GANDHI IN ACTION network

the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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प्राप्त हुए कार्य में रत रहें और दूसरी किसी बात का विचार तक न करें- महात्मा गांधी

 

जो अपने कर्तव्य के ही ध्यान में रम जाता है, वह दूसरी वस्तुओं से उदासीन हो जाता है. पत्थर तटस्थ है, परंतु उसे हम जड़ मानते हैं. उसके मुकाबले हम चेतन हैं और इतने पर भी यदि प्राप्त हुए कार्य में रत रहें और दूसरी किसी बात का विचार तक न करें, तो हमारा जीना सफल माना जा सकता है. ऐसी ध्यानावस्था एकाएक नहीं आती.

 

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ग्रामवासियों की एकमात्र आशा नैसर्गिक उपचार और रामनाम में है- महात्मा गांधी

 

प्राकृतिक चिकित्सा को सादगी ही सार्वत्रिक बनाती है. लाखों के लाभ के लिए जो भी चीज होती है, उसमें बहुत पांडित्य की जरूरत नहीं होती है. पांडित्य तो थोड़े ही लोग प्राप्त कर सकते हैं और इसीलिए उससे केवल धनवानों को ही लाभ पहुंच सकता है. परंतु भारत अपने सात लाख छोटे और दूर-दूर बसे हुए गॉंवों में रहता है. मुझे किसी गॉंव में जाकर बसना पसंद है. वही सच्चा भारत, मेरा भारत है. जिसके लिए मैं जिंदा हूं. आप इन गरीब लोगों तक बड़ी डिग्रियां रखने वाले डॉक्‍टरों और अस्पताल के ऊंचे मॅंहगें साधनों का लवा जामा ले जा सकते हैं. ग्रामवासियों की एकमात्र आशा नैसर्गिक उपचार और रामनाम में है.

 

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मुहम्मद अली- पं. जवाहरलाल नेहरु

 

रुचि और अरुचि में वे बहुत सख्त आदमी थे.  वह प्रबल धार्मिक और मेरी समझ से बुद्धि विरुद्ध धार्मिक थे. उनमें सरगर्मी, अतिशय कार्यशक्ति और प्रखर बुद्धि थी. वह बड़े चपल वाकपटु थे. लेकिन कभी-कभी उनका भयंकर व्यंग दिल को चोट पहुंचा देता था और इससे उनके बहुतेरे दोस्त कम हो गये थे. कोर्इ बढ़िया टिप्पणी मन में आयी तो उसे मन में रख लेना उनके लिए असम्भव था- फिर उसका नतीजा कुछ भी हो.

 

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जो भी वस्तु नैतिक मूल्यों के साथ सुसंगत है, उसे मौजूद रहने का अधिकार है- महात्मा गांधी

 

जो भी वस्तु नैतिक मूल्यों के साथ सुसंगत है, उसे मौजूद रहने का अधिकार है. इसके विपरीत बुरार्इ केवल इस कारण से टिके रहने का अधिकार नहीं है कि वह बहुत समय से चली आर्इ है. हम निष्पक्ष न्याय चाहते हैं. स्वाधीन भारत सब प्रकार के स्थापित स्वार्थों को मिटा दे, तो हमें कोर्इ आपत्ति नहीं है. हम तो इतना ही चाहते हैं कि हमारे विरुद्ध खास तौर पर कोर्इ भेदभाव न किया जाये. न्याय परायण मनुष्य को स्वाधीन भारत से किसी भी तरह का डर रखने की जरूरत नहीं है.

 

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हम ऐसे देश के वासी हैं,

 

भंगी बस्ती में गांधीजी की प्रार्थना में एक हिन्दी भजन गाया गया था. जिसमें महात्मा गांधी के अनुसार स्वतंत्र भारत की तस्वीर क्‍या हो, इसका दर्शन होता है. वह भजन इस प्रकार है-

 

हम ऐसे देश के वासी हैं,

जहां शोक नहीं और आह नहीं.

जहां मोह नहीं और ताप नहीं,

जहां भरम नहीं और चाह नहीं

जहां प्रेम की गंगा बहती है,

सब सृष्टि आनंदित रहती है,

जो है या एक जहेती है,

दिन रात नहीं, सन्‌ माह नहीं,

सबको है सब कुछ मिला हुआ,

या सब सौदा है तुला हुआ,

एक सांचे में सब ढला हुआ,

कुछ कमीं नहीं, परवाह नहीं,

जहां स्वारथ के नाम रूप नहीं,

कोर्इ खास नहीं, कोर्इ आम नहीं,

कोर्इ करता और गुलाम नहीं,

जहां दीप्ति रहती है, पर दाह नहीं,

तेरे अंतर में वह है,

वह स्वराज्य और स्वदेशी है,

जय, जय, जय, जय !

जय चाहने से मिलती है.

 

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गांधीजी के समीप रहने वालों की विशेषतायें

 

  1. पं. जवाहरलाल नेहरु- बुद्धिवादी और क्रांतिकारी
  2. सी. राजगोपालाचारी- सूक्ष्मदृष्टि और प्रतिभाशाली
  3. डॉ. राजेन्द्र प्रसाद- मानवतावादी और देशभक्‍त
  4. मौलाना अबुल कलाम आजाद- प्रगाढ़ पंडित और धर्म शास्त्री
  5. सरोजिनी नायडू- मातृतुल्य वात्सल्य बरसाने वाली
  6. सरदार वल्लभभार्इ पटेल- लौहपुरुष

 

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राजनीति में गांधीजी हमारे ही खेल में हमें हरा देते हैं- मोतीलाल नेहरु

मुझे गांधीजी की आध्यात्मिकता पर विश्वास नहीं है और न भविष्य में कभी होगा. मैंने उनसे कह दिया है कि कम से कम इस जीवन में तो मेरा र्इश्वर में भी कभी विश्वास नहीं होगा. परंतु हम देखते हैं कि राजनीति में गांधीजी हमारे ही खेल में हमें हरा देते हैं.

 

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महात्मा गांधी का जूते न पहनने का व्रत- काका साहब कालेलकर

 

शांतिनिकेतन से महात्मा गांधी बर्मा अपने मित्र डॉ. मेहता से मिलने गये. कुछ दिन बाद वे शांति निकेतन लौटे. हमारा रोटी वाला प्रयोग चल रहा था. इतने में पूना से तार आया कि गोखले जी का देहांत हो गया. गांधीजी ने तुरंत पूना जाने का निश्चय किया. इसके पहले गोखले जी उनसे कहा करते थे- सर्वेंट ऑफ इंडिया सोसायटी के सदस्य बन जाओ. लेकिन गांधीजी ने निश्चय नहीं किया था. अपने राजनीतिक गुरु की मृत्यु के पश्चात उनकी यह अंतिम इच्छा गांधीजी के लिए आज्ञा के समान हो गयी. वे पूना गये और सर्वेंट ऑफ इंडिया सोसायटी में प्रवेश पाने के लिए अर्जी दे दी.

अर्जी पाकर गोखले जी के अन्य शिष्य घबरा उठे. वह सारा किस्सा माननीय शास्त्री जी ने दो तीन जगह अपनी अप्रतिम भाषा में वर्णन किया है. सार यह है कि वे जानते थे कि गांधीजी को वे हजम नहीं कर सकेंगे. किन्तु गोखले जी के राजनीतिक सिद्धांतों को गांधीजी मानते थे. ऐसी हालत में उनकी अर्जी अस्वीकार कैसे की जाये. इसी असमंजस में वे पड़े थे. लेकिन परिस्थिति को समझ कर गांधीजी ने अपनी अर्जी वापस ले ली और अपने गुरु भाइयों को संकट से मुक्‍त कर दिया. फिर भी अवैध रूप से सोसायटी के जलसों में वे उपस्थित रहते और संस्थाओं को उन्होंने समय-समय पर मदद की.

गोखले के देहांत का समाचार सुनते ही गांधीजी ने एक साल के लिए जूते न पहनने का व्रत लिया. इस कारण उन्हें काफी तकलीफ हुर्इ. किन्तु उन्होंने यह व्रत अच्छी तरह निबाहा.

 

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पैसे कैरियर के त्याग को मैं त्याग नहीं समझता- महात्मा गांधी

 

शायद 1915 के आखिरी दिनों की बात होगी. बापू कुछ लिख रहे थे. मैं (काका साहब कालेलकर) पास बैठ कर उमर खय्याम की रुबाइयात का अनुवाद पढ़ रहा था. फिट्ज जेरल्ड के अनुवाद की तारीफ मैंने बहुत सुनी थी, किन्तु उसे पढ़ा नहीं था. अपना इतना अज्ञान कम करने की दृष्टि से मैंने वह किताब ली और चाव के साथ पढ़ने लगा. किताब करीब-करीब पूरी होने को थी, इतने में बापू का ध्यान मेरी ओर गया. पूछा- क्‍या पढ़ रहे हो? मैंने किताब बतार्इ.

नया नया ही परिचय था. बापू प्रत्यक्ष उपदेश देना नहीं चाहते थे. एक गहरी सांस लेकर उन्होंने कहा- मुझे भी अंग्रेजी कविता का बड़ा शौक था. लेकिन मैंने सोचा कि मुझे अंग्रेजी कविता पढ़ने का क्‍या अधिकार है? मुझे संस्कृत का जितना ज्ञान होना चाहिए, उतना कहां है? अगर मेरे पास फालतू समय है, तो मैं अपनी गुजराती लिखने की योग्यता क्‍यों न बढ़ाऊं? मुझे आज देश की सेवा करनी है तो अपना सारा समय सेवा शक्ति बढ़ाने में लगाना चाहिए. कुछ ठहर कर फिर बोले- अगर देश सेवा के लिए मैंने कुछ त्याग किया है तो वह अंग्रेजी साहित्य के शौक का है. पैसे कैरियर के त्याग को मैं त्याग नहीं समझता. उसकी ओर मेरी रुचि कभी थी ही नहीं. लेकिन अंग्रेजी साहित्य का तो पूरा पूरा शौक था. पर मैंने ठान लिया था कि मुझे यह छोड़ना चाहिए.

 

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लोकमान्य की स्वराज्य निष्ठा अद्‍भुत है- महात्मा गांधी

 

अपने आश्रम में काका साहब कालेलकर एवं अन्य आश्रमवासियों से देर तक बाते करते करते लोकमान्य का जिक्र आते ही महात्मा गांधी ने कहा कि हिन्दुस्तान के स्वराज्य का दिन-रात अखंड ध्यान करने वाला एक ही पुरुष है. इतना कह कर वे एक क्षण ठहरे, फिर कहने लगे- मैं निश्चय पूर्वक कह सकता हूं कि इस क्षण अगर लोकमान्य सोते नही होंगे, तो या तो स्वराज्य की कुछ न कुछ बातें सोच रहे होंगे या फिर उसी की चर्चा कर रहे होंगे. उनकी स्वराज्य निष्ठा अद्‍भुत है.

 

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सत्यनिष्ठ लोग हमारे लिये तीर्थ जैसे हैं- महात्मा गांधी

एक बार प्रोफेसर कर्वे के आगमन पर महात्मा गांधी ने काका साहब कालेलकर से कहा कि सत्यनिष्ठ लोग हमारे लिये तीर्थ जैसे हैं. सत्याग्रह की स्थापना सत्य की उपासना के लिए ही हुर्इ है. ऐसे आश्रम में कोर्इ सत्यनिष्ठ मूर्ति पधारे, तो हमारे लिए वह मंगल दिन है.

 

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सन्यास तो मानसिक चीज है, संकल्प की वस्तु है – महात्मा गांधी

स्वामी सत्यदेव परिव्राजक को समझाते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि हमारे देश में गेरुये कपड़े देखते ही लोग भक्ति और सेवा करने लगते हैं. अब हमारा काम सेवा करने का है. लोगों की जैसी सेवा हम करना चाहते हैं, वैसी सेवा इन कपड़ों के कारण वे आपसे नहीं लेंगे. उलटे आप ही की सेवा करने दौड़ेंगे. तो जो चीज हमारे सेवा के संकल्प में अंतरायरूप होती है. उसे हम क्‍यों रखें? सन्यास तो मानसिक चीज है, संकल्प की वस्तु है. वाह्य पोशाक से उसका क्‍या सम्बंध ? गेरुआ छोड़ने से सन्यास थोड़े ही छूटता है. कल उठ कर अगर हम देहात में गये और वहां की टट्टियां साफ करने लगे, तो गेरुये कपड़े के साथ कोर्इ आपको वह काम नहीं करने देगा.  

 

 

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महात्मा गांधी की हर बात के पीछे उनका गहरा विचार और चिंतन अवश्य होता है- केलेनबैक

 

दक्षिण अफ्रीका के परम मित्र केलेनबैक बापू से हमेशा कहा करते थे कि आपकी कोर्इ बात किसी को मान्य हो या न हो, लेकिन यह तो हर आदमी देख सकता है कि उसके पीछे आपका गहरा विचार और चिंतन अवश्य होता है.

 

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महात्मा गांधी की भात पकाने की विधि

 

लोगों को भात चाहिए- मोगरे की कली जैसा. पहले ही मिल का पालिश किया हुआ चावल लेते हैं, जिस पर से सारा पौष्टिक तत्त्व उतार लिया जाता है. वह जहां से अंकुर निकलता है, वही चावल का सबसे अधिक पौष्टिक भाग होता है. वह भी भाग चला जाता है. फिर भात सफेद हो, इसलिए पानी से चावल को इतनी बार धोते हैं कि थोड़े बहुत बचे हुए तत्व भी निकल जाते हैं. फिर उबालने पर जो मांड रहता है, उसे भी निकाल देते हैं. इस तरह से चावल को बिलकुल निःसत्व करके खाते हैं. वह भी अगर पूरा पका हुआ न हो, तो बराबर चबाया नही जा सकता और आवश्यकता से अधिक खाया जाता है. खाते ही नींद आने लगती है और फिर गणेश जैसी तोंद निकल आती है. आश्रम में इस तरह का चावल नहीं पकाते. पहले तो हमारा चावल होता है हाथ से कूटा हुआ. उसे हम धोते भी थोड़ा ही हैं. फिर पानी में रख छोड़ते हैं. बाद में इस तरह पकाते हैं कि उसका सारा माड और पानी उसी में समा जाये. पकने के बाद उसे ऐसा घोटते हैं कि बिलकुल खोवा बन जाता है. वह स्वाद में अच्छा होता है. चीनी न डालने पर भी मीठा लगता है. कम खाया जाता है, अधिक पौष्टिक होता है और तोंद नहीं निकलती.

 

 

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जो कुछ सलाह मैं यहां देता हूं, वह सिर्फ सलाह ही है – महात्मा गांधी

 

बात चम्पारन सत्याग्रह के दौरान की है. महात्मा गांधी ने अपने साबरमती आश्रम में एक पाठशाला स्थापित की थी. जब एक सप्ताह के लिए वे आश्रम आये, तो एक दिन काका साहब कालेलकर सहित अन्य सहयोगियों से कहने लगे कि एक बात स्पष्ट कर दूँ. जो शाला तुम लोग चला रहे हो, वह मेरी नहीं तुम्हारी है. लोग मुझे पहचानते हैं और मुझ पर विश्वास रखते हैं, इसलिए शाला के खर्च का भार मैंने उठाया है. लेकिन इससे मेरी शाला नहीं हो जाती. जो कुछ सलाह मैं यहां देता हूं, वह सिर्फ सलाह ही है. अगर तुम्हें न जॅंचे, तो उसे फेंक दो. जो कुछ तुम्हारी समझ में आये, उसे सही मानकर बिना किसी हिचकिचाहट उस पर अमल करते चलो. हॉं, अगर मैं तुम्हारे साथ रहता और तुम जैसा शिक्षक बन कर काम करता, तो तुम्हें अपनी राय बनाने के लिए पूरी कोशिश करता. लेकिन क्‍योंकि मैं शिक्षक का काम नहीं कर रहा हूं, मुझे अपने खयाल तुम पर लांदने का कोर्इ अधिकार नहीं है. तुम लोगों पर मेरा विश्वास है. तुम जो कुछ करोगे, उसमें खराबी नहीं होगी.

 

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चम्पारन के लोग तो मुझसे भी अच्छे हैं- महात्मा गांधी

 

चम्पारन आंदोलन के दौरान वहां के पुलिस कमिनश्नर ने वहां के निवासियों के खिलाफ भड़काने के लिए कर्इ चालें चली किन्तु वे सभी में नाकामयाब रहा. एक आरोप का उत्तर देते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि आप तो यहां के निवासियों को दूर से जानते हैं. लेकिन मैं उनके साथ दिन-रात रहता हूं. निजी अनुभव से कहता हूं कि वे लोग मुझसे कहीं ज्यादा अच्छे हैं. बुरा मैंने किसी को नहीं पाया.

 

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वल्लभभार्इ को सरदार की उपाधि महात्मा गांधी ने नहीं दी

 

आम धारणा यह है कि वल्लभभार्इ पटेल को सरदार की उपाधि वारडोली सत्याग्रह के दौरान महात्मा गांधी ने दी. यह सही नहीं है. सर्वप्रथम श्री वल्लभभार्इ पटेल को गुजरात के कार्यकर्ता श्री मणिलाल कोठारी ने सरदार कहना शुरु किया. इसके बाद लोग भी उन्हें सरदार कहने लगे. बापू ने यह बात सुनी तो उन्होंने भी यही नाम चलाया.

 

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महात्मा गांधी अपने सहयोगियों को इन नामों से पुकारते थे

 

  1. श्री रवीन्द्रनाथ टैगोर- गुरुदेव
  2. श्री बाल गंगाधर तिलक- पहले तिलक महाराज बाद में लोकमान्य
  3. मोहम्मद अली जिन्ना- कायदे आजम
  4. श्री वल्लभभार्इ पटेल- सरदार
  5. दत्तात्रेय बालकृष्ण- काका

 

 

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मैं गुरु में विश्वास नहीं करता- गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर

 

लोग मुझे गुरुदेव तो कहते हैं किन्तु मैं गुरु में विश्वास नहीं करता हूं. मैं नहीं मानता कि कोर्इ किसी का गुरु बन सकता है. कोर्इ किसी को मार्ग बता सकता है. अध्यात्म एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें हर एक को अपने लक्ष्य की ओर जाने का रास्ता भी अपने आप तय करना पड़ता है. अध्यात्म हमेशा अनचार्टेड समुद्र जैसा क्षेत्र रहा है. अपनी साधना मुझे कवि होने में मिली. जब मैं सत्यं ज्ञानं अनंत ब्रह्म कहता हूं, तब यह सारा विश्व मुझे सत्य रूप दिख पड़ता है. इस विश्व से इंकार करने वाला मायावाद मेरे पास नहीं है.

 

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चित्रलिपि- काका साहब कालेलकर

 

लिपियां दो प्रकार की होती हैं- चित्रलिपि और अक्षर लिपि. चित्र लिपि सीधी होती है. जो आकृति जैसी देखी, वैसी ही उसकी प्रतिकृति उतार देना चित्र लिपि का काम है. कोर्इ कुर्सी, घड़ा या आम देखकर उसकी हूबहू आकृति उतार देना चित्र लिपि का काम हुआ. छोटे बच्चों के लिए आकृति देखकर आकृति खींचना आसान होता है. इसलिए उन्हें चित्र लिपि पहले सिखानी चाहिए. शिक्षा का प्रारम्भ अक्षरों के द्वारा न करते हुए निरीक्षण, परीक्षण, प्रयोग, रचना आदि के द्वारा करना चाहिए और पार्थिव शरीर चीजों को व्यक्‍त करने के लिए चित्र लिपि सिखानी चाहिए. ऐसी एक दो साल की शिक्षा के बाद अक्षरों का ज्ञान कराया जाये तो शिक्षण यथा योग्य होगा. चित्र लिपि सीखने से हाथ की उंगलियों पर और कलम पर पूरा काबू आ जाता है और मन में जैसी आकृति हो, वैसी उंगलियों से उतरती है. उसके बाद लिखने का प्रारम्भ करने से अक्षर मोती के दानों जैसे सुदंर आते हैं.

 

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अक्षर लिपि- काका साहब कालेलकर

 

अक्षर लिपि का काम जटिल और भारी है. किसी चीज का हम नाम रखते हैं. गले से ध्वनि निकाल कर हम नाम व्यक्‍त करते हैं. कान उस ध्वनि को ग्रहण करते हैं और मन उस चीज को आकृति समझ लेता है. इस तरह किसी ध्वनि को किसी आकृति के द्वारा व्यक्‍त करना ही अक्षर लिपि है.

 

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

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बापू द्वारा राजनीतिक चरित्र का निर्माण- काका साहब कालेलकर

 

खिलाफत आंदोलन के बारे में वाइसराय ने यह दलील दी थी कि यह सवाल हिन्दुस्तान का नहीं, अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति का है. उसमें कर्इ नाजुक बातें भरी हुर्इ हैं, उसे छोड़ दें और केवल स्वराज्य की बातें करें, तो आपसे समझौता हो जायेगा. किन्तु बापू ने इसे अस्वीकार करते हुए कहा कि यह नहीं हो सकता. हिन्दुस्तान के मुसलमान हिन्दुस्तान के अंग हैं, उनके दिल पर अन्याय की जो चोट लगी है, उसके प्रति मैं उदासीन नहीं रह सकता. इसी पर वाइसराय के साथ बातचीत टूट गयी. देश के सभी प्रतिष्ठित नेताओं ने इसके लिए बापू को दोष दिया. किन्तु बापू के सामने राजनीतिक चारित्र्य का प्रश्न था. उन्होंने मुसलमानों का साथ दिया, उनके दुख को अपना दुख बनाया, अब अपनी चीज मिलती देख कर उनका साथ छोड़ दें, तो यह दगाबाजी होगी. इस तरह दगाबाजी करके जो भी मिले, बापू की नजर में वह मलिन ही थी.

 

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लोकमान्य के हाथ की स्वराज्य की ध्वजा एक क्षण के लिए भी नीचे नहीं झुकनी चाहिए- महात्मा गांधी

 

लोकमान्य तिलक के मृत्यु की रात जब महादेवभार्इ की आंख खुली तो उन्होंने देखा कि बापू तो वैसे ही बैठे हैं. उनके पास गये. बापू के मुंह से निकला- अब अगर मैं किसी उलझन में पड़ूंगा, तो श्रद्धापूर्वक किसके साथ परामर्श करुंगा और जब कभी सारे महाराष्ट्र की मदद की जरूरत आ पड़ेगी तो किससे कहूंगा. कुछ ठहर कर फिर बोले- आज तक मैं स्वराज्य का कार्य करता रहा, लेकिन स्वराज्य नाम जहां तक हो सका टालता रहा. लेकिन अब तो लोकमान्य का चलाया हुआ स्वराज्य नाम का अखंड जाप आगे चलाना होगा. इस बहादुर वीर के हाथ की स्वराज्य की ध्वजा एक क्षण के लिए भी नीचे नहीं झुकनी चाहिए.

 

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गांधी टोपी का इतिहास

 

आज जिस टोपी को गांधी टोपी कहते हैं, वह महात्मा गांधी को क्‍यों पसंद आयी, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए महात्मा गांधी ने कहा कि हिन्दुस्तान के विभिन्न प्रांतों के जो शिरोवेष्टन है, उस पर विचार करने लगा. हमारे गरम देश में सिर पर कुछ न कुछ रखने का प्रचलन है. उन पर मैं विचार करने लगा. बंगाली और  दक्षिण भारत के कुछ ब्राह्मण नंगे सिर रहते हैं, लेकिन अधिकांश हिन्दुस्तानी कुछ न कुछछ शिरोवेष्ठन रखते ही हैं. पंजाबी फेटा है तो उम्दा, लेकिन बहुत कपड़ा लेता है. पगड़ियां गंदी होती हैं, कितना ही पसीना पी जाती हैं. हमारी गुजरात की कोनीकल बंगलौर टोपियां बिलकुल ही भद्दी दिखती हैं. महाराष्ट्र की हंगेरियन टोपियां उससे कुछ अच्छी तो हैं, लेकिन वे फेल्ट की होती हैं. यू.पी. और बिहार की टोपी तो टोपी ही नहीं है. वह शोभा भी नहीं देती. यह सब सोचते-सोचते मुझे कश्मीरी टोपी अच्छी लगी. एक तो वह उम्दा और हल्की होती है, फिर बनाने में तकलीफ नहीं होती और घड़ी हो सकने के कारण उसे जेब या संदूक में दबाकर रख सकते हैं. कश्मीरी टोपियां ऊनी होती हैं. मैने सोचा कि वे सूती कपड़े से बननी चाहिए. फिर विचार किया रंग का. कौन सा रंग सिर पर शोभेगा, एक भी पसंद नहीं आया. आखिर यही निर्णय हुआ कि सफेद ही सबसे अच्छा रंग है. पसीना उस पर जल्दी दिखायी पड़ता है. फिर धोने से भी तकलीफ नहीं होती. टोपी घड़ीदार होने के कारण और सफेद होने के कारण आदमी साफ-सुथरा, आकर्षक दीख पड़ता है. यह सारा विचार करके मैंने यह टोपी बनायी.

 

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महात्मा गांधी की पसंद की टोपी

अपने देश की आबोहवा के अनुसार मुझे सोला हैट पसंद है, वह धूप से सिर का, आंखों का और गरदन का रक्षण करती है. लकड़ी के गूदे होने के कारण हल्की और ठंडी रहती है. सिर को कुछ हवा भी लग सकती है. आज मैं उसका प्रचार नहीं करता, इसका कारण यही है कि उसका आकार हमारी सारी पोशाक के साथ मेल नहीं खाता और यूरोपियन ढंग की होने के कारण लोग उसे अपनायेंगे भी नहीं. अगर हमारे कारीगर उस विलायती टोपी के गुण कायम रखें और आकार में अपनी पोशाक के साथ उसका मेल बिठा सकें, तो बड़ा उपकार होगा. हमारे कारीगर अगर सोंचे तो यह काम उनके लिए कठिन नहीं है.

 

 

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पड़ोसी धर्म- महात्मा गांधी

 

एक र्इसार्इ मित्र के पत्र का जवाब देते हुए महात्मा गांधी ने लिखा है कि स्वदेशी धर्म बाइबल के एक उपदेश का ही अमली स्वरूप है. र्इसा मसीह ने कहा है न कि जैसा प्यार तुम्हारा अपने पर रहता है, वैसा ही प्यार अपने पड़ोसी पर रखो. जब कोर्इ आदमी अपने पड़ोस की दूकानदार को छोड़कर किसी दूसरे दूकानदार से चीज खरीदता है, तो वह अपना पड़ोसी धर्म भूलकर स्वार्थ के वश ही इतनी दूर जाता है. उसके पड़ोसी दूकानदार ने जो दूकान खोली, सो अपने इर्द-गिर्द के ग्राहकों के आधार पर खोली है न. स्वदेशी धर्म कहता है कि पड़ोसी का जो तुम पर अधिकार है, उसका तुम द्रोह मत करो.

 

 

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जब महादेवभार्इ के चाय पीने की पोल बापू के सामने खुली

 

महादेवभार्इ बापू के साथ प्रायः मुसाफिरी करते थे. चलती ट्रेन में लिखने का जितना अभ्यास गांधीजी को था, उससे कहीं अधिक महादेव भार्इ को था. एक यात्रा के दौरान महादेवभार्इ शाम को लिखने बैठे, तो पूरी रात लिखते रहे. काम खत्म करके ही सोये. अब सुबह जल्दी उठना असम्भव था. जब जागे तो देखा कि बापू ने स्वयं स्टेशन के वेटिंग रूम में जाकर अपने महादेवभार्इ के लिए चाय, दूध, शक्‍कर, पाव रोटी, मक्‍खन सब मंगवाकर ट्रे में तैयार रखा था. वे स्वयं तो चाय पीते नहीं थे. लेकिन उन्हें मालूम था कि महादेव का बिना चाय के नहीं चलता. इसलिए यह सब तैयारी करके महादेव के जागने की राह देखने लगे. महादेवभार्इ जागे तो यह सब तैयारी देखकर बहुत झेंपे. विशेष तो इसलिए कि उनकी चाय की पोल बापू के सामने खुल गयी. किन्तु बापू ने इधर-उधर की मीठी-मीठी बातें करके उनका सारा संकोच दूर कर दिया. इस घटना के बारे में महादेव भार्इ ने काका साहब कालेलकर को बताया था.

 

 

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किसी का दुख देखकर बापू का हृदय पिघल जाता था

 

1922 में बापू पहली बार जेल गये थे. उन्हें यरवदा जेल मे रखा गया. हिन्दू और मुसलमान दोनों की गांधीजी के प्रति असाधारण भक्ति है, यह जानकर यरवदा जेल के सपरिटेंडेंट ने उनका काम करने के लिए अफ्रीका के एक सिद्दी कैदी को नियुक्‍त किया. वह बेचारा हिन्दुस्तान की कोर्इ भाषा ठीक से नहीं जानता था. बहुत सा काम इशारे से और जो दस-बीस शब्द वह जानता था, उनसे चलाता था. गोरे अमलदार की अपेक्षा थी कि ऐसा आदमी गांधीजी की भक्ति नहीं करेगा, उनके प्रति पक्षपात नहीं करेगा. एक दिन उस कैदी को बिच्छू ने काट लिया. वह रोता चिल्लाता बापू के पास आया. किसी का दुख देखकर बापू का हृदय तुरंत पिघल जाता है. एक क्षण की देर किये बिना उन्होंने उस व्यक्ति के हाथ के उस भाग को अच्छी तरह धोया, पोछा और तत्पश्चात डंक मारने की जगह को चूसने लगे. इससे उसकी तकलीफ कम हो गयी और बाद में किये गये बापू के इलाज से वह अच्छा हो गया.

उस व्यक्ति ने जिंदगी में कभी प्रेम नहीं पाया था. प्रेम के वश में होकर वह उनका दास बन गया. उनके इशारों पर नाचने लगा. गांधीजी की देखादेखी वह तकली से सूत कातने लगा. सुपरिंटेंडेंट को यह जानकर बड़ा धक्‍का लगा.

 

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पांच आने गरीब कहां से लायेंगे- महात्मा गांधी

 

काका साहब कालेलकर ने बच्चों के लिए एक बालपोथी तैयार की थी. उसका नाम रखा था चालनगाड़ी. उसकी खूबी यह थी कि वर्णमाला के दो चार अक्षर सीखते ही बच्चे शब्द पढ़ने लगते थे. हर पृष्ट पर बेलबूटे थे. सारी किताब आर्ट पेपर पर अनेक रंगों में छापी गयी थी. सजाने में हमने कुछ कसर नहीं रखी थी. उद्देश्य यह था कि बच्चों को अक्षरों के परिचय के साथ सुरुचि की दीक्षा मिले. एक प्रति पांच आने की बिकती थी. एक दिन काका साहब ने बापू से पूछा कि आपने चालनगाड़ी देखी होगी? उन्होंने कहा कि हां, देखी तो है. बहुत सुंदर है, लेकिन किसके लिए बनायी है, तुम राष्ट्रीय शिक्षा के आचार्य हो न? भूखे रहने वाले करोड़ों लोगों के बच्चों को विद्यादान दान देने का भार तुम पर है. आज की बालपोथियां अगर एक आने में मिलती हों, तो तुम्हारी बालपोथी दो पैसे में मिलनी चाहिए. मैं तो कहूंगा कि एक पैसे में क्‍यों न मिले. तुम्हारी पोथी पांच आने में मिलती है, अब पांच आने गरीब कहां से लायेंगे. काका साहब अपने अंधेपन से लज्जित हो गये. हांलाकि उस चीज का मोह तो काका साहब को था ही. इसके बाद उन्होंने चालनगाड़ी का एक नया संस्करण निकाला और उसे पांच पैसे में बेचना शुरु कर दिया. बापू के उस उलाहने का काका साहब पर इतना असर हुआ कि बुद्ध भगवान का चरित्र का जो विद्यापीठ की ओर से ढार्इ रुपये में बिकता था, जब नया संस्करण निकाला गया तो वह आठ आने में बेचा जाने लगा. उसकी बिक्री इतनी बढ़ गयी कि नवजीवन प्रकाशन को जरा सा भी घाटा नहीं हुआ.

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