GANDHI IN ACTION network

the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

E-mail- dr.yadav.yogendra@gandhifoundation.net;             dr.yogendragand...

 

शराब आदमियों से न सिर्फ उनका पैसा छीन लेती है, बल्कि उनकी बुद्धि भी हर लेती है – महात्मा गांधी

जैसा कि कहा जाता है, शराब शैतान की ईजाद है। इस्‍लाम की किताबों में कहा गया है कि जब शैतान ने पुरूषों और स्त्रियों को ललचाना शुरू किया, तो उसने उन्‍हें शराब दिखाई थी। मैंने कितने ही मामलों में यह देखा है कि शराब आदमियों से न सिर्फ उनका पैसा छीन लेती है, बल्कि उनकी बुद्धि भी हर लेती है। उसके नशे में वे कुछ क्षणों के लिए उचित और अनुचित का, पुण्‍य और पाप का, यहां तक कि मां और पत्‍नी का भेद भी भूल जाते हैं। मैंने शराब के नशे में मस्‍त बैरिस्‍टरों को नालियों में लोटते और पुलिस के द्वारा घर ले जाये जाते देखा है। दो अवसरों पर मैंने जहाज के कप्‍तानों को शराब के नशे में ऐसा गर्क देखा है कि उनकी हालत जब तक उनका होश वापिस नहीं आया तब तक अपने जहाजों का नियंत्रण करने योग्‍य नहीं रह गयी थी। मांसाहार और शराब, दोनों के बारे में उत्तम नियम तो यह है कि हमें खाने, पीने और अमोद-प्रमोद के लिए नहीं जीना चाहिये, बल्कि इसलिए खाना और पीना चाहिये कि हमारे शरीर ईश्‍वर के मन्दिर बन जायं और हम उनका उपयोग मनुष्‍य की सेवा में कर सकें। औषधि के रूप में कभी-कभी शराब की आवश्‍यकता हो सकती है और मुमकिन है कि जब आदमी मरने के करीब हो तो शराब का घूंट उसकी जिन्‍दगी को थोड़ा और बढ़ा दे। लेकिन शराब के पक्ष में इससे अधिक और कुछ नहीं कहा जा सकता।

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शराबबन्‍दी जोर-जबरदस्‍ती के आधार पर नहीं होनी चाहिये – महात्मा गांधी

शराबबन्‍दी जोर-जबरदस्‍ती के आधार पर नहीं होनी चाहिये और जो लोग शराब पीना चाहते हैं उन्‍हें उसकी सुविधाएं मिलनी ही चाहिये। राज्‍य का यह कोई कर्त्तव्‍य नहीं है कि वह अपनी प्रजा की कुटेवों के लिए अपनी ओर से सुविधायें दे। हम वेश्‍यालयों को अपना व्‍यापार चलाने के लिए अनुमति-पत्र नहीं देते। इसी तरह हम चोरों को अपनी चोरी की प्रवृत्ति पूरी करने की सुविधायें नहीं देते। मैं शराब को चोरी और व्‍यभिचार, दोनों से ज्‍यादा निंद्य मानता हूं। क्‍या वह अक्‍सर इन दोनों बुराईयों की जननी नहीं होती ?

 

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शराब की लत एक बीमारी है- महात्मा गांधी

शराब की लत कुटेव तो है ही, लेकिन कुटेव से भी ज्‍यादा वह एक बीमारी है। मैं ऐसे बीसियों आदमियों को जानता हूं, जो यदि छोड़ सकें तो शराब पीना बड़ी खुशी से छोड़ दें। मैं ऐसे भी कुछ लोगों को जानता हूं, जिन्‍होंने यह कहा है कि शराब उनके सामने न लायी जाय। और जब उनके कहने के अनुसार शराब उनके सामने नहीं लायी गयी, तो मैंने उन्‍हें लाचार होकर शराब की चोरी करते हुए देखा है। लेकिन इसलिए मैं यह नहीं मानता कि शराब उनके पास से हटा लेना गलत था। बीमारों को अपने-आपसे यानी अपनी अनुचित इच्‍छाओं से लड़ने में हमें मदद देनी ही चाहिये।

 

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मजदूरों के घरों का शराब ने नाश कर दिया है- महात्मा गांधी

मजदूरों के साथ अपनी आत्‍मीयता के फलस्‍वरूप मैं जानता हूं कि शराब की लत में फंसे हुए मजदूरों के घरों का शराब ने कैसा नाश किया है। मैं जानता हूं कि शराब आसानी से न मिल सकती होती तो वे शराब को छूते भी नहीं। इसके सिवा, हमारे पास हाल के ऐसे प्रमाण मौजूद हैं कि शराबियों में से ही कई खुद शराबबन्दि की मांग कर रहे हैं।

 

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शराब की आदत मनुष्य को पशु बना देती है- महात्मा गांधी

शराब की आदत मनुष्‍य की आत्‍मा का नाश कर देती है और उसे धीर-धीरे पशु बना डालती है, जो पत्‍नी, मां और बहन में भेद करना भूल जाता है। शराब के नशे में यह भेद जाने वाले लोगों को मैंने खुद देखा है।

 

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मादक पदार्थों से होने वाली हानि बीमारियों से होने वाली हानि से कर्इ गुनी है- महात्मा गांधी

शराब और अन्‍य मादक द्रव्‍यों से होने वाली हानि कई अशों में मलेरिया आदि बीमारियों से होने वाली हानि की अपेक्षा असंख्‍य गुनी ज्‍यादा है। कारण, बीमारियों से तो केवल शरीर को ही हानि पहुंचती है, जब कि शराब आदि से शरीर और आत्‍मा, दोनों का नाश हो जाता है।

 

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मैं भारत का शराबी होने पसंद नहीं करूंगा- महात्मा गांधी

मैं भारत का गरीब होना पसन्‍द करूंगा, लेकिन मैं यह बरदाश्‍त नहीं कर सकता कि हमारे हजारों लोग शराबी हों। अगर भारत में शराबबन्‍दी जारी करने के लिए लोगों को शिक्षा देना बन्‍द करना पड़े तो कोई परवाह नहीं: मैं यह कीमत चुकाकर भी शराब खोरी को बन्‍द करूंगा।

 

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शराब की लत वाले राष्ट्रों का विनाश निश्चित – महात्मा गांधी

जो राष्‍ट शराब की आदत का शिकार है, कहना चाहिये कि उसने सामने विनाश मुंह बाये खडा़ है। इतिहास में इस बात के कितने ही प्रमाण हैं कि इस बुराई के कारण कई साम्राज्‍य मिट्टी में मिल गये हैं। प्राचीन भारतीय इतिहास में हम जानते हैं कि वह पराक्रमी जाति, जिसमें श्री कृष्‍ण ने जन्‍म लिया था, इसी बुराई के कारण नष्‍ट हो गयी। रोम- साम्राज्‍य के पतन का एक सहायक कारण निस्‍सन्‍देह यह बुराई ही थी।

 

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शराब की दुकानों का बंद करना मेरा पहला काम- महात्मा गांधी

यदि मुझे एक घण्‍टे के लिए भारत का डिक्‍टेटर बना दिया जाय, तो मेरा पहला काम यह होगा कि शराब की दुकानों को बिना मुआवजा दिये बन्‍द करा दिया जाय और कारखानों के मालिकों को अपने मजदूरों के लिए मनुष्‍योचित परिस्थितियों निर्माण करने तथा उनके हित में ऐसे उपाहार- गृह और मनोरंजन- गृह खोलने के लिए मजबूर किया जाय, जहां मजदूरों को ताजगी देने वाले निर्दोष पेय और उतने ही निर्दोष मनोरंजन प्राप्‍त हो सकें।

 

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निश्चित मात्रा में भी शराब पीना उचित नहीं- महात्मा गांधी

एक पक्ष ऐसा है कि निश्चित(मर्यादित) मात्रा में शराब पीने का समर्थन करता है और कहता है कि इससे फायदा होता है। मुझे इस दलील में कुछ सार नहीं लगता। पर घडी़ भर के लिए इस दलील को मान लें, तो भी अनेक ऐसे लोगों के खातिर, जो कि मर्यादा में रह ही नहीं सकते, इस चीज का त्‍याग करना चाहिये।

 

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ताडी़ को मनुष्‍य की खुराक में स्‍थान देने की कोई आवश्‍यकता नहीं है- महात्मा गांधी

पारसी भाइयों ने ताडी़ का बहुत समर्थन किया है। वे कहते हैं कि ताडी़ में मादकता तो है, मगर ताडी़ ऐ खुराक है और दूसरी खुराक को हजम करने में मदद पहुंचाती है। इस दलील पर मैंने खूब विचार किया है और इस बारे में काफी पढा़ भी है। मगर ताडी़ पीने वाले बहुत से गरीबों की मैंने जो दुर्दशा देखी है, उस पर से मैं इस निर्णय पर पहुंचा हूं कि ताडी़ को मनुष्‍य की खुराक में स्‍थान देने की कोई आवश्‍यकता नहीं है।

 

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ताडी के बजाय लोग नीरा का इस्तेमाल करें- महात्मा गांधी

ताडी़ में जो गुण माने गये हैं वे सब हमें दूसरी खुराक में मिल जाते हैं। ताडी़ खजूर के रस से बनती है। खजूर के शुद्ध रस में मादकता बिलकुल नहीं होती। उसे नीरा कहते हैं। ताजी नीरा को ऐसी- की- ऐसी पीने से कई लागों को दस्‍त साफ आता है। मैंने खुद नीरा पीकर देखी है। मुझ पर उसका ऐसा असर नहीं हुआ। परन्‍तु वह खुराक का काम तो अच्‍छी तरह से देती है। चाय इत्‍यादि के बदले मनुष्‍य सबेरे नीरा पी ले, तो दूसरा कुछ पीने या खाने की आवश्‍यकता नहीं रहनी चाहिये।

 

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नीरा का उपयोग- महात्मा गांधी

नीरा को गन्‍ने के रस की तरह पकाया जाय, तो उससे बहुत अच्‍छा गुड़ तैयार होता है। खजूरी ताड़ की एक किस्‍म है। हमारे देश में अनेक प्रकार के ताड़ कुदरती तौर पर उगते हैं। उन पर सबमें से नीरा निकल सकती है। नीरा ऐसी चीज है जिसे निकालने की जगह पर ही तुरन्‍त पीना अच्‍छा है। नीरा में मादकता जल्‍दी पैदा हो जाती है। इसलिए जहां उसका तुरंत उपयोग न हो सके वहां उसका गुड़ बना लिया जाय, तो वह गन्‍ने के गुड़ की जगह ले सकता है। कई लोग मानते हैं कि ताड़-गुड़ गन्‍ने के गुड़ के अधिक गुणकारी है। उसमें मिठास कम होती है, इसलिए वह गन्‍ने के गुड़ की अपेक्षा अधिक मात्रा में खाया जा सकता है। जिन ताडों के रस से ताडी़ बनाई जाती है उन्‍हीं से गुड़ बनाया जाय, तो हिन्‍दुस्‍तान में गुड़ और खांड़ की कभी पैदा न हो और गरीबों को सस्‍ते दाम में अच्‍छा गुड़ मिल सके।

 

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ताड़-गुड़ शक्‍कर एवं गुड़ से अधिक गुणकारी है- महात्मा गांधी

ताड़- गुड़ की मिश्री और शक्‍कर भी बनाई जा सकती है। मगर गुड़ शक्‍कर या चीनी से बहुत अधिक गुणकारी है। गुड़ में जो क्षार होते हैं वे शक्‍कर या चीनी में नहीं होते। जैसे बिना भूसी का आटा और बिना भूसी का चावल होता है, वैसे ही बिना क्षार की शक्‍कर को समझना चाहिये। अर्थात यह कहा जा सकता है कि खुराक जितनी अधिक स्‍वाभाविक स्थिति में खाई जाय, उतना ही अधिक पोषण उसमें से हमें मिलता है।

 

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शराब की तरह बीडी़ और सिगरेट के लिए भी मेरे मन में गहना तिरस्‍कार है – महात्मा गांधी

शराब की तरह बीडी़ और सिगरेट के लिए भी मेरे मन में गहना तिरस्‍कार है। बीडी़ और सिगरेट को मैं कुटदेव ही मानता हूं। वह मनुष्‍य की विवेक- बुद्धि को जड़ बना देती है और अक्‍सर शराब से ज्‍यादा बुरी सिद्ध होती है, क्‍योंकि उसका परिणाम अप्रत्‍यक्ष रीति से होता है। यह आदत आदमी को एक बार लग भर जाय,फिर उससे पिंड छुडा़ना बहुत कठिन होता है। इससे सिवा वह खर्चीली भी है। वह मुंह को दुर्गन्‍ध- युक्‍त बनाती है, दांतों का रंग बिगाड़ती है और कभी- कभी कैंसर जैसी भयानक बीमारी को जन्‍म देती है। वह एक गंदी आदत है।

 

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एक दृष्टि से बीडी़ और सिगरेट पीना शराब से ज्‍यादा बडी़ बुराई है – महात्मा गांधी

एक दृष्टि से बीडी़ और सिगरेट पीना शराब से ज्‍यादा बडी़ बुराई है, क्‍योंकि इस व्‍यसन का शिकार उससे होने वाली हानि को समय रहते अनुभव नहीं करता। वह जंगलीपन का चिन्‍ह नहीं मानी जाती, बल्कि सभ्‍य लोग तो उसका गुणगान भी करते हैं। मैं इतना कहूंगा कि जो लोग छोड़ सकते हैं वे उसे छोड़ दें और दूसरों के लिए उदाहरण पेश करें। तम्‍बाकू ने तो गजब ही ढाया है। भाग्‍य से ही कोई इसके पंजे से छूटता है।….. टॉल्‍स्‍टॉय ने इसे व्‍यसनों में सबसे खराब व्‍यसन माना है।

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तम्बाकू की प्रवृत्ति- महात्मा गांधी

हिन्‍दुस्‍तान में हम लोग तम्‍बाकू केवल पीते ही नहीं, सूंघते भी हैं और जरदे के रूप में खाते भी हैं।…. आरोग्‍य का पुजारी दृढ़ निश्‍चय करके सब व्‍यसनों की गुलामी से छूट जायेगा। बहुतों को इसमें से एक या दो या तीनों व्‍यसन लगे होते हैं। इसलिए उन्‍हें इससे घृणा नहीं होती। मगर शान्‍त चित्‍त से विचार किया जाय तो तम्‍बाकू फूंकने की क्रिया में या लगभग सारा दिन जरदे या पान के बीडे़ से गाल भर रखने में या नसवार की डिबिया खोलकर सूंघते रहने में कोई शोभा नहीं है। ये तीनों व्‍यसन गंदे हैं।

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रोग, मनुष्य की लापरवाही से होते हैं- महात्मा गांधी

अब तो य‍ह बात निर्विवाद सिद्व हो चुकी है कि तन्‍दुरूस्‍ती के नियमों को न जानने से और उन नियमों के पालन में लापरवाह रहने से ही मनुष्‍य-जाति का जिन-जिन रोगों से परिचय हुआ है, उनमें से ज्‍यादातर रोग उसे होते हैं। बेशक, हमारे देश की दूसरे देशों से बढ़ी-चढ़ी मृत्‍युसंख्‍या का ज्‍यादातर कारण गरीबी है, जो हमारे देशवासियों के शरीर को कुरेदेर ख रही है; लेकिन अगर उनको तन्‍दुरूस्‍ती के नियमों की ठीक-ठीक तालीम दी जाय, तो इसमें बहुत कमी की जा सकती है।

 

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नीरोग शरीर में निर्विकार मन का वास होता है- महात्मा गांधी

मनुष्‍य-जाति के लिए साधारणत: पहला नियम यह है कि मन चंगा है तो शरीर भी चंगा है। नीरोग शरीर में निर्विकार मन का वास होता है, यह एक स्‍वयंसिद्ध सच्‍चाई है। मन और शरीर के बीच अटूट सम्‍बन्‍ध है। अगर हमारे मन निर्विकार यानी नीरोग हों, तो वे हर तरह की हिंसा से मुक्‍त हो जायं; फिर हमारे हाथों तन्‍दुरूस्‍ती के नियमों का सहज भाव से पालन होने लगे और किसी तरह की खास कोशिश के बिना ही हमारे शरीर तन्‍दुरूस्‍त रहने लगें।

 

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 तंदरुस्ती के कुछ नियम- महात्मा गांधी

तन्‍दुरूस्‍ती के कायदे और आरोग्‍यशास्‍त्र के नियम बिलकुल सरल और सादे हैं, और वे आसानी से सीखे जा सकते हैं। मगर उन पर अमल करना मुश्किल है। नीचे मैं ऐसे कुछ नियम देता हूं:

  1. हमेशा शुद्ध विचार करो और तमाम गन्‍दे व निकम्‍मे विचारों को मन से निकाल दो।
    2. दिन-रात ताजी-से-ताजी हवा का सेवन करो।
    3. शरीर और मन के काम का तौल बनाये रखो, यानी दोनों को बेमेल न होने दो।
    4. तनकर खड़े रहो, तनकर बैठो और अपने हर काम में साफ-सुथरे रहो; और इन सब आदतों को अपनी आन्‍तरिक स्‍वस्‍थता का प्रतिबिम्‍ब बनने दो।
    5. खाना इसलिए खाओ कि अपने जैसे अपने मानव-बन्‍धुओं की सेवा के लिए ही जिया जा सके। भोग-भोगने के‍ लिए जीने और खाने का विचार छोड़ दो। अतएव उतना ही खाओ जितने से आपका मन और आपका शरीर अच्‍छी हालत में रहे और ठीक से काम कर सके। आदमी जैसा खाना खाता, वैसा ही बन जाता है।
    6. आप जो पानी पीयें, जो खाना खायें और जिस हवा में सांस लें, वे सब बिलकुल साफ होने चाहिये। आप सिर्फ अपनी निज की सफाई से सन्‍तोष न मानें, बल्कि हवा, पानी और खुराक की जितनी सफाई आप अपने लिए रखें, उतनी ही सफाई का शौक आप अपने आस-पास के वातावरण में भी फैलायें।


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एक समय एक ही अनाज इस्‍तेमाल करना चाहिये- महात्मा गांधी

एक समय एक ही अनाज इस्‍तेमाल करना चाहिये। चपाती, दाल-भात, दूध-घी, गुड़ और तेल ये खाद्य-पदार्थ सब्‍जी-तरकारी और फलों के उपरान्‍त आम तौर पर हमारे घरों में इस्‍तेमाल किये जाते हैं। आरोग्‍य की दृष्‍टी से यह मेल ठीक नहीं है। जिन लोगों को दूध, पनीर, अंडे या मांश के रूप में ‘स्‍नायुवर्धक तत्‍व’ मिल जातें हैं, उन्‍हें दाल की बिलकुल जरूरत नहीं रहती। गरीब लोगों को तो सिर्फ वनस्‍पति द्वारा ही स्‍नायुवर्धक तत्‍व मिल सकते हैं। अगर धनिक वर्ग दाल और तेल लेना छोड़ दे, तो गरीब को जीवन-निर्वाह के लिए ये आवश्‍यक पदार्थ मिलने लगें। इन बेचारों को न तो प्राणियों के शरीर से पैदा हुए स्‍नायुवर्धक तत्‍व और न चर्बी ही मिल सकती है। अन्‍न को दलिया की तरह मुलायम बनाकर कभी न खाना चाहिये। अगर उसको किसी रसीली या तरल चीज में डुबोये बगैर सूखा ही खाया जाय, तो आधी मात्रा से ही काम चल जाता है। अन्‍न को कच्‍ची सलाद, जैसे कि प्‍याज, गाजर, मूली, लेटिस, हरी पत्तियां और टमाटर के साथ खाया जाय तो अच्‍छा होता है। कच्‍ची हरी सब्जियों को सलाद के एक दो औंस ही आठ औंस पकाई हुई सब्जियों के बराबर होते हैं। चपाती यर डबल रोटी दूध के साथ नहीं लेनी चाहिये। शुरू में एक वक्‍त चपाती या डबल रोटी और कच्‍ची सब्जियां, और दूसरे वक्‍त पकाई हुई सब्‍जी, दूध या दही के साथ ले सकते हैं। मिष्‍टान्‍न भोजन बिलकुल बन्‍द कर देना चाहिये। इसकी जगह गुड़ या थोड़ी मात्रा में शक्‍कर अकेले या दूध या डबल रोटी के साथ ले सकते हैं।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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शरीर के पोषण के लिए थोड़ा फल-सेवन भी पर्याप्‍त होता है – महात्मा गांधी

ताजे फल खाना अच्‍छा है, परन्‍तु शरीर के पोषण के लिए थोड़ा फल-सेवन भी पर्याप्‍त होता है। यह महंगी वस्‍तु है और धनिक लोगों के आवश्‍यकता से अत्‍यन्‍त अधिक फल-सेवन के कारण गरीबों और बीमारों को, जिन्‍हें धनिकों की अपेक्षा अधिक फलों की जरूरत है, फल मिलना दुश्‍वार हो गया है।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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आहार के सम्बंध में परम्परागत विचारों को परिवर्तित करने की जरूरत- महात्मा गांधी

मनुष्‍य को अपनी शक्ति के सर्वोच्‍च स्‍तर पर कार्य कर सकने के लिए पूरा पोषण पहुंचाने की वनस्‍पति- जगत की अपार क्षमता की आधुनिक औषधि- विज्ञान ने अभी तक कोई जांच- पड़ताल नहीं की है। उसने तो बस मांस या बहुत हुआ तो दूध और दूध से प्राप्‍त दूसरे पदार्थो का ही सहारा पकड़ रखा है। भारतीय चिकित्‍सकों का, जो परम्‍परा से शाकाहारी हैं, कर्त्‍तव्‍य है कि वे इस कार्य को पूरा करें। विटामिनों की तेजी से हो रही खोजों से, और इस सम्‍भावना से कि अधिक महत्‍व के विटामिनों को सूर्य से सीधा पाया जा सकता है, ऐसा प्रकट होता है कि आहार के क्षेत्र में एक बड़ी क्रांति होने जा रही है और उसके विषय में अभी तक जो स्‍वीकृत सिद्धांत चले आ रहे थे तथा औषधि विज्ञान अभी तक जिन विश्‍वासों का पोषण करता आ रहा था, उनमें शीघ्र ही परिवर्तन होने वाला है। मुझे ऐसा दिखाई देता है कि इस रास्‍ते की विकट कठिनाईयों को पार करने और अपने प्राणों की बाजी लगाकर भी इस विषय के सत्‍य को ढूंढ़ निकालने का काम निष्‍णात डॉक्‍टर लोग नहीं, बल्कि सामान्‍य परन्‍तु उत्‍साही जिज्ञासु ही करने वाले हैं। यदि सत्‍य के इन विनम्र शोधकों को वैज्ञानिक लोग मदद दें, तो मुझे उससे ही सन्‍तोष हो जायेगा।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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पथ्य एवं घरेलू उपचार से अधिकांश रोगी ठीक हो सकते हैं- महात्मा गांधी

मेरा यह विश्‍वास है कि मनुष्‍यों को शायद ही दवा लेने की आवश्‍यकता रहती है। पथ्‍य तथा पानी, मिट्टी इत्‍यादि के घरेलू उपचारों से एक हजार में से 999 रोगी स्‍वथ्‍य हो सकते हैं।

 

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शरीर का उपयोग मंदिर की तरह करो- महात्मा गांधी

शरीर का भगवान के मंदिर की तरह उपयोग करने के बजाय हम उसका उपयोग विषय- भोगों के साधन की तरह करते हैं और इन विषय- सुखों को बढा़ने की कोशिश में डॉक्‍टरों के पास दौड़े जाने में तथा अपने पार्थिव आवास, इस शरीर का,दुरूपयोग करने में लज्‍जा का अनुभव नहीं करते। मनुष्‍य जैसा आहार करता है वैसा ही वह बनता है- इस कहावत में काफी सत्‍य है। आहार जितना तामस होगा, शरीर भी उतना तामस होगा।

 

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शाकाहार आध्यात्मिक प्रगति के लिए आवश्यक- महात्मा गांधी

मैं यह अवश्‍य महसूस करता हूं कि आध्‍यामिक प्रगति के क्रम में एक अवस्‍था ऐसी जरूर आती है, जिसकी यह मांग होती है कि हम अपने शरीर की आवश्‍याकताओं की पूर्ति के लिए अपने सहजीवी प्राणियों की हत्‍या करना बन्‍द कर दें। आपके के साथ शाकाहार के प्रति अपने इस आकर्षण की चर्चा करते हुए मुझ गोल्‍डस्मिथ की ये सुन्‍दर पंक्तियां याद आती है:

पहाड़ इस घाटी में आजादी से विचरने वाले
इन प्राणियों की मैं हत्‍या नहीं करता।
जो परमशक्ति हमें अपनी दया का दान देती है,
उससे मैं दया की सीख लेता हूं:
और उन्‍हें अपनी दया देता हूं।

 

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

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