GANDHI IN ACTION network

the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

E-mail- dr.yadav.yogendra@gandhifoundation.net;             dr.yogendragand...

 

जिस जगह शरीर सफार्इ, घर सफार्इ और ग्राम सफार्इ हो, वहां कम बीमारी होती है- महात्मा गांधी

मेरी राय में जिस जगह शरीर-सफाई, घर-सफाई ग्राम-सफाई हो तथा युक्‍ताहार और योग्‍य व्‍यायाम हो, वहां कम-से-कम बीमारी होती है। और, अगर चित्‍तशुद्धि भी हो, तो कहा जा सकता है कि बीमारी असंभव हो जाती है। राम नाम के बिना चित्‍तशुद्धि नहीं हो सकती । अगर देहात वाले इतनी बात समझ जायं, तो वैद्य, हकीम या डॉक्‍टर की जरूरत न रह जाय। कुदरती उपचार के गर्भ में यह बात रही है कि मानव- जीवन की आदर्श रचना में देहात की या शहर की आदर्श रचना आ ही जाती है। और उसका मध्‍यबिन्‍दू तो ईश्‍वर ही हो सकता है।

 

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कुदरती उपचार में जीवन- परिवर्तन की बात आती है- महात्मा गांधी

कुदरती ईलाज के गर्भ में यह बात रही है। कि उसमें कम- कम खर्च और ज्‍यादा से ज्‍यादा सादगी होनी चाहिये। कुदरती उपचार का आदर्श ही यह है कि जहां तक संभव हो, उसके साधन ऐसे हाने चाहिये कि उपचार देहात में ही हो सके। जो साधन नहीं है वे पैदा किए जाने चाहिये। कुदरती उपचार में जीवन- परिवर्तन की बात आती है। यह काई वैध की दी हुई पुडि़या लेने की बात नहीं है, और अस्‍पताल मुफ्त दवा लेने या वहां रहने की बात है। जो मुफ्त दवा लेता है वह भिक्षुक बनता है। जो कुदरती उपचार करता है, वह कभी भिक्षुक नहीं बनता। वह अपनी प्रतिष्‍ठा बढ़ाता है और अच्‍छा होने का उपाय खुद ही कर लेता है। वह अपने शरीर से जहर निकालकर ऐसा प्रयत्‍न करता है, जिससे दुबारा बीमार न पड़ सके। और कुदरती इलाज में मध्‍यबिन्‍दु तो रामनाम ही है न ?

 

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पथ्‍य खुराक- युक्‍ताहार- कुदरती उपचार का अनिवार्य अंग है – महात्मा गांधी

पथ्‍य खुराक- युक्‍ताहार- इस उपचार का अनिवार्य अंग है। आज हमारे देहात हमारी ही तरह कंगाल है। देहात में साग- सब्जि, फल- दूध, वगैरा पैदा करना कुदरती इलाज का खास अंग है। इसमें जो समय खर्च होता है, वह व्‍यर्थ नहीं जाता । बल्कि उससे सारे देहातियों को और आखिर में सारे हिन्‍दुस्‍तान की लाभ होता है।

 

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आदमी जीने के लिए खाये- महात्मा गांधी

निचोड़ य‍ह निकला कि अगर हम सफाई के नियम जानें, उनका पालन करें और सही खुराक लें, तो हम खुद अपने डॉक्‍टर बन जायें। जो आदमी जीने के लिए खाता है, जो पांच महाभूतों का यानी मिट्टी, पानी, आकाश, सूरज और हवा का दोस्‍त बनकर रहता है, जो उसको बनाने वाले ईश्‍वर का दास बनकर जीता है, वह कभी बीमार न पड़ेगा। पड़ा भी तो ईश्‍वर के भरोसे रहता हुआ शान्ति से मर जायेगा। वह अपने गांव के मैदानों या खेतों में मिलने वाली जड़ी-बुटी या औषधि लेकर ही सन्‍तोष मानेगा। करोड़ों लोग इसी तरह जीते और मरते हैं। उन्‍होंने तो डॉक्‍टर का नाम तक नहीं सुना। वे उसका मुंह कहां से देखें ? हम भी ठीक ऐसे ही बन जायं और हमारे पास जो देहाती लड़के और बड़े आते हैं, उनको भी इसी तरह रहना सिखा दें। डॉक्‍टर लोग कहते हैं कि 100 में से 99 रोग गन्‍दगी से, न खाने जैसा खाने से और खाने लायक चीजों के न मिलने और न खाने से होते हैं। अगर हम इन 99 लोगों को जीने की कला सिखा दें, तो बाकी एक को हम भूल जा सकते हैं। उसके लिए कोई परोपकारी डॉक्‍टर मिल जायेगा। हम उसकी फिकर न करें। आज हमें न तो अच्‍छा पानी मिलता है, न अच्‍छी मिट्टी और न साफ हवा ही मिलती है। हम सूरज से छिप-छिपकर रहते हैं। अगर हम इन सब बातों को सोचें और सही खुराक सही तरीके से लें, तो समझिये कि हमने जमानों का काम कर लिया। इसका ज्ञान पाने के लिए न तो हमें कोई डिग्री चाहिये और न करोड़ों रूपये। जरूरत सिर्फ इस बात की है कि हममें ईश्‍वर पर श्रद्धा हो, सेवा की लगन हो, पांच महाभूतों का कुछ परिचय हो, और सही भोजन का सही ज्ञान हो। इतना तो हम स्‍कूल और कॉलेज की शिक्षा के बनिस्‍बत खुद ही थोड़ी मेहनत से और थोड़े समय में हासिल कर सकते हैं।

 

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जाने-अनजाने कुदरत के कानूनों को तोड़ने से ही बीमारी पैदा होती है – महात्मा गांधी

जाने-अनजाने कुदरत के कानूनों को तोड़ने से ही बीमारी पैदा होती है। इसलिए उसका इलाज भी यही हो सकता है कि बीमार फिर कुदरत के कानूनों पर अमल करना शुरू कर दे। जिस आदमी ने कुदरत के कानून को हद से ज्‍यादा तोड़ा है, उसे तो कुदरत की सजा भोगनी ही पड़ेगी, या फिर उससे बचने के लिए अपनी जरूरत के मुताबिक डॉक्‍टरों या सर्जनों की मदद लेनी होगी। वाजिब सजा को सोच-समझकर चुपचाप सह लेने से मन की ताकत बढ़ती है, मगर उसे टालने की कोशिश करने से मन कमजोर बनता है।

 

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दवांइयों से भी ज्‍यादा इन डॉक्‍टरों को जीने का सही तरीका गांववालों को सिखाना होगा- महात्मा गांधी

 

मैं यह जानना चाहूंगा कि ये डॉक्‍टर और वैज्ञानिक लोग देश के लिए क्‍या कर रहें हैं ? वे हमेशा खास-खास बीमारियों के इलाज के नये-नये तरीके सीखने के लिए विदेशों में जाने के लिए तैयार दिखाई देते हैं। मेरी सलाह है कि वे हिन्‍दुस्‍तान के 7 लाख गांवो की तरफ ध्‍यान दें। ऐसा करने पर उन्‍हें जल्दी ही मालूम हो जायेगा कि डॉक्‍टरी की डिग्रियां लिये हुए सारे मर्द और औरतों की, पश्चिमी नहीं बल्कि पूर्वी ढंग पर, ग्रामसेवा के काम में जरूरत है। तब वे इलाज के बहुत से देशी तरीकों को अपना लेंगे। जब हिन्‍दुस्‍तान के गांवों में ही कई तरह की जडी़- बुटियों और दवाईयों का अखूट भण्‍डार मौजूद है, तब उसे पश्चिमी देशों से दवांइयां मंगाने की कोई जरूरत नहीं। लेकिन दवांइयां से भी ज्‍यादा इन डॉक्‍टरों को जीने का सही तरीका गांववालों को सिखाना होगा।

 

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बीमारी आ जाय तो उसे मिटाने के लिए कुदरत के सभी कानूनों पर अमल करने के साथ-साथ राम- नाम ही उसका असल इलाज है – महात्मा गांधी

मेरा कुदरती इलाज तो सिर्फ गांववालों और गांवों के लिए ही है। इसलिए उसमें खुर्दबीन, एक्‍स- रे, वगैरा की काई जगह नहीं है। और नहीं कुदरती इलाज में कुनैन, अमिटीन, पेनिसिलीन वगैरा दवांओं की गुजांइश है। उसमें अपनी सफाई, गांव की सफाई और तन्‍दुरूस्‍ती को हिफाजत का पहला और पूरा- पूरा स्‍थान है। इसकी तह में खयाल यह है कि अगर इतना किया जाय या हो सके, तो काई बीमारी ही न हो। और बीमारी आ जाय तो उसे मिटाने के लिए कुदरत के सभी कानूनों पर अमल करने के साथ-साथ राम- नाम ही उसका असल इलाज है। यह इलाज सार्वजनिक या आम नहीं हो सकता। जब तक खुद इलाज करने वाले में राम- नाम की सिद्धि न आ जाय, तब तक राम- नाम- रूपी इलाज करने को एकदम आम नहीं बनाया जा सकता।

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श्रम और बुद्धि के बीच समन्वय जरूरी- महात्मा गांधी

श्रम और बुद्धि के बीच जो अलगाव हो गया है, उसके कारण हम अपने गांवों के प्रति इनते लापरवाह हो गये हैं कि वह एक गुनाह ही माना जा सकता है। नतीजा यह हुआ है कि देश में जगह-जगह सुहावने और मनभावने छोटे-छोटे गांवों के बदले हमें घूरे जैसे गंदे गांव देखने को मिलते हैं। बहुत से या यों कहिये कि करीब-करीब सभी गांवों में घुसतें समय जो अनुभव होता है, उससे दिल को खुशी नहीं होती। गांव के बाहर और आस-पास इतनी गंदगी होती है और वहां इतनी बदबू आती है कि अक्‍सर गांव में जाने वाले को आंख मूंदकर और नाक दबाकर ही जाना पड़ता है। ज्‍यादातर कांग्रेसी गांव के बाशिन्‍दे होने चाहिये; अगर ऐसा हो तो उनका फर्ज हो जाता है कि वे अपने गांवों को सब तर‍ह से सफाई के नमूने बनायें। लेकिन गांववालों के हमेशा के यानी रोज-रोज के जीवन में शरीक होने या उनके साथ डुलने-मिलने को उन्‍होंने कभी अपना कर्तव्‍य माना ही नहीं। हमने राष्‍ट्रीय रा सामाजिक सफाई को न जरूरी गुण माना, और न उसका विकास ही किया। यों रिवाज के कारण हम अपने ढंग से नही भर लेते है, मगर किस नदी, तालाब या कुएं के किनारे हम श्राद्ध या वैसी ही दूसरी कोई धार्मिक क्रिया करते हैं और जिन जलाशयों में पवित्र होने के विचार से हम नहाते हैं, उनके पानी को बिगाड़ने या गन्‍दा करने में हमे कोई हिचक नहीं होती। हमारी इस कमजोरी को मैं एक बड़ा दुर्गुण मानता हूं। इस दुर्गुण का ही यह नतीजा कि हमारे गांव की और हमारी पवित्र नदियों के पवित्र तटों की लज्‍जाजन दुर्दशा और गंदगी से पैदा होने वाली बीमारियां हमें भोगनी पड़ती है।

 

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गांवों में करने के कार्य – महात्मा गांधी

गांवों में करने के कार्य ये है कि उनमें जहां-जहां कूड़े-करकट तथा गोबर के ढेर हो, वहां-वहां से उनको हटाया जाय और कुओं तथा तालाबों की सफाई की जाय। अगर कार्यकर्ता लोग नौकर रखें हुए भंगियों की भांति खुद रोज सफाई का काम करना शुरू कर दें और साथ गांववालों को यह भी बतलाते रहें कि उनसे सफाई के कार्य में शरीक होने की आशा रखी जाती हैं, ताकि आगे चलकर अन्‍त में सारा काम गांववालों स्‍वयं करने लग जायें, तो यह निश्चित है कि आगे या पीछे गांववालें इस कार्य में अवश्‍य स‍हयोग देने लगेंगे।

 

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कूड़ों का निस्तारण—महात्मा गांधी

वहां के बाजार तथा गलियों को सब प्रकार का कूड़ा-करकट हटाकर स्‍वच्‍छ बना लेना चाहिये। फिर उस कूड़े का वर्गीकरण कर देना चाहिये। उसमें से कुछ का तो खाद बनाया जा सकता हैं, कुछ को सिर्फ जमीन में गाड़ देना भर बस होगा और कुछ हिस्‍सा ऐसा होगा कि जो सीधा सम्‍पत्ति के रूप में परिणत किया जा सकेगा। वहां मिली हुई प्रत्‍ये‍क हड्डी एक बहुमूल्‍य कच्‍चा माल होगी, जिससे बहुत-सी उपयोगी चीजें बनायी जा सकेगी, या जिसे पीसकर कीमती खाद बनाया जा सकेगा। कपड़े के फटे-पुराने चिथड़ों तथा रद्दी कगजों से कागज बनाये जा सकते हैं और इधर-उधर से इकठ्टा किया हुआ मल-मूत्र गांव के खेतों के लिए सुनहले खाद का काम देगा। मल-मूत्र का उपयोगी बनाने के लिए यह करना चाहियें कि उसके साथ-चाहे वह सूखा हो या तरल-मिट्टी मिलाकर उसे ज्‍यादा-से-ज्‍यादा एक फुट गहरा गठ्डा खेदकर जमीन में गाड़ दिया जाय। गांवों की स्‍वास्‍थ्‍य-रक्षा पर लिखी हुई अपनी पुस्‍तक में डॉ. पूअरे कहते है कि जमीन में मल-मूत्र नौ या बारह इंच से अधिक गहरा नहीं गाड़ना चाहिये।

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सोन खाद बनाने के तरीके- महात्मा गांधी

उनकी मान्‍यता है कि जमीन की ऊपरी सतह सूक्ष्‍म जीवों से परिपूर्ण होती है और हवा एवं रोशनी की सहायता से-जो कि आसानी से वहां तक पहुंच जाती हैं- ये जीवन मल-मूत्र को एक हफते के अन्‍दर एक अच्‍छी, मुलायम और सुगन्धित मिट्टी में बदल देते है। कोई भी ग्रामवासी स्‍वयं इस बात की सच्‍चाई का पता लगा सकता है। यह कार्य दो प्रकार से किया जा सकता है। या तो पाखाने बनाकर उनमें शौच जाने के लिए मिट्टी तथा लोहे की बल्टियां रख दी जायं और फिर प्रतिदिन उन बल्टियों को पहले से तैयार की हुई जमीन में खाली करके ऊपर से मिट्टी डाल दी जाय, या फिर जमीन में चौरस गढ्डा खोदकर सीधे उसी में मल-मूत्र का त्‍याग करके ऊपर से मिट्टी डाल दी जाय। यह मल-मूत्र या तो देहात के सामूहिक खेतों में गाड़ा जा सकता है या व्‍यक्तिगत खेतों में। लेकिन यह कार्य तभी संभव है जब कि गांव वाले सहयोग दें। कोई भी उद्योगी ग्रामवासी कम-से-कम इतना काम तो खुद भी ही कर कसता है कि मल-मूत्र को एकत्र करके उसको अपने लिए सम्‍पत्ति में परिवर्ति‍त कर दे। आजकल तो य‍ह सारा कीतमी खाद, जो लाखों रूपयों की कीमत का है, प्रतिदिन व्‍यर्थ जाता है और बदले में हवा को गन्‍दी करता तथा बीमारियां फैलाता रहता है। गांवों के तालाबों से स्‍त्री और पुरूष सब स्‍नान करने, कपड़े धोने, पानी पीने तथा भोजन बनाने का काम लिया करते हैं। बहुत से गांवों के तालाब पशुओं के काम भी आते हैं। बहुधा उनमें भैंसें बैठी हुई पाई जाती हैं। आश्‍चर्य तो यह है कि तालाबों का इतना पापपूर्ण दुरूपयोग होते रहने पर भी महामारियों से गांवों का नाश अब तक क्‍यों नहीं हो पाया है? आरोग्‍य-विज्ञान इस विषय में एकमत है कि पानी की सफाई के संबंध में गांववालों की उपेक्षा-वृत्ति ही उनकी बहुत-सी बीमारियों का कारण है।

 

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ग्राम सेवा में भारतवर्ष के सन्‍ताप-पीडि़त जन-समाज का अनिर्वचनीय कल्‍याण भी समाया हुआ है- महात्मा गांधी

पाठक इस बात को स्‍वीकार करेंगे कि इस प्रकार का सेवाकार्य शिक्षाप्रद होने के साथ-ही-साथ अलौकि‍क रूप से आनन्‍ददायक भी है और इसमें भारतवर्ष के सन्‍ताप-पीडि़त जन-समाज का अनिर्वचनीय कल्‍याण भी समाया हुआ है। मुझे उम्‍मीद है कि इस समस्‍या को सुलझाने के तरीके का मैंने ऊपर जो वर्णन किया है, उससें इतना तो साफ हो गया होगा कि अगर ऐसे उत्‍साही कार्यकर्ता मिल जायं, जो झाडू और फावड़े को भी उतने ही आराम और गर्व के साथ हाथ में ले लें जैसे कि वे कलम और पेंसिल को लेते हैं, तो इस कार्य में खर्च का कोई सवाल ही नहीं उठेगा। अगर किसी खर्च की जरूरत पड़ेगी भी तो वह केवल झाडू, फावड़ा, टोकरी, कुदाली और शायद कुछ कीटाणु-नाशक दवाइयां खरीदने तक ही सीमित रहेगा। सूखी राख संभवत: उतनी ही अच्‍छी कीटाणु-नाशक दवा है, जितनी कि कोई रसायनशास्‍त्री दे सकता है।

 

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आदर्श भारतीय गॉंव बनाने के तरीके- महात्मा गांधी

आदर्श भारतीय गांव इस तरह बसाया और बनाया जाना चाहिये, जिससे वह सम्‍पूर्णतया नीरोग हो सके। उसके झोपड़ों और मकानों में काफी प्रकाश और वायु आ-जा सके। ये झोंपड़े ऐसी चीजों के बने हों जो पांच मील की सीमा के अन्‍दर उपलब्‍ध हो सकती हैं। हर मकान के आस-पास या आगे-पीछे इतना बड़ा आंगन हो, जिसमें गृहस्‍थ अपने लिए साग-भाजी लगा सकें। और अपने पशुओं को रख सकें। गांव की गलियों और रास्‍तों पर जहां तक हो सके धूल न हो। अपनी जरूरत के अनुसार गांव में कुएं हों, जिनसे गांव के सब लोग पानी भर सकें। सबके लिए प्रार्थना-घर या मंदिर हों, सार्वजनिक सभा वगैरा के लिए एक अलग स्‍थान हो, गांव की अपनी गोचर-भूमि हो, सहकारी ढंग की एक गोशाला हो, ऐसी प्राथमिक और माध्‍यमिक शालायें हों जिनमें उद्योग की शिक्षा सर्व-प्रधान वस्‍तु हो, और गांव के अपने मामलों का निपटारा करने के लिए एक ग्राम-पंचायत भी हो। अपनी जरूरतों के लिए अनाज, साग-भाजी, फल, खादी वगैरा खुद गांव में ही पैदा हों। एक आदर्श गांव की मेरी अपनी यह कल्‍पना है। मौजूदा परिस्थिति में उसके मकान ज्‍यों-के-त्‍यों रहेंगे, सिर्फ यहां-वहां थोड़ा-सा सुधार कर देना अभी काफी होगा। अगर कहीं जमींदार हो और वह भला आदमी हो या गांव के लोगों में सहयोग या प्रेमभाव हो, तो बगैर सरकारी सहायता के खुद ग्रामीण ही-जिनमें जमींदार भी शामिल है-अपने बल पर लगभग ये सारी बातें कर सकते हैं। हां, सिर्फ नये सिरे से मकानों को बनाने की बात छोड़ दीजिये। और अगर सरकारी सहायता भी मिल जाय तब तो ग्रामों की इस तरह पुनर्रचना हो सकती है कि जिसकी कोई सीमा ही नहीं। पर अभी तो मैं यही सोच रहा हूं कि खुद ग्राम निवासी अपने बल पर परस्‍पर सहयोग के साथ और सारे गांव के भले के लिए हिल-मिलकर मेहनत करें, तो वे क्‍या-क्‍या कर सकते हैं? मुझे तो यह निश्‍चय हो गया है कि अगर उन्‍हें उचित सलाह और मार्गदर्शन मिलता रहे, तो गांव की-मैं व्‍यक्तियों की बात नहीं करता-आय बराबर दूनी हो सकती है। व्‍यापारी दृष्टि से काम में आने लायक अखूट साधन-सामग्री हर गांव में भले ही न हो, पर स्‍थानीय उपयोग और लाभ के लिए तो लगभग हर गांव में है। पर सबसे बड़ी बदकिस्‍मती तो यह है कि अपनी दशा सुधारने के लिए गांव के लोग खुद कुछ नहीं करना चाहते।

 

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गांव के कायकर्ता को सबसे पहले सफाई और आरोग्‍य के सवाल को अपने हाथ में लेना चाहिये- महात्मा गांधी

एक गांव के कायकर्ता को सबसे पहले गांव की सफाई और आरोग्‍य के सवाल को अपने हाथ में लेना चाहिये। यों तो ग्रामसेवकों को किंकर्तव्‍य-विमूढ़ बना देनी वाली अनेक समस्‍यायें हैं, पर यह समस्‍या ऐसी है जिसकी सबसे अधिक लापरवाही की जा रही है। फलत: गांव की तन्‍दुरूस्‍ती बिगड़ती रहती है और रोग फैलते रहते हैं। अगर ग्रामसेवक स्‍वेच्‍छापूर्वक भंगी बन जाय, तो वह प्रतिदिन मैला उठाकर उसका खाद बना सकता है और गांव के रास्‍ते बुहार सकता है। वह लोगों से कहे कि उन्‍हें पखाना-पेशाब कहां करना चाहिये, किस तरफ सफाई रखनी चाहिये, उसके क्‍या लाभ हैं, और सफाई के न रखने से क्‍या-क्‍या नुकसान होते हैं। गांव के लोग उसकी बात चाहे सुनें या न सुनें, वह अपना काम बराबर करता।

 

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गोवंश के हा्स के अनेक कारणों में व्‍यक्तिगत गोपालन भी एक कारण रहा है- महात्मा गांधी

प्रत्‍येक किसान अपने घर में गाय-बैल रखकर उनका पालन भली-भांति और शास्‍त्रीय पद्धति से नहीं कर सकता। गोवंश के हा्स के अनेक कारणों में व्‍यक्तिगत गोपालन भी एक कारण रहा है। यह बोझ वैयक्तिक किसान की शक्ति के बिलकुल बाहर है।

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आज संसार हर एक काम में सामुदायिक रूप से करना चाहिए- महात्मा गांधी

मैं तो यहां तक कहता हूं कि आज संसार हर एक काम में सामुदायिक रूप से शक्ति का संगठन करने की ओर जा रहा है। इस संगठन का नाम सहयोग है। बहुत-सी बातें आजकल सहयोग से हो रही हैं। हमारे मुल्‍क में भी सहयोग आया तो है, लेकिन वह ऐसे विकृत रूप में आया है कि उसका सही लाभ हिन्‍दुस्‍तान के गरीबों को बिलकुल नहीं मिलता।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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प्रत्‍येक किसान के पास जितनी चाहिये उतनी जमीन नहीं है – महात्मा गांधी

हमारी आबादी बढ़ती जा रही है और उसके साथ किसान की व्‍यक्तिगत जमीन कम होती जा रही है। नतीजा यह हुआ है कि प्रत्‍येक किसान के पास जितनी चाहिये उतनी जमीन नहीं है। जो है वह उसकी अड़चनों को बढ़ाने वाली है। ऐसा किसान अपने घर में या खेत पर गाय-बैल नहीं रख सकता रखता है तो अपने हाथों अपनी बरबादी को न्‍योता भी देता है। आज हिन्‍दुस्‍तान की यही हालत है। धर्म, दया या नीति की परवाह न करने वाला अर्थशास्‍त्र तो पुकार-पुकार कर कहता है कि आज हिन्‍दुस्‍तान में लाखों पशु मनुष्‍य को खा रहे हैं। क्‍योंकि उनसे कुछ लाभ नहीं पहुंचने पर भी उन्‍हें खिलाना तो पड़ता ही है। इसलिए उन्‍हें मार डालना चाहिये। लेकिन धर्म कहो, नीति कहो या दया कहो, ये हमें इन निकम्‍मे पशुओं को मारने से रोकते हैं।

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

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सामुदायिक पशुपालन से लाभ- महात्मा गांधी

1. जगह बचेगी। किसान को अपने घर में पशु नहीं रखने पड़ेंगे। आज तो जिस घर में किसान रहता है, उसी में उसके सारे मवेशी भी रहते हैं। इससे हवा बिगड़ती है और घर में गंदगी रहती है। मनुष्‍य पशु के साथ एक ही घर में रहने के लिए पैदा नहीं किया गया है। ऐसा करने में न दया है, न ज्ञान।
2. पशुओं की वृद्धि होने पर एक घर में रहना असंभव हो जाता है। इसलिए किसान बछड़े को बेच डालता है और भैंसे या पाड़े को मार डालता है, या मरने के लिए छोड़ देता है1 यह अधमता है। सहयोग से यह रूकेगा।
3. जब पशु बीमार होता है तब व्‍यक्तिगत रूप से किसान उसका शास्‍त्रीय उपचार नहीं करवा सकता। सहयोग से ही चिकित्‍सा सुलभ होती है।
4. प्रत्‍येक किसान सांड़ नहीं रख सकता। सहयोग के आधार पर बहुत से पश़ओं के लिए एक अच्‍छा सांड़ रखना सरल है।
5. प्रत्‍ये‍क किसान गोचर-भूमि तो ठीक पशुओं के लिए व्‍यायाम की यानी हिरने-फिरने की भूमि भी नहीं छोड़ सकता। किन्‍तु सहयोग के द्वारा ये दोनों सुविधायें आसानी से मिल सकती हैं।
6. व्‍यक्तिगत रूप में किसान को घास इत्‍यादि पर बहुत खर्च करना पड़ता है। सहयोग के द्वारा कम खर्च में काम चल जायेगा।
7. किसान व्‍यक्तिगत रूप में अपना दूध आसानी से नहीं बेच सकता सहयोग के द्वारा उसे दाम भी अच्‍छे मिलेंगे और वह दूध में पानी वगैरा मिलाने के लालच से भी बच सकेगा।
8. व्‍यक्तिगत रूप में किसान के लिए पशुओं की परीक्षा करना असंभव है, किन्‍तु गांव भर के पशुओं की परीक्षा सुलभ्‍ा है। और उनकी नसल के सुधार का प्रश्‍न भी आसान हो जाता है।
9. सामुदायिक या सहयोगी पद्धति के पक्ष में इतने कारण पर्याप्‍त होने चाहिये। परन्‍तु सबसे बड़ी और सचोट दलील तो यह है कि व्‍यक्तिगत पद्धति के कारण ही हमारी और पशुओं की दशा आज इनती दयनीय हो उठी है। उसे बदल दें तो हम भी बच सकते हैं और पशुओं को भी बचा सकते हैं।

मेरा तो विश्‍वास है कि जब हम अपनी जमीन को सामुदायिक पद्धति से जोतेंगे, तभी उससे फायदा उठा सकेंगे। गांव की खेती अलग-अलग सौ टुकड़ों में बट जाय, इसके बनिस्‍बत क्‍या यह बेहतर नहीं होगा कि सौ कुटुम्‍ब सारे गांव की खेती सहयोग से करें और उसकी आमदनी आपस में बांट लिया करें? और जो खेती के लिए सच है, वह पशुओं के लिए भी सच है।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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आज लोगों को सहयोग की पद्धति पर लाने में कठिनाई है – महात्मा गांधी

यह दूसरी बात है कि आज लोगों को सहयोग की पद्धति पर लाने में कठिनाई है। कठिनाई तो सभी सच्‍चे और अच्‍छे कामों में होती है। गोसेवा के सभी अंग कठिन हैं। कठिनाइयां दूर करने से ही सेवा का म

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Ahimsa. 5 Replies

My own finding is that first and foremost action in nonviolence (Ahimsa) is the personal aspect of turning to become a vegetarian. It is kind-of easy if not other-intentional to be non violent with…Continue

Started by JP Cusick in Ahimsa (non-violence). Last reply by Prof. Dr. Yogendra Yadav Mar 15, 2012.

THE END AND THE MEANS / AHIMSA OR "BY ALL MEANS NECESSARY" 2 Replies

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