानें वाला स्‍वार्थी लोग समाज में नहीं थे। इतनी सड़न भी सिर्फ राजा और राजधानी के आस-पास ही थी। यों आम प्रजा तो उनसे स्‍वतंत्र रहकर अपने खेतों का मालिकी हक भोगती थी-खेती करके अपना निर्वाह करती थी। उसके पास सच्‍चा स्‍वराज्‍य था।

 

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नम्रता एक उपयोगी गुण – महात्मा गांधी

ऐसी नम्रता-शून्‍यता-आदत डालने कैसे आ सकती है? लेकिन व्रतों को सही ढंग से समझनें से नम्रता अपने-आप आने लगती है। सत्‍य का पालन करने की इच्‍छा रखने वाला अहंकारी कैसे हो स‍कता है? दूसरे के लिए प्राण न्‍यौछावर करने वाला अपनी जगह बनाने कहां जाय? उसने तो जब प्राण न्‍यौछावर करने का निश्‍चय किया तभी अपनी देह को फेंक दिया। ऐसी नम्रता का मतलब पुरूषार्थ का अभाव तो नहीं हैं? ऐसा अर्थ हिन्‍दू धर्म में कर डाला गया है सही। और इसलिए आलस्‍य की ओर पाखंड को बहुतेरे स्‍थानों पर जगह मिल गई है। सचमुच तो नम्रता के मानी हैं तीव्रतम पुरूषार्थ, सख्‍त-से-सख्‍त मेहनत। लेकिन वह सब परमार्थ के लिए होना चाहिये। ईश्‍वर खुद चौबीसों घण्‍टे एक सांस से काम करता रहता है, अंगड़ाई लेने तक की फुरसत नहीं लेता। उसके हम हो जायं, उसमें हम मिल जायं, तो हमारा उद्यम उसके जैसा ही अतंद्रित हो जायेगा-होना चाहिये।

 

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सेवा के नाम पर किया गया और उसे समर्पित किया गया कोई भी काम छोटा नहीं है – महात्मा गांधी

सेवा के नाम पर किया गया और उसे समर्पित किया गया कोई भी काम छोटा नहीं है। इस तरह किये गये हर एक छोटे या बड़े काम का समान मूल्‍य है। कोई भंगी यदि अपना काम भगवान की सेवा की भवना से करता हो तो उसके और उस राजा के काम का, जो अपनी प्रतिभा का उपयोग भगवान के नाम पर और ट्रस्‍टी की तरह करता है, समान महत्‍व है।

 

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अहिंसा का पुजारी उपयोगितावाद का समर्थन नहीं करता – महात्मा गांधी

अहिंसा का पुजारी उपयोगितावाद (बड़ी-से-बड़ी संख्‍या का ज्‍यादा-से-ज्‍यादा हित) का समर्थन नहीं करता। वह तो ‘सर्वभूत-हिताय’ यानी सबके अधितम लाभ के लिए ही प्रयत्‍न करेगा और इस आदर्श की प्राप्ति में मर जायेगा। इस प्रकार वह इसलिए मरना चाहेगा कि दूसरे जी सकें। दूसरों के साथ-साथ वह अपनी सेवा भी आप मरकर करेगा। सबके अधिकतम सुख के भीतर अधिकांश का अधिकतम सुख भी मिला हुआ है। और इसलिए अहिंसावादी और उपयोगितावादी अपने रास्‍ते पर कई बार मिलेंगे। किन्‍तु अन्‍त में ऐसा भी अवसर आयेगा, जब उन्‍हें अलग-अलग रास्‍ते पकड़ने होंगे और किसी-किसी दशा में एक-दूसरे का विरोध भी करना होगा। तर्कसंगत बने रहने के लिए उपयोगितावादी अपने को कभी बलि नहीं कर सकता। परन्‍तु अहिंसावादी हमेशा मिट जाने को तैयार र‍हेगा।

 

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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सच्‍चा प्रेम समुद्र की तरह निस्‍सीम होता है – महात्मा गांधी

जब तक सेवा की जड़ प्रेम या अहिंसा में न हो तब तक वह सम्‍भव ही नहीं है। सच्‍चा प्रेम समुद्र की तरह निस्‍सीम होता है और ह्दय के भीतर ज्‍वार की तरह उठकर बढ़ते हुए वह बा‍हर फैल जाता है तथा सीमाओं को पार करके दुनिया के छोरों तक जा पहुंचता है। सेवा के लिए आवश्‍यक दूसरी चीज है शरीर-श्रम, जिसे गीता में यज्ञ कहा गया है; शरीर-श्रम के बिना भी सेवा असंभव है। सेवा के लिए जग कोई पुरूष या स्‍त्री शरीर-श्रम करती है, तभी उसे जीने का अधिकार प्राप्‍त होता है।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

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अहंकार सभी दोषों को प्रश्रय देता है – महात्मा गांधी

जब तक हम अपना अहंकार भूलकर शून्‍यता की स्थिति प्राप्‍त नहीं करते, तब तक हमारे लिए अपने दोषों को जीतना संभव नहीं है। ईश्‍वर पूर्ण आत्‍म-समर्पण के बिना संतुष्‍ट नहीं होता। वास्‍तविक स्‍वतंत्रता का मूल्‍य वह अवश्‍य चाहता है। और जब मनुष्‍य अपना ऐसा समर्पण कर चुकता है तब तुरन्‍त ही अपने को प्राणिमात्र की सेवा में लीन पाता है। यह सेवा ही तब उसके आनन्‍द और आमोद का विषय हो जाती है। तब वह एक बिल्‍कुल नया ही आदमी बन जाता है और ईश्‍वर की स सृष्टि की सेवा में अपने को खपाते हुए कभी नहीं थ‍कता।

 

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सत्य की भक्ति के कारण ही हमारी हस्ती है – महात्मा गांधी

इस सत्‍य की भक्ति के कारण ही हमारी हस्‍ती हो। उसी के लिए हमारा हर एक काम, हर एक प्रवृत्ति हो। उसी के लिए हम हर सांस लें। ऐसा करना हम सीखें तो दूसरे सब नियमों के पास भी आसानी से पहुंच सकते हैं; और उनका पालन भी आसान हो जायेगा। सत्‍य के बगैर किसी भी नियम का शुद्ध पालन नामुमकिन है।

 

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सत्यशोधक परिग्रह नहीं कर सकता – महात्मा गांधी

सत्‍य की खोज करने वाला, अहिंसा बरतने वाला परिग्रह नहीं कर सकता। परमात्‍मा परिग्रह नहीं करता। अपने लिए जरूरी चीज वह रोज की रोज पैदा करता है। इसलिए अगर हम उस पर पूरा भरोसा रखते है, तो हमें समझना चाहिये कि हमारी जरूरत की चीज़े वह रोजाना देता हैं, और देगा।

 

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साधन और साध्‍ को अलग करने वाली कोई दीवार नहीं हैं – महात्मा गांधी

लोग कहते है, ‘आखिर साधन तो साधन ही है ।’ मैं कहूंगा ‘आखिर तो साधन ही सब कुछ हैं ।’ जैसे साधन होंगे वैसे ही साध्‍य होंगा । साधन और साध्‍य को अलग करने वाली कोई दीवार नहीं हैं। वास्‍तव में सृष्टिकर्ता ने हमें साधनों पर नियंत्रण (और वह भी बहुत सीमित नियंत्रण) दिया हैं; साध्‍य पर तो कुछ भी नहीं दिया है । लक्ष्‍य के सिद्धि ठीक उतनी ही सिद्ध होती है, जितने हमारे साधन सिद्ध होते हैं। यह बात ऐसी है जिसममें किसी अपवाद की गुंजाइश नहीं है। हिंसा पूर्ण उपायों से लिया गया स्‍वराज्‍य भी हिंसकपूर्ण होगा और वह दुनिया के लिए तथा खुद भारत के लिए भय का कारण सिद्ध होगा ।

 

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गंदे साधनों से मिलने वाली‍ चीज भी गंदी ही होगी -  महात्मा गांधी

गंदे साधनों से मिलने वाली‍ चीज भी गंदी ही होगी। इसलिए राजा को मारकर राजा और प्रजा एक से नहीं बन सकेंगे । मालिक का सिर काटकर मजूदर मा‍लिक नहीं हो सकेंगे । यही बात सब पर लागू की जा सकती हैं ।

 

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कोई असत्‍ से सत्‍ को नहीं पा सकता – महात्मा गांधी

कोई असत्‍य से सत्‍य को नहीं पा सकता । सत्‍य को पाने के लिए हमेशा सत्‍य का आचरण करना ही होगा । अहिंसा और सत्‍य की तो जोड़ी है न ? हरगिज नहीं । सत्‍य में अहिंसा छिपी हुई और अहिंसा में सत्‍य । इसीलिए मैंने कहा है कि सत्‍य और अहिंसा एक ही सिक्‍के के दो रूख हैं । दोनों की कीमत एक ही है । केवल पढ़ने में ही फर्क है; एक तरफ अहिंसा है, दूसरी तरफ सत्‍य। पूरी-पूरी पवित्रता के बिना अहिंसा और सत्‍य निभ ही नही सकते।शरीर या मन की अपवित्रता को छिपाने से असत्‍य और हिंसा की पैदा होगीं । इसलिए सत्‍यवादी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिन्‍दुस्‍तान में समाजवाद फैला सकता है ।

 

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प्रकृति की इच्छा है हम अपनी रोटी पसीना बहाकर कमायें – महात्मा गांधी

महान प्रकृति की इच्‍छा तो यही है कि हम अपनी रोटी पसीना बहाकर कमायें। इसलिए जो आदमी अपना एक मिनट भी बेकारी में बिताता है, वह उस हद तक अपने पड़ोसियों पर बोझ बनता है। और ऐसा करना अहिंसा के बिलकुल पहले नियम का उल्‍लंघन करना है।….. अहिंसा यदि अपने पड़ोसी के हित का खयाल न हो, तब तो उसका कोई अर्थ ही न रहे। आलसी आदमी अहिंसा की इस प्रारंभिक कसौटी में ही खोटा सिद्ध होता है।

 

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रोटी के लिए हर एक मनुष्‍ को मजदूरी करना चाहिये – महात्मा गांधी

रोटी के लिए हर एक मनुष्‍य को मजदूरी करना चाहिये, शरीर को (कमर को ) झुकाना चाहिये, यह ईश्‍वर का कानून है। य‍ह मूल खोज टॉल्‍स्‍टॉय की नहीं है, लेकिन उससे बहुत कम मशहूर रशियन लेखक टी.एम. बोन्‍दरेव्‍ह की है। टॉल्‍स्‍टॉय ने उसे रोशन किया और अपनाया। इसकी झांकी मेरी आंखे भगवद्गीता के तीसरे में अध्‍याय में करती हैं। यज्ञ किये बिना जो खाता है वह चोरी का अन्‍न खाता है, ऐसा कठिन शाप यज्ञ नहीं करने वाले को दिया गया है। यहां यज्ञ का अर्थ जात-मेहनत या रोटी-मजदूरी ही शोभता है और मेरी राय में यही मुमकिन है।

 

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जो मजदूरी नहीं करता उसे खाने का क्‍या हक है? – महात्मा गांधी

जो भी हो, हमारे इस व्रत का जन्‍म इस तरह हुआ है। बुद्धि भी उस चीज की ओर हमें ले जाती है। जो मजदूरी नहीं करता उसे खाने का क्‍या हक है? बाइबल कहती है; ‘अपनी रोटी तू अपना पसीना बहाकर कमा और खा।’ करोड़पति भी अगर अपने पलंग पर लोटता रहे और उसके मुंह में कोई खाना डाले तब खायें, तो वह ज्‍यादा देर तक खा नहीं सकेगा, इसमें उसको मज़ा भी नहीं आयेगा। इसलिए वह कसरत वगैरा करके भूख पैदा करता है और खाता तो है अपने ही हाथ-मुंह हिलाकर। अगर यों किसी-न-किसी रूप में अंगों की कसरत राजा-रंक सबको करनी ही पड़ती है, तो रोटी पैदा करने की कसरत ही सब क्‍यों न करें? यह सवाल कुदरती तौर पर उठता है। किसान को हवाखोरी या कसरत करने के लिए कोई कहता नहीं है और दुनियाके 90 फीसदी से भी ज्‍यादा लोगों का निर्वाह खेती पर होता है। बाकी के दस फीसदी लोग अगर इनकी नकल करें, तो जगत में कितना सुख, कितनी शांति और कितनी तन्‍दुरूस्‍ती फैल जाये? और अगर खेती के साथ बुद्धि भी मिले, तो खेती से सम्‍बन्‍ध रखने वाली बहुत-सी मुसीबतें आसानी से दूर हो जायेंगी। फिर, अगर इस जात-मेहनत के निरपवाद कानून को सब मानें तो तो ऊंच-नीच का भेद मिट जाय।

 

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आज गरीब धनवान से जलता है – महात्मा गांधी

आज तो जहां ऊंच-नीच की गंध भी नहीं थी वहां यानी वर्ण-व्‍यवस्‍था में भी वह घुस गई है। मालिक-मजदूर का भेद आम और स्‍थायी हो गया है और गरीब धनवान से जलता है। अगर सब रोटी के लिए मजदूरी करें, तो ऊंच-नीच का भेद न र‍हे; और भी धनिक वर्ग रहेगा तो वह खुद को मालिक नहीं बल्कि उस धन का रखवाला या ट्रस्‍टी मानेगा और उसका ज्‍यादातर उपयोग सिर्फ लोगों की सेवा के लिए ही करेगा।
जिसे अहिंसा का पालन करना है, सत्‍य की भक्ति करनी है, ब्रहाचर्य को कुदरती बनाना है, उसके लिए तो जात-मेहनत रामबाण-सी हो जाती है। यह मेहनत सचमुच तो खेती में ही है। लेकिन सब खेती नहीं कर सकते, ऐसी आज तो हालत है ही। इसलिए खेती के आदर्श को खयाल में रखकर खेती के एवज में आदमी भले-दूसरी मजदूरी करे-जैसे कताई, बुनाई, बढ़ईगिरी, लुहारी वगैरा-वगैरा। सबको खुद के भंगी तो बनना ही चाहिये। जो खाता है वह टट्टी तो फिरेगा ही। इसलिए जो टट्टी फिरता है वही अपनी टट्टी जमीन में गाड़ दे यह उत्‍तम रिवाज है। अगर यह नहीं ही हो सके तो प्रत्‍येक कुटुम्‍ब अपना यह फर्ज अदा करे।

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हम सब भंगी है यह भावना हमारे मन बचपन से ही जम जानी चाहिये – महात्मा गांधी

जिस समय समाज में भंगी का अलग पेशा माना गया है, उसमें कोई बड़ा दोष पैठ गया है, ऐसा मुझे तो बरसों से लगता है रहा है । इस जरूरी और तन्‍दुरूस्‍ती बढ़ाने वाले (आरोग्‍य-पोषक) काम से लगता रहा हैं । इस जरूरी और तन्‍दुरूस्‍ती बढ़ाने वाले (आरोग्‍य-पोषक) काम को सबसे नीचा काम पहले-पहल किसने माना, इसका इतिहास हमारे पास नहीं हैं । जिसने माना उसने हम पर उपकार तो नहीं ही किया । हम सब भंगी है यह भावना हमारे मन बचपन से ही जम जानी चाहिये; और उसका सबसे आसान तरीका यह है कि जो समझ गये है वे जात-मेहनत का आरंभ पाखाना-सफाई से करें । जो समझ-बुझकर, ज्ञानपूर्वक यह करेगा, वह उसी क्षण से निराले ढ़ग से और सही तरीके से समझने लगेगा ।

 

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अधिकारों की उत्‍पत्ति का सच्‍चा स्‍त्रोत कर्तव्‍यों का पालन है – महात्मा गांधी

अधिकारों की उत्‍पत्ति का सच्‍चा स्‍त्रोत कर्तव्‍यों का पालन है । यदि हम सब अपने कर्तव्‍यों का पालन करें, तो अधिकारों को ज्‍यादा ढूढ़ने की जरूरत नहीं रहेगी । लेकिन यदि हम कर्तव्‍यों को पूरा किये बिना अधिकारों के पीछे दौड़े तो वह मृग-मरीचिका के पीछे पड़ने जैसा ही वैध सिद्ध होगा । जितने हम उनके पीछे जायेंगे उतने ही वे हमसे दूर हटते जायेंगे । यही शिक्षा श्रीकृष्‍णा ने इन अमर शब्‍दों में दी है: ‘तुम्‍हारा अधिकार कर्म में ही है, फल में कदापि नहीं।’ यहां कर्म कर्तव्‍य है और फल अधिकार।

 

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जीवन की आवश्‍यकताओं को पाने का हर एक आदमी का समान अधिकार है – महात्मा गांधी

जीवन की आवश्‍यकताओं को पाने का हर एक आदमी का समान अधिकार है । यह अधिकार को तो पशुओं और पक्षियों को भी हैं । और चूंकि प्रत्‍येक अधिकार के साथ एक सम्‍बन्‍धित कर्तव्‍य जुड़ा हुआ है और उस अधिकार पर कही से कोई आक्रमण हो तो उसका वैसा ही इलाज भी है, इसलिए हमारी समस्‍या का रूप यह है कि हम उस प्रारंभिक बुनियादी समानता को सिद्ध करने के लिए उस समानता के अधिकार से जुड़े कर्तव्‍य और इलाज ढूंढ़ निकाले । वह कर्तव्‍य यह है कि हम अपने हाथ-पांव से मेहनत करें और वह इलाज यह है कि जो हमारी मेहनत के फल से वंचित करें उसके साथ हम असहयोग करें ।

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यदि सब लोग अपने ही परिश्रम की कमाई खावे तो दुनिया में अन्‍ की कमी रहें – महात्मा गांधी

यदि सब लोग अपने ही परिश्रम की कमाई खावे तो दुनिया में अन्‍न की कमी न रहें, और सबको अवकाश का काफी समय भी मिलें । न तब किसी को जनसंख्‍या वृद्धि की शिकायत रहें, न कोई बिमारी आवे, और न मनुष्‍य को कोई कष्‍ट या क्‍लेश ही सतावे । वह श्रम उच्‍च-से-उच्‍च प्रकार का यज्ञ होगा । इनमें संदेह नही क‍ि मनुष्‍य अपेन शरीर या बुद्धि के द्वारा और भी अनेक काम करेंगे, पर उसका वह सब श्रम लोक-कल्‍याण के लिए प्रेम का श्रम होगा । उस अवस्‍था में न कोई राजा होगा, न कोई रंक; न कोई उच्‍च होगा, न कोई नीच; न कोई स्‍पृश्‍य रहेगा, न कोई अस्‍पृश्‍य । भले ही वह एक अलभ्‍य आदर्श हो, पर इस कारण हमें अपना प्रयन्‍त बन्‍द कर देने की जरूरत नहीं । यज्ञ के सम्‍पूर्ण नियम को अर्थात अपने ‘जीवन के नियम’ को पूरा किये बिना ही अगर हम अपने नृत्‍य के निर्वाह के लिए पर्याप्‍त शारीरिक श्रम करेंगे, तो उस आदर्श के बहुत कुछ निकट तो हम पहुंच ही जायेंगे ।

 

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इस बात की यथार्थता में जिसे शंका हो वह अपने परिश्रम की कमाई खाने का प्रयन्‍ करें – महात्मा गांधी

यदि हम ऐसा करेंगे तो हमारी आवश्‍यकतायें बहुत कम हो जायेगी । और हमारा भोजन भी सादा बन जायेगा । तब हम जीने के लिए खायेंगे, न कि खाने के लिए जीयेंगे । इस बात की यथार्थता में जिसे शंका हो वह अपने परिश्रम की कमाई खाने का प्रयन्‍त करें । अपने पसीने की कमाई खाने में उसे कुछ और ही स्‍वाद मिलेगा, उसका स्‍वास्‍थ्‍य भी अच्‍छा रहेगा, और उसे यह मालूम हो जायेगा कि जो बहुत-सी विलास की चीजें उसने अपने ऊपर लाद रखीं थीं वे सब बिलकुल ही फिजूल थीं ।

 

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शरीर-श्रम के पीछे समाज-सेवा का निश्चित उदे्दश्‍ हो, तभी उसे समाज-सेवा का दरजा मिल सकता है – महात्मा गांधी

बुद्धिपूर्वक किया हुआ शरीर-श्रम समाज-सेवा का सर्वोत्‍कृष्‍ट रूप है । यहां शरीर-श्रम शब्द के साथ ‘बुद्धिपूर्वक किया हुआ’ विशेषण यह दिखाने के लिए जोड़ा गया है कि किये हुए शरीर-श्रम के पीछे समाज-सेवा का निश्चित उदे्दश्‍य हो, तभी उसे समाज-सेवा का दरजा मिल सकता है । ऐसा न हो तब तो कहा जायेगा कि हर एक मजदूर समाज-सेवा करता ही है । वैसे एक अर्थ में यह कथन सही भी है, लेकिन यहां उससे कुछ ज्‍यादा अभीष्‍ट है । वह जरूर समाज की ही सेवा करता है; और उसकी आवश्‍यकतायें पूरी होनी ही चाहिये । इसलिए ऐसा शरीर-श्रम समाज-सेवा से भिन्‍न नहीं है ।

 

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शरीर की आवश्‍यकताएं शरीर द्वारा ही पूरी होनी चाहिये – महात्मा गांधी

क्‍या मनुष्‍य अपने बौद्धिक श्रम से अपनी आजीविका नहीं कमा सकते? नहीं । शरीर की आवश्‍यकताएं शरीर द्वारा ही पूरी होनी चाहिये । केवल मानसिक और बौद्धिक श्रम आत्‍मा के लिए और स्‍वयं अपने ही संतोष के लिए है । उसका पुरस्‍कार कभी नहीं मांगा जाना चाहिये । आदर्श राज्‍य में डाक्‍टर, वकील और ऐसे ही दूसरे लोग केवल समाज के लाभ के लिए काम करेंगे; अपने लिए नहीं । शारीरिक श्रम के धर्म का पालन करने से समाज की रचना में एक शांत क्रांति हो जायेगी । मनुष्‍य की विजय इसमें होगी कि उसने जीवन-संग्राम के बजाय परस्‍पर सेवा के संग्राम की स्‍‍थापना कर दी । पशु-धर्म के स्‍थान पर मानव-धर्म कायम हो जायेगा ।

 

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देहात में लौट जाने का अर्थ – महात्मा गांधी

देहात में लौट जाने का अर्थ यह है कि शरीर-श्रम के धर्म को उसके तमाम अंगों के साथ हम निश्चित रूप में स्‍वेच्‍छापूर्वक स्‍वीकार करते हैं । परन्‍तु आलोचक कहते हैं, ‘भारत की करोड़ों संतानें आज भी देहात में रहती हैं, फिर भी उन्‍हें पेट भर भोजन नसीब नहीं होता ।’ अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि यह बिलकुल सच बात है । सौभाग्‍य से हम जानते हैं कि उनका शरीर-श्रम के धर्म का पालन स्‍वेच्‍छापूर्ण नहीं है । उनका बस चले तो वे शरीर-श्रम कभी न करें और नजदीक के शहर में कोई व्‍यवस्‍था हो जाय तो वहां दौड़कर चले जायं । मजबूर होकर किसी मालिक की आज्ञा पालना गुलामी की स्थिति है, स्‍वेच्‍छा से अपने पिता की आज्ञा मानना पुत्रत्‍व का गौरव है । इसी प्रकार शरीर-श्रम के नियम क विवश होकर पालन करने से दरिद्रता, रोग और संतोष उत्‍पन्‍न होते हैं । यह दासत्‍व की दशा है । शरीर-श्रम के नियम का स्‍वेच्‍छापूर्वक पालन करने से संतोष और स्‍वास्‍थ्‍य मिलता है । और तन्‍दुरूस्‍ती ही असली दौलत है, न कि सोने-चांदी के टुकड़े । ग्रामोद्योग-संघ स्‍वेच्‍छापूर्ण शरीर-श्रम का ही एक प्रयोग है ।

 

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तंदरुस्त आदमी को मुफ्त का खाना देना उचित नहीं – महात्मा गांधी

मेरी अहिंसा किसी ऐसे तन्‍दुरूस्‍त आदमी को मुफ्त खाना देने का विचार बरदाश्‍त नहीं करेगी, जिसने उसके लिये ईमानदारी से कुछ-न-कुछ काम न किया हो; और मेरा वश चले तो जहां मुफ्त भोजन मिलता है, वे सब सदाव्रत मैं बन्‍द कर दूं । इससे राष्‍ट्र का पतन हुआ है और सुस्‍ती, बेकारी, दंभ और अपराधों को भी प्रोत्‍साहन मिला है । इस प्रकार का अनु‍चति दान देश के भौतिक्‍य आध्‍यात्मिक धन की कुछ भी वृद्धि नहीं करता और दाता के मन में पुण्‍यात्‍मा होन का झूठा भाव पैदा करता है । क्‍या ही अच्‍छी और बुद्धिमानी की बात है, यदि दानी लोग ऐसी संस्‍‍थाएं खोल जहां उनके के लिए काम करने वाले स्‍त्री-पुरूष को स्‍वास्‍थ्‍यप्रद और स्‍वच्‍छ हालत में भोजन दिया जाये। मेरा खुद का तो यह विचार है कि चरखा या उससे सम्‍बन्धित क्रियाओं में से कोई भी कार्य आदर्श होगा । परन्‍तु उन्‍हें यह स्‍वीकार न हो तो वे कोई भी दूसरा काम चून सकते है। जो भी हो, नियम यह होना चाहिये कि ‘मेहनत नहीं तो खाना भी नहीं ।’ प्रत्‍येक शहर के लिए भिखमंगों की अपनी-अपनी अलग कठिन समस्‍या है, जिसके लिए धनवान जिम्‍मेदार है । मैं जानता हूं कि आलसियों को मुफ्त भोजन करा देना बहुत आसान है, परन्‍तु ऐसी कोई संस्‍था संगठित करना बहुत कठिन है, जहां किसी को खाना देने से पहले उससे ईमानदारी से काम कराना जरूरी हो । आर्थिक दृष्टि से, कम-से-कम शुरू में, लोगों से काम लेने के बाद उन्‍हें खाना खिलाने का खर्च मौजूदा मुफ्त के भोजनालयों के खर्च से ज्‍यादा होगा । लेकिन मुझे पक्‍का विश्‍वास है कि यदि हम भूमिति की गति से देश में बढ़ने वाले आवारा गर्द लोगों की संख्‍या नहीं बढ़ाना चाहते, तो अंत में यह व्‍यवस्‍था अधिक सस्‍ती पड़ेगी ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

E-mail- dr.yadav.yogendra@gandhifoundation.net;             dr.yogendragand...

 

जो लोग शरीर से लाचार है, जैस लगड़े या विकलांग उसका पोषण राज्‍ को करना चाहिये – महात्मा गांधी

भीख मांगने को प्रोत्‍साहन देना बेशक बुरा है, लेकिन मैं किसी भिखारी को काम और भोजन दिये बिना नहीं लौटाऊंगा । हां, वह काम करना मंजूर न करें तो मैं उसे भोजन के बिना ही चला जाने दूंगा । जो लोग शरीर से लाचार है, जैस लगड़े या विकलांग उसका पोषण राज्‍य को करना चाहिये । लेकिन बनावटी या सच्‍ची अंधता की आड़ में भी काफी धोखा-धड़ी चल रही है। कितने ही ऐसे अंधे है जिन्‍होनें अपनी अंधता का लाभ उठाकर काफी पैसा जमा कर लिया है । वे इस तरह अपनी अंधता का एक अनुचित लाभ उठाये, इसके बजाय यह ज्‍यादा अछा होगा कि उन्‍हें अपाहिजों की देखभाल करने वाली किसी संस्‍था में रख दिया जाये।

 

 

 

 

 

 

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