GANDHI IN ACTION network

the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

Some Questions of Mahatma Gandhi in Hindi-XII

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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गरीबों के हृदय में प्रकट होने वाला र्इश्वर दरिद्रनारायण- महात्मा गांधी

मनुष्‍य-जाति को-जो वैसे नामहीन है और मनुष्‍य की बुद्धि की पहुंच के परे है-जिन अनन्‍त नामों से पहचानती है, उनमें से एक नाम दरिद्र-नारायण है; उसका अर्थ है गरीबों का या गरीबों के हृदय में प्रकट होने वाला ईश्‍वर।

 

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गरीबों के लिए रोटी ही अध्यात्म है – महात्मा गांधी

गरीबों के लिए रोटी ही अध्यात्म है। भूख से पीडि़त उन लाखों-करोड़ों लोगों पर किसी और चीज का प्रभाव पड़ नहीं सकता। कोई दूसरी बात उनके हृदयों को छू ही नहीं सकती। लेकिन उनके पास आप रोटी लेकर जाइये और वे आपको ही भगवान की तरह पूजेंगे। रोटी के सिवा उन्‍हें और कुछ सूझ ही नहीं सकता।

 

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गरीबों से आधुनिक बातें मत कीजिये- महात्मा गांधी

अपने इन्‍हीं हाथों से मैंने गरीबों के फटे-पुराने कपड़ो की गांठों में मजबुती से बंधे हुए मटमैले पैसे इकठ्टे किये हैं। उनसे आधुनिक प्रगति की बातें न कीजियें। उनके सामने व्‍यर्थ ही ईश्‍वर का नाम लेकर उनका अपमान मत कीजिये। हम उनसें ईश्‍वर की बात करेंगे, तो वे आपको और मुझे राक्षस बतायेंगे। अगर वें किसी ईश्‍वर को पहिचानते हैं, तो उसके बारे में उनकी कल्‍पना यही हो सकती है कि वह लोगों को आतंकित करने वाला, एक निर्दय अत्‍याचारी है।

 

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भारत जागेगा और यह कि उसमें इस विनाशकारी गरीबी से अपना उद्धार कर सकने की सामर्थ्‍य है – महात्मा गांधी

भूखा रहकर आत्महत्या करने की इच्छा का संवरण मैं अपने इसी विश्‍वास के कारण कर पाया हूं कि भारत जागेगा और यह कि उसमें इस विनाशकारी गरीबी से अपना उद्धार कर सकने की सामर्थ्‍य है। यदि इस सम्‍भावना में मेरा विश्‍वास न हो, तो मुझे जीने में कोई दिलचस्‍पी न रहे।

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गरीबों का र्इश्वर उसकी रोटी है- महात्मा गांधी

मेरी उनके पास ईश्‍वर का सन्देश ले जाने की हिम्‍मत नहीं होती। मैं उन करोड़ों भूखों के सामने, जिनकी आंखों में तेज नहीं और जिनका ईश्‍वर उनकी रोटी ही है, ईश्‍वर का नाम लूं, तो फिर वहां खड़े उस कुत्‍ते के सामने भी ले जा सकता हूं। उनके पास ईश्‍वर का सन्‍देश ले जाना हो, तो यह काम मैं उनके पास पवित्र परिश्रम का सन्‍देश ले जाकर ही कर सकता हूं। हम यहां बढि़या नाश्‍ता उड़ाकर बैठे हों और उससे भी बढि़या भोजन की आशा रखते हों, तब ईश्‍वर की बात करना हमें भला मालूम होता है। लेकिन जिन लाखों लोगों को दो जून खाने की भी नसीब नहीं होता, उनसे मैं ईश्‍वर की बात कैसे कहूं? उनके सामने तो ईश्‍वर रोटी और मक्‍खन के रूप में ही प्रकट हो सकता है। भारत के किसानों को रोटी अपन जमीन से मिल रही थी। मैंने उन्‍हें चरखा दिया, ताकि उन्‍हें थोड़ा मक्‍खन भी मिल सके। अगर आज यहां मैं लंगोटी पहिनकर आया हूं, तो इसका कारण यही हैं कि मैं उन लाखों आधे भूखे, आधे नंगे और मूक मानव-प्राणियों का एकमात्र प्रतिनिधि बनकर आया हूं।

 

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गरीबों की सेवा से मैं र्इश्वर की सेवा करता हूं- महात्मा गांधी

हमारे लाखों मूक देशवासियों के हृदयों में जो ईश्‍वर निवास करता है, उसके सिवा मैं किसी दूसरे ईश्‍वर को नहीं जानता। वे उसकी उपस्थिति का अनुभव नहीं करते; मैं करता हूं। और मैं सत्‍य रूप ईश्‍वर या ईश्‍वर रूप सत्‍य की पूजा इन मूक देशवासियों की सेवा के द्वारा ही करता हूं।

 

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जगत में आर्थिक असमानता के कारण- महात्मा गांधी

रोज की जरूरत जितना ही रोज पैदा करने का ईश्‍वर का नियम हम नहीं जानते, या जानते हुए भी उसे पालते नहीं। इसलिए जगत में असमानता और उसमें से पैदा होने वाले दु:ख हम भुगतते हैं। अमीर के यहां उसको न चाहिये वैसी चीजें भरी पड़ी होती हैं, वे लापरवाही से खो जाती हैं, बिगड़ जाती हैं; जब की इन्‍हीं चीजों के कमी के कारण करोड़ों लोग भटकते हैं, भूखों मरते हैं, ठंड से ठिठुर जाते हैं। सब अगर अपनी जरूरत की चीजों का ही संग्रह करें, तो किसी को तंगी महसूस न हो और सबको संतोष हो। आज तो दोनों (तंगी) महसूस करते हैं। करोड़पति अरबपति होना चाहता है, फिर भी उसको संतोष नहीं होता। कंगाल करोड़पति होना चाहता है; कंगाल को भरपेट ही मिलने से संतोष होता हो ऐसा नहीं देखा जाता। फिर भी उसे भरपेट पाने का हक है, और उसे उतना पाने वाला बनाना समाज का फर्ज है। इसलिए उसके (गरीब के) और अपने संतोष के खातिर अमीर को पहल करनी चाहिये। अगर वह अपना बहुत ज्‍यादा परिग्रह छोड़े, तो गंगाल को अपनी जरूरत का आसानी से मिल जाय और दोनों पक्ष संतोष का सबक सीखें।

 

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सच्‍ची सभ्‍यता का लक्षण परिग्रह बढ़ाना नहीं है – महात्मा गांधी

सही सुधार, सच्‍ची सभ्‍यता का लक्षण परिग्रह बढ़ाना नहीं है, बल्कि सोच-समझकर और अपनी इच्‍छा से उसे कम करना हैं। ज्‍यों-ज्‍यों हम परिग्रह घटाते जाते हैं त्‍यों-त्‍यों सच्‍चा सुख और सच्‍चा संतोष बढ़ता जाता है, सेवा की शक्ति बढ़ती जाती है। अभ्‍यास से, आदत डालने से आदमी अपनी हाजतें घटा सकता हैं; और ज्‍यों-ज्‍यों उन्‍हें घटाता जाता है त्‍यों-त्‍यों वह सुखी, शांत और सब तरह से तन्‍दुरूस्‍त होता जाता है।

 

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त्याग की यह शक्ति हमें कहीं से एकाएक नहीं मिल जायेगी – महात्मा गांधी

सुनहला नियम तो…… यह है कि जो चीज लाखों लोगों को नहीं मिल सकती, उसे लेने से हम भी दृढ़तापूर्वक इनकार कर दें। त्‍याग की यह शक्ति हमें कहीं से एकाएक नहीं मिल जायेगी। पहले तो हमे ऐसी मनोवृत्ति पैदा करनी चाहिये कि हमें उन सुख-सुविधाओं का उपयोग नहीं करना है, जिनसे लाखों लोग वंचित हैं। और उसके बाद तुरन्‍त ही अपनी इस मनोवृत्ति के अनुसार हमें शीघ्रतापूर्वक अपना जीवन बदलने में लग जाना चाहिये।

 

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संतों ने हमारे चरित्र का निर्माण किया- महात्मा गांधी

ईसा, मुहम्‍मद, बुद्ध, नानक, कबीर, चैतन्‍य, शंकर, दयानन्‍द, रामकृष्‍ण, आदि ऐसे व्‍यक्ति थे, जिनका हजारों-लाखों लोगों पर ग‍हरा प्रभाव पड़ा और जिन्होंने उनके चरित्र का निर्माण किया। वे दुनिया में आये तो उससे दुनिया समृद्ध हुई है। और वे सब ऐसे व्‍यक्ति थे जिन्‍होंने गरीबी को जान-बूझकर अपनाया।

 

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भारत की गरीबी की तस्वीर शहरों एवं गॉंवों में देखने को मिल जायेगी- महात्मा गांधी

जब तक एक भी सशक्‍त आदमी ऐसा हो जिसे काम न मिलता हो या भोजन न मिलता हो, तक तब हमें आराम करने या भरपेट भोजन करने में शर्म महसूस होनी चाहिये। ऐसे देश की कल्‍पना कीजिये जहां लोग प्रतिदिन औसतन पोच ही घण्‍टे काम करते हों और वह भी स्‍वेच्‍छा से नहीं बल्कि परिथस्थितियों की लाचारी के कारण; बस, आपको भारत की सही तस्‍वीर मिल जायेगी। यदि पाठक इस तस्‍वीर को देखना चाहता हो तो उसे अपने मन से शहरी जीवन में पायी जाने वाली व्‍यस्‍त दौड़धूप को, या कारखानों की मज़दूरों की शरीर को चूर कर देने वाली थकावट को या चाय-बगानों में दिखाई पड़नें वाली गुलामी को दूर कर देना चाहिये। ये तो भारत की आबादी के समुद्र की कुछ बूंदे ही हैं। अगर उसे कंकाल-मात्र रह गये भूखे भारतीयों की तस्‍वीर देखना हो, तो उसे उस अस्‍सी प्रतिशत आबादी की बात सोचना चाहिये, जो अपने खेतों में काम करती है, जिसके पा स साल में करीब चार महीने तक कोई धंधा नहीं होता और इसलिए जो लगभग भुखमरी की जि़न्‍दगी जीती है। यह उसकी सामान्‍य स्थिति है। इस विवश बेकारी में बार-बार पड़ने वाले अकाल काफी बड़ी वृद्धि करते हैं।

 

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हमारी औसत आयु इतनी कम है कि सोचकर दु:ख होता है – महात्मा गांधी

हमारी औसत आयु इतनी कम है कि सोचकर दु:ख होता है। इसी तरह हम दिन-दिन अधिकाधिक गरीब होते जा रहे हैं। इस‍का कारण यह है कि हमने अपने सात लाख गांवो की उपेक्षा की है। उनका खयाल नहीं रखा। उनसे जितने पैसे मिल सकें उतने लेने की हम कोशिश करते हैं, उन्‍हें कंगाल करके हम स्‍वयं कंगाल हो रहे हैं। यह हिस्‍दुस्‍तान पहले स्‍वर्ण-भूमि कहलाता था। यह किसकी बदौलत कंगाल हुआ? हमारी ही बदौलत। हमारे पास तमाम ऐश-आराम की चीज़ें हैं। मोटरें हैं, सोने को गद्दे हैं और अन्‍य सुविधायें हैं; परन्‍तु सच पूछा जाये तो हमको इनमें से एक भी चीज़ का अधिकार नहीं है।

 

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हिंदुस्तान की सभ्‍यता पश्चिम की सभ्‍यता से निराली है – महात्मा गांधी

हिंदुस्तान की सभ्‍यता पश्चिम की सभ्‍यता से निराली है। जहां ज़मीन ज्‍यादा हो और लोग कम, और जहां ज़मीन कम हो और लोग ज्‍यादा, उसमें तो फर्क होना ही चाहिये। मशीनें या कलें उन अमरीका वालो के लिए ज़रूरी होगी ही जहां लोग कम और काम ज्‍यादा है। किन्‍तु हिस्‍दुस्‍तान में जहां एक काम के लिए अनेक लोग खाली हैं, मशीनरी की जरूरत नहीं और न इस प्रकार भूखों मरकर समय बचाना ठीक है। यदि हम खाना भी यंत्र द्वारा खायें तो मैं समझता हूं कि आप वह कभी पसन्‍द न करेंगे। इसीलिए हमें उस खाली या बेकार जनता का उपयोग कर लेना चाहिये। हिस्‍तुस्‍तान की आबादी इतनी बढ़ गई है कि उसके भरण-पोषण के लिए उसकी ज़मीन बहुत कम है, ऐसा बहुत से अर्थशास्‍त्रज्ञ कहते हैं। पर मैं इसे नहीं मानता। हम यदि उद्योग करें तो दूना पैदा कर सकते हैं। इसमें मुझे पूरा विश्‍वास है। यह हमारे सोचने की बात है कि हम सच्‍चा उद्योग करें और देहातियों के साथ सम्‍पर्क बढ़ावें और उनके सच्‍चे सेवक बन जाया, तो मुझे पूर्ण विश्‍वास है कि हम हिस्‍दुस्‍तान के छोटे-छोटे उद्योगों से करोड़ों रूपये का धन पैदा कर सकते हैं। उसमें पैसे की भी विशेष आवश्‍यकता नहीं, ज़रूरत है लोगों की, मेहनत की।द्य यदि हम विचारशील जीवन रखें, तो हमारा बड़ा फायदा हो सकता है।

 

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हम लोग जो आटा खाते हैं वह आटा नहीं, ज़हर खाते हैं – महात्मा गांधी

हम लोग जो आटा खाते हैं वह आटा नहीं, ज़हर खाते हैं। हमारे लिए आस्‍ट्रेलिया से खाने को आटा आता है, वह तो ज़हर ही है। ऐसा मैं नहीं कहता, आपके डॉक्‍टर लोग कहते हैं। यहां हम अमृत को भी ज़हर बन‍ाकर खाते हैं। जो आटा हम कल से पिसाकर खाते हैं, उसका सब द्रव्‍य निकल जाता है और हम नि:सत्‍व भोजन खाते हैं। इससे हम दिनोंदिन क्षीण हो रहे हैं। आटा तो रोज़ घर की चक्‍की में पीसकर ताजा खाना चाहिये। मनों आटा पीसकर नहीं रख छोड़ना चाहिये। क्‍योंकि कुछ दिन के बाद दूषित हो जाता है। इस प्रकार घर में आटा पीस लेने से दो फायदे हैं। पहला ता शुद्ध, शक्तियुक्‍त भोजन खानें को मिलता है, जिससे हम दीर्घजीवी हो सकते हैं; और दूसरे, उस बहाने हमारी बहिनों का, जो निकम्‍मी-सी हो गई हैं, व्‍यायाम हो जायेगा, जिससे वे भी स्‍वास्‍थ्‍य-लाभ कर सकेंगी। यदि इतना पैसा जिसे हम कल में पिसवाने के लिए देते हैं बचता रहें, तो सब मिलाकर देश का कितना फायदा हो सकता है? इससे तो आम के आम और गुठली के दाम भी मिल जाते हैं। हमारी इससे कितनी बचत हो सकती है? धन भी बचे और स्‍वास्‍थ्‍य-लाभ भी हो। यह अर्थशास्‍त्र की बात नहीं, अनुभव कीबात है।

 

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हाथों से कुटा हुआ चावल खाना चाहिए- महात्मा गांधी

इसी प्रकार चावल के साथ भी अत्‍याचार करते हैं। आज मैं यह दु:ख की बात सुनता हूं। चावल की भूसी कलों द्वारा न निकलवानी चाहिये। उससे चावल का पोषक द्रव्‍य नष्‍ट हो जाता है। उसे तो घर में ही हाथों से कूटकर साफ करना चाहिये। यही बात तेल और गुड़ के लिए है। हमें शक्‍कर का प्रयोग न करके गुड़ खाना चाहिए। गुड़ की ललाई ही खून को बढ़ाती है, शक्‍कर की सफेदी नहीं। वह तो ज़हर हैं। लेकिन आतकल तो शुद्ध गुड़ नहीं मिनता। उसे हमे स्‍वयं तैयार करना चाहिये। इससे भी दूना लाभ होगा। शहद-जैसी कीमती चीज़ भी इसी प्रकार पैदा की जा सकती है। अभी शहद इतना कीमती है कि या तो बड़े-बड़े लोग उसे काम में ला सकते हैं या वैद्यराज अपनी गोलियां बनाने में, सर्वसाधारण नहीं।

 

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गुण और शहद में सफार्इ का विशेष खयाल रखा जाये- महात्मा गांधी

शहद भी मधुमक्खियों पालकर पैदा किया जा सकता है। हमें गुड़ और शहद के लिए देखना होगा कि वह सफाई से बनाया और निकाला जाय। इन छोटे-छोटे उद्योगों से आगे बढ़े तो हमारा जीवन ही कलामय हो जाय और हम करोड़ो रूपया पैदा कर सकें। हम अरोग्‍यशास्‍त्र भी नहीं जानते। इससे तो हमें स्‍वयं ही अरोग्‍यशास्‍त्र का सामान्‍य ज्ञान हो सकता है। मल भी अशुद्ध नहीं है। उससे भी हम सोना बना सकते हैं, अर्थात् अच्‍छी खाद बनाने के उपयोग में वह आ सकता है। उसका प्रयोग न करके हम उसका दुरूपयोग करते हैं और बाहर दरिया वगैरा में फेंककर अनेक रोग पैदा करते हैं, जो हमारे प्राण घातक हैं।
संपेक्ष में मेरा यही निवेदन है कि मैंने आपका ध्‍यान इधर खींचने की कोशिश की है। यदि आप इससे लाभ न उठावें तो मैं लाचार हूं। आप इन छोटी-छोटी बातों बहुत कुछ कर सकते हैं, लेकिन एक शर्त है कि इन्‍हें चन्‍द लोग करें और बाकी उन पर निर्भर रहें तो वे अवश्‍य भूखे मरेंगे। किन्‍तु यदि सब मिलकर करेंगे तो करोड़ों रूपये का फायदा हो सकता है, ऐसा मेरा पूर्ण विश्‍वास है। सबको अपना हिस्‍सा देना चाहिये। यह बात उद्यमशील के लिए है, अनुद्यमी के लिए नहीं। मैं उम्‍मीद करता हूं कि आप लोग इस पर अवश्‍य विचार करके इसे अमल में लायेंगे।

 

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हमारे देश में बेकारी का सवाल उतना कठिन नहीं है जितना दूसरें देशों में है – महात्मा गांधी

एक तरह से देखें तो हमारे देश में बेकारी का सवाल उतना कठिन नहीं है जितना दूसरें देशों में है। इस सवाल का लोगों की रहन-सहन के तरीके से घनिष्ठ संबंध है। पश्चिम के बेकार मज़दूरों को गरम कपड़ा चाहिये, दूसरे लोगों की ही तरह जूते और मोजे चाहिये, गरम घर चाहिये और ठंडी आबहवा में आवश्‍यक अन्‍य अनेक वस्‍तुएं चाहिये। हमें इन सब चीजों की जरूरत नहीं है। लेकिन मुझे स्‍वीकार करना चाहिये कि इस स्थिति के लिए हमारी अपनी उपेक्षा और अज्ञान ही जिम्‍मेदार हैं। शारीरिक-श्रम करने में जो गौरव है उसे हम नहीं जानते। उदाहरण के लिए, मोची जूते बनाने के सिवा कोई दूसरा काम नहीं करता; वह ऐसा समझता है कि दूसरे काम उसके प्रतिष्‍ठा के अनुकूल नहीं हैं। यह गलत खयाल दूर होना चाहिये। उन सब लोगों के लिए, जो अपने हाथों और पांवो से ईमानदारी के साथ मेहनत करना चाहते हैं, हिस्‍दुस्‍तान में काफी धंधा है। ईश्‍वर ने हर एक को काम करने की और अपनी रोजी की रोटी से ज्‍यादा कमाने की क्षमता दी है। और जो भी इस क्षमता का उपयोग करने के लिए तैयार हो, उसे काम अवश्‍य मिल सकता है। ईमान की कमाई करने की ईच्‍छा रखने वाले को चाहिये की वह किसी भी काम को नीचा न माने। जरूरत इस बात की है कि ईश्‍वर ने हमें जो हाथ-पांव दिये हैं, उनका उपयोग करने के लिए हम तैयार रहें।

 

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मजदूर का कौशल ही ऊंची पूंजी है- महात्मा गांधी

मैं मानता हूं कि मेहनत-मजदूरी करके अपनी जीविका कमाने वालों के लिए विविध धंधों के पर्याप्‍त ज्ञान की वही कीमत है, जो कि पैसे की पूंजीपति के लिए है। मजदूर का कौशल ही ऊंची पूंजी है। जिस तरह पूंजीपति अपनी पूंजी को मजदूरों के सहयोग क बिना फलप्रद नहीं बना सकता, उसी तरह मजदूर भी अपनी मेहनत को पूंजी के सहयोग के बिना फलप्रद नहीं बना सकते। और मजदूरों तथा पूंजीवालों, दोनों की बुद्धि का विकास समान रूप से हुआ हो और दोनों को एक-दूसरे से न्‍यायोचित व्‍यवहार हासिल करने की अपनी क्षमता में विश्‍वास हो, तो वे एक-दूसरें को किसी समान कार्य में लगे हुए समान दरजे के सहकारी मानना सीखेंगे, और एक दूसरे का वैसा ही आदर करने लगेंगे। जरूरत इस बात की है कि वे एक-दूसरे को अपना ऐसा विरोधी समझना बन्‍द कर दें, जिनमें मेल कभी हो ही नहीं सकता। कठिनाई यह है कि आज पूंजी वालों में तो संघटन है और ऐसा भी मालूम होता है कि उन्‍होंने अपने पैर मजबूती से जमा रखे हैं; लेकिन मजदूरों का नहीं है। इसके सिवा मजदूर अपने जड़ और यांत्रिक व्‍यवसाय से भी जकड़ा हुआ है। इस व्‍यवसाय के कारण उसे अपनी बुद्धि का विकास करने के लिए मौका ही नहीं मिलता। इसीलिए वह अपनी स्थिति की शक्ति को और उसके गौरव को पूरी तरह समझने में असमर्थ रहा है। उसे यह मानना सिखाया गया है कि उसका वेतन तो पूंजी वाले ही तय करेंगे; उसके सम्‍बन्‍ध में वह खुद अपनी कोई मांग नहीं कर सकता। उपाय यह है कि वे सही ढंग से अपना संघटन करें, अपनी बुद्धि का विकास करें और एक से अधिक धंधों में निपुणता प्राप्‍त करें। ज्‍यों ही वे ऐसा करेंगे त्‍यों ही वे अपना सिर ऊंचा रखकर चलने में समर्थ हो जायेंगे और अपनी जीविका के बारे में फिर उन्‍हें डरने की कोई आवश्‍यकता नहीं रहेगी।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

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हम लोग अपने हकों पर जोर देने के चक्‍कर में फर्जों को भूल गये हैं- महात्मा गांधी

मैं आज उस बहुत बड़ी बुराई की चर्चा करना चाहता हूं, जिसने समाज को मुसीबत में डाल रखा है। एक तरफ पूंजीपति और ज़मींदार अपने हकों की बात करते हैं, दूसरी तरफ मजदूर अपने हकों की । राजा-महराजा कहते हैं कि हमें शासन करने का दैवी अधिकार मिला हुआ हैं, तो दूसरी तरफ उनकी रैयत कहती है कि उसे राजाओं के इस हक का विरोध करने का अधिकार हैं। अगर सब लोग सिर्फ अपने हकों पर ही जोर दे और फर्जो को भूल जाये, तो चारों तरफ गड़बडी़ और अंधाधुंधी मच जाये।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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अगर हम आदमी हको पर जोर देने के बजाय अपना फर्ज अदा करें, तो मनुष्‍य-जाति में जल्‍दी ही व्यवस्था और अमन का राज्य कायम हो जाये – महात्मा गांधी

अगर हम आदमी हको पर जोर देने के बजाय अपना फर्ज अदा करें, तो मनुष्‍य-जाति में जल्‍दी ही व्यवस्था और अमन का राज्य कायम हो जाये । राजाओं के राज करने के दैवी अधिकार जैसी या रैयत के इज्‍जत से अपने मालिकों का हुक्‍म मानने के नम्र कर्तव्‍य जैसी कोई चीज नहीं है। यह सच है कि राजा और रैयत के पैदाइशी भेद मिटने ही चाहिये, क्‍योंकि वे समाज के हित को नुकसान पहुंचाते है। लेकिन यह भी सच है कि अभी तक कुचले और दबाकर रखें गये लाखों-करोड़ों लोगों के हकों का ढिठाई-भरा दावा भी समाज के हित को ज्‍यादा नहीं तो उतना ही नुकसान जरूर पहुंचाता है। उनके इस दावे से दैवी अधिकारों या दूसरे हकों की दुहाई देने वाले राजा-महराजा या जमींदारों वगैरा के बनिस्‍बत करोड़ों लोगों को ही ज्‍यादा नुकसान पहुंचेगा। ये मुट्ठीभर जमींदार, राजा-महराजा, या पूंजीपति बहादूरी या बुजदिली से मर सकते हैं, लेकिन उनके मरने से ही सारे समाज का जीवन व्‍यवस्‍थति, सुखी और सन्‍तुष्‍ट नहीं बन सकता । इसलिए यह जरूरी है कि हम हकों और फर्जो का आपसी सम्‍बन्‍ध समझ लें । मैं यह कहने की हिम्‍मत करूंगा कि जो हक पूरी तरह अदा किये गये फर्ज ये नहीं मिलते, वे प्राप्‍त करने और रखने लायक नहीं है । वे दूसरों से छीने गये हक होंगे । उन्‍हें जल्‍दी-से-जल्‍दी छोड़ देने में ही भला है । जो अभागे मां-बाप के प्रति अपना फर्ज अदा किये बिना उनसे अपना हुक्‍म मनवाने का दावा करते हैं, वे बच्‍चों की नफरत को ही भड़कायेगें । जो बदचलन पति अपनी वफादार पत्नि से हर बात मनवाने की आशा करता है, वह धर्म के वचन को गलत समझता है; उसका एकतरफा अर्थ करता है । लेकिन जो बच्‍चे हमेशा फर्ज अदा करने के लिए तैयार रहने वाले मां-बात को जलील करते हैं, वे कृतघ्‍न समझे जायेंगे और मां-बाप के मुकाबले खुद का ज्‍यादा नुकसान करेंगे । यही बात पति और पत्नि के बारे में भी कहीं जा सकती है । अगर यह सादा और सब पर लागू होने वाला कायदा मालिकों और मजदूरों, जमींदारों और किसानों, राजाओं और रैयत, या हिन्‍दु और मुसलमानों पर लगाया जाय, तो हम देखेंगे कि जीवन के हर क्षेत्र में अच्‍छे-से-अच्‍छा सम्‍बन्‍ध कायम किये जा सकते हैं। और ऐसा करने से न तो हिन्‍दूस्‍तान या दुनिया के दूसरे हिस्‍सों की तरह सामाजिक जीवन या व्‍यापार में किसी तरह की रूकावट आयेगी और न गड़बड़ी पैदा होगी । मैं जिसे सत्‍याग्रह कहता हूं वह नियम अपने-अपने फर्जों और उनके पालन से अपने-आप प्रकट होने वाले हकों के सिद्धांतों को बराबर समझ लेने का नतीजा है ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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हिन्दू अपने पड़ोसी मुसलमान से दोस्ती करे- महात्मा गांधी

एक हिन्दू का अपने मुसलमान पड़ोसी के प्रति क्‍या फर्ज होना चाहिये ? उसे चाहिये कि वह एक मनुष्‍य के नाते उससे दोस्‍ती करे और उसके सुख दु:ख में हाथ बंटाकर मुसीबत में उसकी मदद करें । तब उसे अपने मुसलमान पड़ोसी से ऐसे ही बरताव की आशा रखने का हक प्राप्‍त होगा । और शायद मुसलमान भी उसके साथ वैसा ही बरताव करे जिसकी उसे उम्‍मीद हो । मान लीजिये कि किसी गांव में हिन्‍दुओं की तादाद बहुत ज्‍यादा है और मुसलमान वहां इने-गिने ही हैं, तो उस ज्‍यादा तादाद वाली जाति की अपने थोड़े से मुसलमान पड़ोसियों की तरफ की जिम्‍मेदारी कई गुना बढ़ जाती है । यहां तक कि उन्‍हें मुसलमानों को यह महसूस करने का मौका भी न देना चाहिये कि उनके धर्म के भेद की वजह से हिन्‍दू उनके साथ अलग किस्‍म का बरताव करते हैं । तभी, इससे पहले नहीं, हिन्‍दू यह हक हासिल कर सकेंगे कि मुसलमान उनके उनके सच्‍चे दोस्‍त बन जायें और खतरे के समय दोनों कौमें एक होकर काम करें । लेकिन मान लीजिये कि वे थोड़े से मुसलमान ज्‍यादा तादात वाले हिन्‍दुओं के अच्‍छे बरताव के बावजूद उनसे अच्‍छा बरताव नहीं करते और हर बात में लड़ने के तैयार हो जाते हैं, तो यह उनकी कायरता होगी । जब उन ज्‍यादा तादात वाले हिन्‍दुओं का क्‍या फर्ज होगा ? बेशक, बहुमत कि अपनी दानवी शक्ति से उन पर काबू पाना नही । यह तो बिना हासिल किये हक को जबरदस्‍ती छिनना होगा । उनका फर्ज यह होगा कि वे मुसलमानों के अमानूषिक बरताव को उसी तरह रोकें, जिस तरह वे अपने सगे भाईयों के ऐसे बरताव को राकेंगे । इस उदाहण को और ज्‍यादा बढ़ाना मैं जरूरी नहीं समझता । इतना कहकर मैं अपने बात पूरी करता हूं कि जब हिन्‍दुओं की जगह मुसलमान बहुमत में हो और हिन्‍दू इने-गिने हो, तब भी बहुमत वाले को ठीक इसी तरह का बरताव करना चाहियें । जो कुछ मैनें कहा उसका मौजूदा हालत में हर जगह उपयोग करके फायदा उठाया जा सकता है । मौजूदा हालत घबडा़हट पैदा करने वाली बन गई है, क्‍योंकि लोग अपने बरताव इस सिद्धांत पर अमल नहीं करते कि कोई फर्ज पूरी तरह अदा करने के बाद ही हमें उससे सम्‍बन्‍ध रखने वाला हक हासिल होता है ।

 

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राजाओं का फर्ज है कि वे रिआया के सच्‍चे सेवकों की तरह काम करें – महात्मा गांधी

यही नियम राजाओं और रैयत पर लागू होता है । राजाओं का फर्ज है कि वे रिआया के सच्‍चे सेवकों की तरह काम करें । वे किसी बाहरी सत्‍ता के दिये हुए हकों के बल पर राज्‍य नहीं करेंगे और तलवार के जोर से तो कभी नहीं । वे सेवा से हासिल किये गये हक से और खुद को मिली हुई विशेष बुद्धि के हक से राज्‍य करेंगे । तब उन्‍हें खुशी से दिये जाने वाले टैक्‍स वसूल करने का और उतनी ही राजी-खुशी से की जानी वाली सेवायें लेने का हक हासिल होगा । और यह टैक्‍स वे अपने लिये नही बल्कि अपनी आश्रय में रहने वाली प्रजा के लिये वसूल करेंगे । अगर राजा लोग इस सादे और बुनियादी फर्ज को अदा करने में असफल रहते है, तो प्रजा के उनके प्रति रहने वाले सारे फर्ज ही खतम नहीं हो जाते, बल्कि प्रजा का यह फर्ज हो जाता है कि वह राजाओं के मनमानी चालों का मुकाबला करें। दूसरे शब्‍दों में यों कहा जा सकता है कि प्रजा राजाओं के बुरे शासन या मनमानी का मुकाबला करने का हक हासिल कर लेती है । अगर हमारा मुकाबला हत्‍या, बरबादी और लूट-मार का रूप ले लें, तो फर्ज के नाते यह कहा जायेगा कि वह मुकाबला मनुष्‍य-जाति के खिलाफ एक गुनाह बन जाता है । जो शक्ति कुदरती तौर पर फर्ज को अदा करने से पैदा होती है, वह सत्‍याग्रह से पैदा होने वाली और किसी से न जीती जा सकने वाली अहिंसक शक्ति होती हैं ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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भारत के सामने आज दो रास्ते है – महात्मा गांधी

भारत के सामने आज दो रास्ते है, वह चाहे तो पश्चिम के ‘शक्ति ही अधिकार हैं’ वाले सिध्‍दांत को अपनायें और चालायें या पूर्व के इस सिध्‍दांत पर दृढ़ रहे और उसी की विजय के लिए अपनी सारी ताकत लगायें कि सत्‍य की ही जीत होती हैं’ सत्‍य में कभी हार है ही नहीं’ और ताकतवर तथा कमजोर, दोनों को न्‍याय पाने का समान अधिकार है। यह चुनाव सबसे पहले मज़दूर-वर्ग को करना है। क्‍या मज़दूरों को अपने वेतन में वृध्दि, यदि वैसा संभव हो तो भी, हिंसा का आश्रय लेकर करानी चाहिये? उनके दावे कितने भी उचित क्‍यो न हो? उन्‍हें हिंसा का आश्रय करानी चाहियें? उनके दावें कितने भी उचित क्‍यो न हो उन्‍हें हिंसा का आश्रय नही लेनी चाहिये। अधिकार प्राप्‍त करने के लिए हिंसा क ा आश्रय लेना शायद आसान मालूम हो, किन्‍तु यह रास्‍ता अंत में कांटो वाला सिध्‍द होता है। जो लोग तलवार के द्वारा जीवित रहते है, वे तलवार से ही मरतें है। तैराक अक्‍सर डुब कर मरता है। यूरोप की ओर देखिये। वहा कोई भी सुखी दिखाई नहीं देता, क्‍योकि किसी को भी संतोष नहीं है। मज़दूर पूंजीपति का विश्‍वास नहीं करता और पूंजीपति को मज़दूर मे विश्‍वास नहीं है। दोनों मे एक प्रकार की स्‍फूर्ति और ताकत है, लेकिन वह तो बैलों में भी होती है। बैल भी मरने की हद तक लड़ते है। किसी भी गति-प्रगति नहीं है। हमारे पास यह मानने का कोई कारण नहीं है कि यूरोप के लोग प्रगति कर रहे है। उनके पास जो पैसा उससे यह सूचित नहीं होता कि उनमें कोई नैतिक या आध्‍यात्मिक सद्गुण है। दुर्योधन असीम धन का स्‍वामी था, लेकिन बिदुर या सुदामा की तुलना में गरीब ही था। आज दुनिया बिदुर और सुदामा की पूजा करती है, लेकिन दुर्योधन नाम तो उस सब बुराईयों के प्रती‍क के रूप मे ही याद किया जाता है जिससे आदमी को बचना चाहिये।

 

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यदि मजदूर मिल मालिको की बुध्दि हासिल कर ले, तो मिल-मालिको को मज़दूरो को दी हुई शर्तो पर काम करना पड़ेगा – महात्मा गांधी

पूंजी और श्रम चल रहे संघर्ष के बारे में आम तौर पर यह कहां जा सकता है कि गलती अक्‍सर पूंजीपतियों से ही होती है। लेकिन जब मज़दूरों को अपनी ताकत का पूरा भान हो जायेगा तब मै जानता हूं कि वे लोग पूंजीपतियों से भी ज्‍यादा अत्‍याचार कर सकते है। यदि मजदूर मिल मालिको की बुध्दि हासिल कर ले, तो मिल-मालिको को मज़दूरो को दी हुई शर्तो पर काम करना पड़ेगा। लेकिन यह स्‍पष्‍ट है कि मज़दूरों में वह बुध्दि कभी नही आ सकती। अगर वे वैसी बुध्दि प्राप्‍त कर ले तो मज़दूर मज़दूर ही न रहे और मालिक बन लाये। पूंजीपति केवल पूंजी की ताकत पर नहीं लड़ते, उनके पास बुध्दि और कौशल भी है।

 

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अगर मजदूर अपनी पशु-शक्ति का आश्रय लेगा तो वह उसके लिए आत्मघातक सिद्ध होगा- महात्मा गांधी

हमारे सामने सवाल यह है : मजदूरों में, उनके मजदूर रहते हुए, अपनी शक्ति और अधिकारों की चेतना आ जाये, उस समय उन्‍हें किस मार्ग का अवलम्‍बन करना चाहिये ? अगर उस समय मजदूर अपनी संख्‍या के बल का यानी पशु-शक्ति का आश्रय लें, तो यह उनके लिए आत्‍मघातक शिद्ध होगा । ऐसा करके वे देश के उद्योगों को हानि पहुंचायेगें । दूसरी ओर यदि वे शुद्ध न्‍याय का आधार लेकर लड़ें और उसे पाने के लिए खुद कष्‍ट सहन करें, तो वे अपनी हर कोशिश में न सिर्फ सफल होगें बल्कि अपने मालिकों के ह्दय का परिवर्तन कर डालेंगे, उद्योगों का ज्‍यादा विकास करेगें और अन्‍त में मालिक और मजदूर, दोनों एक ही परिवार के सदस्‍यों की भांति रहने लगेंगे ।

 

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मजदूरों की हालत के संतोषजनक सुधार के लिए आवश्यक निर्देश- महात्मा गांधी

1. श्रम का समय इतना ही होना चाहिये की मजदूरों को आराम करने के लिए भी काफी समय बचा रहें ।
2. उन्‍हें अपने शिक्षण की सुविधायें मिलनी चाहिये ।
3. उनके बच्‍चों की आवश्‍यक शिक्षा के लिए तथा वस्‍त्र और पर्याप्‍त दूध के लिए व्‍यवस्‍था की जानी चाहिये ।
4. मजदूरों के लिए साफ-सुथरे घर होने चाहिये ।
5. उन्‍हें इतना वेतन मिलना चाहिये कि वे बुढ़ापे में अपनी निर्वाह के लिए काफी रकम बचा सकें।

 

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मालिक और मजदूर दोनों को अपनी प्रवृत्तियों में सुधार करना होगा- महात्मा गांधी

इस हालत के दोनों ही पक्ष जिम्‍मेदार हैं । मालिक लोग केवल काम की पर्वाह करते है । मजदूरों का क्‍या होता है, उससे वे कोई सम्‍बन्‍ध नहीं रखते । उनकी सारी कोशिशों का मकसद यही होता है कि पैसा कम-से-कम देना पड़े और काम ज्‍यादा-से-ज्‍यादा मिलें । दूसरी ओर मजदूरों की कोशिश ऐसी सब युक्तियां करने की होती हैं, जिससे पैसा उसे ज्‍यादा-से-ज्‍यादा मिलें और काम कम-से-कम करना पड़े । परिणाम यह होता है, यद्यपि मजदूरों के वेतन में वृद्धि होती हैं, परन्‍तु काम की मात्रा में कोई सुधार नहीं होता । दोनों पक्षों के सम्‍बन्‍ध शुद्ध नहीं बनते और मजदूर लोग अपनी वेतन-वृ‍द्धि का समुचित उपयोग नहीं करते । इन दोनों पक्षों के बीच में एक तीसरा पक्ष खड़ा हो गया हैं । वह मजदूरों का मित्र बन गया है। ऐसे पक्ष की आवश्‍यकता से इंकार नहीं किया जा सकता । लेकिन यह पक्ष मजदूरों के प्रति अपनी मित्रता का निर्वाह उसी हद तक कर सकेगा, जिस हद तक उनके प्रति उसकी मित्रता स्‍वार्थ से अछूती होगी ।

 

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लोगों को मजदूरों और राष्ट्रसेवा को चुनना चाहिए- महात्मा गांधी

अब वह समय आ पहुंचा है ज‍ब कि मजदूरों का उपयोग कई तरह से शतरंज की प्‍यादों की तरह से करने की कोशिशें की जायेगी । जो लोग राजनीति में भाग लेने की इच्‍छा रखते हैं, उन्‍हें इस सवाल पर विचार करना चाहिये । वे लोग क्‍या चुनेंगे : अपना हित या मजदूरों की और राष्‍ट्र की सेवा? मजदूरों को मित्रों की बड़ी आवश्‍यकता है । वे नेतृत्‍व के बिना कुछ नहीं कर सकते । देखना यह है कि यह नेतृत्‍व उन्‍हें किस किस्‍म के लोगों से मिलता है;क्‍योंकि उससे ही मजदूरों की भावी परिस्‍थतियों का निर्धारण होन वाला है ।

 

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सहमति के बिना कोर्इ हड़ताल नहीं करना चाहिए- महात्मा गांधी

काम छोड़कर बैठ जाना, हड़तालें आदि बेशक बहुत प्रभावशाली साधन हैं, लेकिन उनका दुरूपयोग आसान है । मजदूरों को अपने शक्तिशाली यूनियन बनाकर अपना संगठन कर लेना चाहिये और इन यूनियनों की सहमति के बिना कभी भी कोई हड़ताल नहीं करनी चाहिये । हड़ताल करने के पहले सहमति के बिना कभी भी कोई हड़ताल नहीं करनी चाहिये । हड़ताल करने के पहले मिल-मालिकों से बातचीत के द्वारा समझौते की कोशिश होनी चाहिये; उसके बिना हड़ताल का खतरा मोल लेना ठीक नहीं। यदि मिल-मालिक झगड़े के निपटारे के लिए पंच-फैसले का आश्रय लें, तो पंचायत की बात दोनों पक्षों को उसका निर्णय समान रूप से जरूर मान लेना चाहिये, भले उन्‍हें वह पसंद आया हो या नहीं ।

 

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मालिक की तुलना में मजदूर लोग अपने कर्तव्य ज्यादा ईमानदारी से पूरा करते हैं – महात्मा गांधी

मेरा सर्वत्र यही अनुभव रहा है कि सामान्‍यत: मालिक की तुलना में मजदूर लोग अपने कर्तव्‍य ज्‍यादा ईमानदारी के साथ और ज्‍यादा परिणामकारी ढ़ंग से पूरे करते हैं, यद्यपि जिस तरह मालिक के प्रति मजदूरों के कर्तव्‍य होते हैं उसी तरह मजदूरों के प्रति मालिक के भी कर्तव्‍य होते हैं । और यही कारण है कि मजदूरों के लिए इस बात की खोज करना आवश्‍यक हो जाता है कि वे मालिकों से अपनी मांग किस हद तक मनवा सकते हैं । अगर हम यह देखें कि हमें काफी वेतन नहीं मिलता या कि हमें निवास की जैसी सुविधा चाहिये वैसी नहीं मिल रही है, तो हमें काफी वेतन और समुचित निवास की सुविधा चाहिये, इस बात का रास्‍ता ढूढ़ंना पड़ता है । मजदूरों को कितनी सुख-सुविधा चाहिये, इस बात का निश्‍चय कौन करे ? सबसे अच्‍छी बात तो यही होगी कि तुम मजदूर लोग खुद यह समझो कि तुम्‍हारे अधिकार क्‍या हैं, उन अधिकारों को मालिकों से मनवाने का उपाय क्‍या है और फिर उन्‍हें उन लोगों से तुम खुद ही हासिल करो । लेकिन इसके लिए तुम्‍हारे पास पहले से ली हुई थोड़ी-सी ता‍लीम होनी चाहिये-शिक्षा होनी चाहिये ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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यदि मज़दूरों में काफी संगठन हो और बलिदान की भावना हो, उन्हें हमेशा सफलता मिल सकती है – महात्मा गांधी

मेरी नम्र राय में यदि मज़दूरों में काफी संगठन हो और बलिदान की भावना हो, तो उन्‍हें अपने प्रयत्‍नों में हमेशा सफलता मिल सकती है । पूंजीपति कितने ही अत्‍याचारी हों, मुझे निश्‍चय है कि जिनका मजदूरों से सम्‍बन्‍ध है और जो मजदूर-आंदोलन का मार्गदर्शन हैं, खुद उन्‍हें भी अभी इस बात की कल्‍पना नहीं है कि मजदूरों की साधन-सम्‍पत्ति कितनी विशाल है । उनकी साधन-सम्‍पत्ति सचमूच इतनी विशाल है कि पूंजीपतियों की उतनी कभी हो ही नहीं सकती । अगर मजदूर इस बात को पूरी तरह समझ लें कि पूंजी श्रम का सहारा पाये बिना कुछ नहीं कर सकती, तो उन्‍हें अपना उचित स्‍थान तुरंत ही प्राप्‍त हो जायेगा ।

 

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दुर्भाग्‍यवश हमारा मन पूंजी की मोहनी से मूढ़ हो गया है – महात्मा गांधी

दुर्भाग्‍यवश हमारा मन पूंजी की मोहनी से मूढ़ हो गया है और हम यह मानने लगे है कि दुनिया में पुंजी की सब-कुछ हैं । लेकिन यदि हम गहरा विचार करें तो छड़ मात्र में हमें यह पता चल जायेगा कि मजदूर के पास जो पूंजी है वह पूंजी‍पतियों के पास कभी हो ही नहीं सकती । …. अंग्रेजी में एक बहुत जोरदार शब्‍द है- यह शब्‍द आपकी फ्रैंच भाषा में दुनिया की दूसरी भाषाओं में भी है । यह है ‘नहीं’ । बस, हमने अपनी सफलता के लिए यही रहस्‍य खोज निकाला है कि जब पूंजीपति मजदूरों से ‘हां’ कहलवाना चाहते हो उस समय यदि मजदूर ‘हां’ न कहकर ‘नहीं’ कहने की इच्‍छा रखते हो, तो उन्‍हें निस्‍संकोच ‘नहीं’ का ही गर्जन करना चाहिये । ऐसा करने पर मजदूरों को तुरंत ही इस बात का ज्ञान हो जायेगा कि उन्‍हें यह आजादी है कि जब वे ‘हां’ कहना चाहे तब ‘हां’ कहे और जब ‘नहीं’ कहना चाहे तब ‘नहीं’ कह दे; और यह कि वे पूंजी के अधीन नहीं है बल्कि पूंजी को ही खुश रखना है । पूंजी के पास बंदूक और तोप और यहां तक जहरीले गैस जैसे डरावने अस्‍त्र भी है, तो भी इस स्थिति में कोई फर्क नहीं पड़ सकता । अगर मजदूर अपनी ‘नहीं’ की टेक कायम रखें, तो पूंजी अपने उन सब शस्‍त्रास्‍त्रों के बावजूद पूरी तरह असहाय सिद्ध होगी । उस हालत में मजदूर प्रत्‍याक्रमण नहीं करेंगे, बल्कि गोलियों और जहरीले गैस की मार सहते हुए भी झुकेंगे नहीं और अपनी ‘नहीं’ की टेक पर अडिग रहेंगे । मजदूर अपने प्रयन्‍त में अक्‍सर असफल होते हैं, उनका कारण यह है कि वे जैसा मैंने कहा है वैसा करके पूंजी का शोधन नहीं करते, बल्कि (मैं खुद मजदूर के नाते ही यह कह रहा हूं) उस पूंजी को स्‍वयं हथियाना चाहते है और खुद पूंजीपति शब्‍द के बुरे अर्थ में पूंजीपति बनना चाहते हैं । और इसलिय पूंजीपतियों को, जो अच्‍छी तरह संगठित हैं और अपनी जगह मजबूती से डटे हुए है, मजदूरों में अपना दर्जा पाने के अभिलाषी उम्‍मीदवार मिल जाते है और वे मजदूरों के इस अंश का उपयोग मजदरों को दबाने के लिए करते है । अगर हम लोग पूंजी की इस मोहनी के प्रभाव में न होते, तो हममें से हर एक इस बुनियादी सत्‍य को आसानी से समझ लेता ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

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हड़तालें असंतोष की निशानी हैं- महात्मा गांधी

आजकल हड़तालों का दौर-दौरा है। वे वर्तमान असंतोष की निशानी हैं। तरह-तरह के अनिश्चित विचार हवा में फैल रहे हैं। सबके दिलों मे एक धुंधली-सी आशा बंधी हुई है। और यदि वह आशा निश्चित रूप धारण नहीं करेगी, तो लोगों को बड़ी निराशा होगी। और देशों की तरह भारत में भी मज़दूर-जगत उन लोगों की दया पर निर्भर है, जो सलाहकार और पथदर्शक बन जाते हैं। ये लोग सदा सिध्‍दांत-पालक नहीं होते और सिध्‍दांत-पालक होते भी हैं तो हमेशा बुध्दिमान नहीं होते। मज़दूरों को अपनी हालत पर असंतोष है। असंतोष के लिए उनके पास पूर कारण हैं। उन्‍हें सह सिखाया जा रहा है, और ठीक सिखाया जा रहा है, कि अपने मालिकों को धनवान बनाने का मुख्‍य साधन वे ही हैं। राजनीतिक स्थिति भी भारत के मज़दूरों को प्रभावित करने लगी है। और ऐसे मज़दूर-नेताओं का अभाव नहीं है, जो यह समझते हैं कि राजनीतिक हेतुओं के लिए हड़तालें कराई जा स‍कती हैं।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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आज कल की हड़तालें राजनीति प्रेरित – महात्मा गांधी

मेरी राय में ऐसे हेतु के लिए मज़दूर-हड़तालों का उपयोग करना अत्‍यंत गंभीर भूल होगी। मैं इससे इनकार नहीं करता कि ऐसी हड़तालों से राजनीतिक गरज़ पूरी की जा सकती है। परन्‍तु वे अहिंसक असहयोग की योजना में नहीं आतीं। यह समझने के लिए बुध्दि पर बहुत ज़ोर डालने की ज़रूरत नहीं है कि जब तक मज़दूर देश की राजनीतिक स्थिति को समझ न लें और सबकी भलाई के लिए काम करने को तैयार न हों, तब तक मज़दूरों का राजनीतिक उपयोग करना बहुत ही खतरनाक बात होगी? इस व्‍यवहार की उनसे अचानक आशा रखना कठिन है। यह आशा उस वक्‍त तक नहीं रखी जा सकती, जब तक वे अपनी खुद की हालत इतनी अच्‍छी न बना लें कि शरीर और आत्‍मा की ज़रूरतें पूरी करके सभ्‍य और शिष्‍ट जीवन व्‍यतीत कर सकें।

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अपनी स्थिति में सुधार करें मजदूर- महात्मा गांधी

सबसे बड़ी राजनीतिक सहायता मज़दूर यह कर सकते हैं कि वे अपनी स्थिति सुधार लें, अधिक जानकार हो जायें, अपने अधिकारों का आग्रह रखें और जिस माल के तैयार करने में उनका इतना महत्‍वपूर्ण हाथ होता है उसके उचित उपयोग की भी मालिकों से मांग करें। इसलिए मज़दूरों के लिए सही विकास यही होगा कि वे अपना दरज़ा बढ़ायें और आंशिक मालिको का दरजा प्राप्‍त करें। अत: अभी तो हड़तालें मज़दूरों की हालत के सीधे सुधार के लिए ही होनी चाहिये और जब उनमें देश-भक्ति की भावना पैदा हो जाय, तब अपने तैयार किये हुए माल की कीमतों के नियंत्रण के लिए भी हड़ताल की जा सकती है।

 

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हड़तालों के सफलता के प्रमुख कारक- महात्मा गांधी

1. हड़ताल का कारण न्‍यायपूर्ण होना चाहिये।
2. हड़तालियों में व्‍यावहारिक एकमत होना चाहिये।
3. हड़ताल न करने वालों के विरूध्‍द हिंसा काम में नहीं लेनी चाहिये।
4. हड़तालियों में यह शक्ति होनी चाहिये कि संघ के कोष का आश्रय लिये बिना वे हड़ताल के दिनों में अपना पालन-पोषण कर सकें। इसके लिए उन्‍हें किसी उपयोगी और उत्‍पादक अस्‍थायी धंधे में लगना चाहिये।
5. जब हड़तालियों की जगह लेने के लिए दूसरे मज़दूर काफी हों, तब हड़ताल का उपाय बेकार साबित होता है। उस सूरत में अन्‍यायपूर्ण व्‍यवहार हो, नाकाफी मज़दूरी मिले या ऐसा ही और कोई कारण हो, तो त्‍यागपत्र ही उसका एकमात्र उपाय है।
6. उपरोक्‍त सारी शर्ते पूरी न होने पर भी सफल हड़तालें हुई हैं। परन्‍तु इससे तो इतना ही सिध्‍द होता है कि मालिक कमजोर थे और उनका अन्‍त:करण अपराधी था।

 

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बिना वज़नदार कारण के हड़ताल होनी ही न चाहिये – महात्मा गांधी

बिना वज़नदार कारण के हड़ताल होनी ही न चाहिये। नाजायज़ हड़ताल को न तो कामयाबी हासिल होनी चाहिये और न ही किसी हालत में उसे आम जनता की हमदर्दी मिलनी चाहिये। आमतौर पर लोगों को यह मालूम ही नहीं हो सकता कि हड़ताल जायज़ है या नाजायज़, सिवा इसके कि हड़ताल का सर्मथन कोई ऐसे लोग करें, जो निष्‍पक्ष हों और जिन पर आम लोगों का पूरा विश्‍वास हो। हड़ताली खुद अपने मामले में राय देने के हकदार नहीं। इसलिए या तो मामला ऐसे पंच को सुपुर्द करना चाहिये, जो दोनों तरफ के लोगों को मंजूर हो, या उसे अदालती फैसले पर छोड़ना चाहिये।

 

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आम तौर पर जनता के सामने हड़ताल का मामला पेश करने की नौबत ही नहीं आती – महात्मा गांधी

जब इस तरीके से काम किया जाता है, तो आम तौर पर जनता के सामने हड़ताल का मामला पेश करने की नौबत ही नहीं आती। अलबत्‍ता, कभी-कभी यह ज़रूर होता है कि मग़रूर मालिक पंच के या अदालत के फैसले को ठुकरा देते हैं, या गुमराह मज़दूर अपनी ताकत के बल पर मालिक से ज़बरदस्‍ती और भी रियायतें पाने के लिए फैसले को मंजूर करने से इनकार कर देते हैं। ऐसी हालत में मामला आम जनता के सामने आता है।

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हड़तालियों को हड़तालों का नतीजा भुगतना पड़ता है- महात्मा गांधी

जो हड़ताल माली हालत की बेहतरी के लिए की जाती है, उसमें कभी अंतिम ध्‍येय के तौर पर राजनीतिक तरक्‍की कभी नहीं हो सकती। बल्कि होता यह है कि अक्‍सर हड़तालियों को ही इसका नतीजा भुगतना पड़ता है, चाहे उन हड़तालों का असर आम लोगों की जिन्‍दगी पर पड़े या न पड़े। सरकार के सामने कुछ दिक्‍कतें ज़रूर खड़ी हो सकती हैं, लेकिन उनकी वजह से हुकूमत का काम रूक नहीं सकता। अमीर लोग रूपया खर्च करके अपने डाक का बन्‍दोबस्‍त खुद कर लेगें, लेकिन असल मुसीबत तो गरीबी को झेनली पड़ती है। ऐसी हड़ताले तो तभी करना चाहियें, जब इन्‍साफ कराने के दूसरे सब उचित साधन असफल साबित हो चुके हो।

 

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राजनीतिक हड़तालों की अपनी अलग जगह है – महात्मा गांधी

राजनीतिक हड़तालों की अपनी अलग जगह है और उनकों आर्थिक हड़तालों के साथ न तो मिलाना चाहियें और न दोनों का आपस में कोई रिस्‍ता रखा जाना चाहिये। अहिंसक लड़ाई राजनीतिक हड़तालों की अपनी एक खास जगह होती हैं। वे चाहे जब और चाहे जैसे ढ़ंग से नहीं की जानी चाहियें। ऐसी हड़तालें बिल्‍कुल खुली हाेनी चाहियें और उनमें गुण्‍डाशाही की कोई गुंजाईस नहीं रहनी चाहियें। उनकी वजह से कही किसी तरह की हिंसा नही होनी चाहियें। (4)

 

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पूंजीपतियों को आम लोग अपना दुश्मन न मानें- महात्मा गांधी

मैं आम लोगों को यह नहीं सिखाता कि वे पूंजीपतियों को अपना दुश्‍मन मानें। मैं तो उन्‍हें यह सिखाता हूं कि वे आप ही अपने दुश्‍मन हैं। वर्गयुध्‍द भारत के मूल स्‍वभाव के खिलाफ है। भारत में समान न्‍याय और सबके बुनियादी हकों के विशाल आधार पर स्‍थापित एक उदार किस्‍म का साम्‍यवाद निर्माण करने की क्षमता है। मेरे सपने के रामराज्‍य में राजा और रंक सबके अधिकार सुरक्षित होंगे।

 

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मैंने यह कभी नहीं कहा कि शोषकों और शोषितों में सहयोग होना चाहिये – महात्मा गांधी

मैंने यह कभी नहीं कहा कि शोषकों और शोषितों में सहयोग होना चाहिये। जब तक शोषण और शोषण करने की इच्‍छा कायम है तब तक सहयोग नहीं हो सकता। अलबत्‍ता, मैं यह नहीं मानता कि सब पूंजीपति और ज़मीदार अपनी स्थिति की किसी आंतरिक आवश्‍यकता के फलस्‍वरूप शोषक ही हैं और न मैं यह मानता हूं कि उनके और जनता के हितों में कोई बुनियादी या अकाट्य विरोध हैं। हर प्रकार का शोषण शोषित के सहयोग पर आधारित है, फिर वह सहयोग स्‍वेच्‍छा से दिया जाता हो या लाचारी से। हम हम इस सच्‍चाई को स्‍वीकार करने से कितना ही इनकार क्‍यों न करें, फिर भी सच्‍चाई तो यही है कि यदि लोग शोषक की आज्ञा न मानें तो शोषण हो ही नहीं सकता। लेकिन उसमें स्‍वार्थ आड़े आता है और हम उन्‍हीं ज़ंजीरों को अपनी छाती से लगाये रहते हैं जो हमें बांधती हैं। यह चीज़ बन्‍द होना चाहिये। ज़रूरत इस बात की नहीं है कि पूंजीपति और ज़मींदार खतम हो जायें; उनमें और आम लोगों में आज जो सम्‍बन्‍ध है उसे बदलकर ज्‍यादा स्‍वस्‍थ और शुध्‍द सम्‍बन्‍ध बनाने की ज़रूरत है।

 

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वर्गयुध्‍द का विचार मुझे नहीं भाता – महात्मा गांधी

वर्गयुध्‍द का विचार मुझे नहीं भाता। भारत में वर्गयुध्‍द न स‍िर्फ अनिवार्य नहीं है, बल्कि यदि हम अहिंसा के सन्‍देश को समझ गये हैं तो उसे टाला जा सकता है। जो लोग वर्गयुध्‍द को अनिवार्य बताते हैं, उन्‍होंने या तो अहिंसा के फलितार्थों को समझा नहीं है, या ऊपरी तौर पर ही समझा है।

 

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हमें पश्चिम से आये हुए मोहक नारों के असर में आने से बचना चाहिये- महात्मा गांधी

हमें पश्चिम से आये हुए मोहक नारों के असर में आने से बचना चाहिये। क्‍या हमारे पास हमारी विशिष्‍ट पूर्वी परम्‍परा नहीं है? क्‍या हम और पूंजी के सवाल का कोई अपना हल नहीं निकाल सकते? वर्णाश्रम की व्‍यवस्‍था बड़े और छोटे का भेद दूर करने या पूंजी और श्रम में मेल साधने का एक उत्‍तम साधन नहीं तो और क्‍या है? इस विषय में सम्‍बन्धित जो कुछ भी पश्चिम से आया है वह हिंसा के रंग में रंगा हुआ है। मैं उसका विरोध करता हूं, क्‍योंकि मैंने उस नाश को देखा है जो इस मार्ग के आखिरी छोर पर हमारी प्रतीक्षा कर रहा है। पश्चिम के भी ज्‍यादा विचारवान लोग अब यह समझने लगे हैं कि उनकी व्‍यवस्‍था उन्‍हें एक गहरे गर्त की ओर ले जा रही है और वे उससे भयभीत हैं। पश्चिम में मेरा जो भी प्रभाव है उसका कारण हिंसा और शोषण के इस दुष्‍चक्र से उध्‍दार का रास्‍ता ढूंढ़ निकालने का मेरा अथक प्रयत्‍न ही है। मैं पश्चिम की समाज-व्‍यवस्‍था का सहानुभूतिशील विद्यार्थी रहा हूं और मैं इस निष्‍कर्ष पर पहुंचा हूं कि पश्चिम की इस बेचैनी और संघर्ष के पिछे सत्‍य की व्‍याकुल खोज की भावना ही है। मैं इस भावना की कीमत करता हूं। वैज्ञानिक जांच की उसी भावना से हम पूर्व की अपनी संस्‍थाओं का अध्‍ययन करें तो मेरा विश्‍वास है कि दुनिया ने अभी तक जिसका सपना देखा है उससे कहीं ज्‍यादा सच्‍चे समाजवाद और सच्‍चे साम्‍यवाद का हम विकास कर सकेंगे। यह मान लेना गलत है कि लोगों की गरीबी के सवाल पर पश्चिमी समाजवाद या साम्‍यवाद ही अन्तिम शब्‍द हैं। (3)

 

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मैं ज़मींदार का नाश नहीं करना चाहता – महात्मा गांधी

मैं ज़मींदार का नाश नहीं करना चाहता, लेकिन मुझे ऐसा भी नहीं लगता की ज़मींदार अनिवार्य है। मैं ज़मींदारो और दूसरे पूंजीपतियों का अहिंसा के द्वारा ह्दय-परिर्वतन करना चाहता हूं और इसलिए वर्गयुध्‍द की अनिवार्यता को मैं स्‍वीकार नहीं करता। कम-से-कम संघर्ष का रास्‍ता लेना मेरे लिए अहिंसा के प्रयोग का एक ज़रूरी हिस्‍सा है। ज़मीन पर मेहनत करने वाले किसान और मज़दूर ज्‍यों ही अपनी ताकत पहचान लेंगे, त्‍यों ही ज़मींदारी की बुराई का बुरापन दूर हो जायेगा। अगर वे लोग यह कह दें कि उन्‍हें सभ्‍य जीवन की आवश्‍यकताओं के अनुसार अपने बच्‍चों के भोजन, वस्‍त्र और शिक्षण आदि के लिए जब तक काफी मज़दूरी नहीं दी जायेगी, तब तक वे जमीन को जोतेंगे-बोयेंगे ही नहीं, तो ज़मींदार बेचारा कर ही क्‍या सकता है? सच तो यह है कि मेहनत करने वाला जो कुछ पैदा करता है उसका मालिक वही है। अगर मेहनत करने वाले बुध्दिपूर्वक एक हो जायं, तो वे एक ऐसी ताकत बन जायेंगे जिसका मुकाबला कोई नहीं कर सकता। और इसलिए मैं वर्गयुध्‍द की कोई ज़रूरत नहीं देखता। यदि मैं उसे अनिवार्य मानता होता तो उसका प्रचार करने में और लोगों को उसकी तालीम देने में मुझे कोई संकोच नहीं होता।

 

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मजदूर वर्ग को उसकी स्थिति के महत्व का ज्ञान कराना चाहिए- महात्मा गांधी

सवाल एक वर्ग को दूसरे वर्ग के खिलाफ भड़काने और भिड़वाने का नहीं है, बल्कि मज़दूर-वर्ग को अपनी स्थिति के महत्‍व का ज्ञान कराने का है। आखिर तो अमीरों की संख्‍या दुनिया में इनी-गिनी ही है। ज्‍यों ही मज़दूर-वर्ग को अपनी ताकत का भान होगा और अपनी ताकत जानते हुए भी वह ईमानदारी का व्‍यवहार करेगा, त्‍यों ही वे लोग भी ईमानदारी का व्‍यवहार करने लगेंगे। मज़दूरो को अमीरों के खिलाफ भड़काने का अर्थ वर्ग द्वेष को और उससे निकलने वाले तमाम बुरे नतीजों को जारी रखना होगा। संघर्ष एक दुष्‍चक्र है और उसे किसी भी कीमत पर टालना ही चाहिये। वह दुर्बलता की स्‍वीकृति का, हीनता-ग्रंथि का चिहृ है। श्रम ज्‍यों ही अपनी स्थिति का महत्‍व और गौरव पहचान लेगा, त्‍यों ही धन को अपना उचित दरजा मिल जायेगा, अर्थात् अमीर उसे अपने पास मज़दूरों की धरोहर के ही रूप में रखेंगे। कारण,श्रम धन से श्रेष्‍ठ है। भारत की हर चीज मुझे आकर्षित करती है। सर्वोच्च आकांक्षायें रखने वाल किसी व्यक्ति को अपने विकास के लिए जो कुछ चाहिये, वह सब उसे भारत में मिल सकता है।

 

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भारत अपने मूल स्वरूप में कर्मभूमि है, भोगभूमि नही- महात्मा गांधी

भारत अपने मूल स्वरूप में कर्मभूमि है, भोगभूमि नही। भारत दुनिया के उन इने-गिने देशों मे से है, जिन्होने अपनी अधिकांश पुरानी संस्थाओं को, यद्यपि उन अन्ध-विश्वास और भूल-भ्रांतियो की काई चढ़ गयी है, कायम रखा है। साथ ही वह अभी तक अन्ध-विश्वास और भूल-भ्रांतियों की इस काई को दूर करने की और इस तरह अपना शुद्ध रूप प्रकट करने की अपनी सहज क्षमता भी प्रकट करता है। उसके लाखों-करोड़ो निवासिंयों के सामने जो आर्थिक कठिनाइयां खडी है, उन्हे सुलझा सकने की उसकी योग्यता में मेरा विश्वास इतना उज्जवल कभी नही रहा जितना आज है।

 

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भारत का ध्येय दूसरे देशो के ध्येय से कुछ अलग है- महात्मा गांधी

मेरा विश्वास है कि भारत का ध्येय दूसरे देशो के ध्येय से कुछ अलग है। भारत में ऐसी योग्यता है कि वह धर्म के क्षेत्र में दुनिया में सबसे बडा हो सकता है। भारत ने आत्मशुद्धि के लिए स्वेच्छापूर्वक जैसा प्रयत्न किया है, उसका दुनिया में कोई दूसरा उदाहरण नही मिलता। भारत को फौलाद के हथियारों की उतनी आवश्यकता नही है; वह दैवी हथियारों से लड़ा है और आज भी वह उन्ही हथियारों से लड़ सकता है। दूसरे देश पशुबल के पूजारी रहे है। यूरोप में अभी जो भयंकर युद्ध चल रहा है, वह इस सत्य का एक प्रभावशाली उदाहरण है। भारत अपने आत्मबल से सबको जीत सकता है। इतिहास इस सच्चाई के चाहे जितने प्रमाण दे सकता है कि पशुबल आत्मबल की तुलना में कुछ नही है। कवियों ने इस बल की विजय के गीत गाये है और ऋषियों ने इस विषय में अपने अनुभवों का वर्णन करके उसकी पुष्टि की है।

 

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यदि भारत तलवार की नीति अपनाये, तो वह क्षणिक सी विजय पा सकता है – महात्मा गांधी

यदि भारत तलवार की नीति अपनाये, तो वह क्षणिक सी विजय पा सकता है। लेकिन तब भारत मेरे गर्व का विषय नही रहेगा। मैं भारत की भक्ति करता हूं, क्योंकि मेरे पास जो कुछ भी है वह सब उसी का दिया हुआ है। मेरा पूरा विश्वास है कि उसके पास सारी दुनिया के लिए एक संदेश है। उसे युरोप का आधुनिकरण नही करना है। भारत के द्वारा तलवार का स्वीकार मेरी कसौटी काी घडी होगी। मैं आशा करता हूं कि उस कसौटी पर मै खरा उतरूंगा। मेरा धर्म भौगोलिक सीमाओं से मर्यादित नही है। यदि उसमें मेरा जीवंत विश्वास है, तो वह मेरे भारत-प्रेम का भी अतिक्रमण कर जायेगा। मेरा जीवन अहिंसा-धर्म के पालन द्वारा भारत की सेवा के लिए समर्पित है।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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यदि भारत ने हिंसा का धर्म अपनाया तो मैं यहां नहीं रहूंगा- महात्मा गांधी

यदि भारत ने हिंसा को अपना धर्म स्वीकार कर लिया और यदि उस समय मैं जीवित रहा, तो मै भारत में नही रहना चाहुंगा। तब मेरे मन में गर्व की भावना उत्पन्न नही करेगा। मेरा देशप्रेम मेरे धर्म द्वारा नियंत्रित है। मै भारत से उसी तरह बंधा हुआ हूं, जिस तरह कोई बालक अपनी मां की छाती से चिपटा रहता है; क्योकि मै महसूस करता हूं कि वह मुझे विश्वास मेरा आवश्यक आध्यात्मिक पोषण देता है। उसके वातावरण से मुझे अपनी उच्चतम आकांक्षाओं की पुकार का उत्तर मिलता है। यदि किसी कारण मेरा यह विश्वास हिल जाय या चला जाय, तो मेरी दश्ज्ञा उस अनाथ के जैसी होगी जिसे अपना पालक पाने की आशा ही न रही हो।

 

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मै भारत को स्वतंत्र और बलवान बना हुआ देखना चाहता हूं – महात्मा गांधी

मै भारत को स्वतंत्र और बलवान बना हुआ देखना चाहता हूं, क्योकि मै चाहता हूं कि वह दुनिया के भले के लिए स्वेच्छापूर्वक अपनी पवित्र आहुति दे सके। भारत की स्वतंत्रता से शांति और युद्ध के बारे मे दुनिया की दृष्टि में जडमूल से क्रांति हो जायेगी। उसकी मौजूदा लाचारी और कमजोरी का सारी दुनिया पर बुरा असर पड़ता है।

 

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पश्चिम के पास बहुत कुछ ऐसा है, जिसे हम उससे ले सकते है – महात्मा गांधी

मै यह मानने जितना नम्र तो हूं ही कि पश्चिम के पास बहुत कुछ ऐसा है, जिसे हम उससे ले सकते है, पचा सकते है और लाभान्वित हो सकते है। ज्ञान किसी एक देश या जाति के एकाधिकार की वस्तु नही है। पाश्चात्य सभ्यता का मेरा विरोध असल में उस विचारहीन और विवेकहीन नकल का विरोध है, जो यह मानकर की जाती है कि एशिया-निवासी तो पश्चिम से आने वाली हरेक चीज की नकल करने जितनी ही योग्यता रखते है। …. मैं दृढ़तापूर्वक विश्वास करता हूं कि यदि भारत ने दुःख और तपस्या की आग में से गुजरने जितना धीरज दिखाया और अपनी सभ्यता पर- जो अपूर्ण होते हुए भी अभी तक काल के प्रभाव को झेल सकी है- किसी भी दिशा से कोई अनुचित आक्रमण न होने दिया, तो वह दुनिया की शांति और ठोस प्रगति में स्थायी योगदान कर सकती है।

 

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भारत का भविष्य पश्चिम के रक्त-रंजित मार्ग में नही है – महात्मा गांधी

भारत का भविष्य पश्चिम के उस रक्त-रंजित मार्ग पर नही है, जिस पर चलते-चलते पश्चिम अब खुद थक गया है; उसका भविष्य तो सरल धार्मिक जीवन द्वारा प्राप्त शांति के अहिंसक रास्ते पर चलने में ही है। भारत के सामने इस समय अपनी आत्मा को खोने का खतरा उपस्थित है। और यह संभव नही है कि अपनी आत्मा को खोकर भी वह जीवित रह सके। इसलिए आलसी की तरह उसे लाचारी प्रकट करते हुए ऐसा नही कहना चाहिये कि ‘‘ पश्चिम की इस बाढ़ से मै बच नही सकता।‘‘ अपनी और दुनिया की भलाई के लिए उस बाढ़ को रोकने योग्य शक्तिशाली तो उसे बनना ही होगा।

 

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यूरोपीय सभ्यता की नकल की कोशिश की तो भारत का नाश हो जायेगा- महात्मा गांधी

यूरोपिय सभ्यता बेशक यूरोप के निवासीयों के लिए अनुकुल है; लेकिन यदि हमने उसकी नकल करने की कोशिश की तो भारत के लिए उसका अर्थ अपना नाश कर लेना होगा। इसका यह मतलब नही कि उसमें जो कुछ अच्छा और पचा सकें ऐसा हो, उसे हम लें नही या पचाये नही। इसी तरह उसका यह मतलब भी नही कि उस सभ्यता में जो दोष घुस गये है, उन्हे यूरोप के लोगोको दूर नही करना पडेगा। शारीरिक सुख-सुविधाओं की सतत खोज और उनकी संख्या में तेजी से हो रही वृध्दि ऐसा ही एक दोष है; और मै साहसपूर्वक यह घोषणा करता हूं कि जिन सुख-सुविधाओं के हम गुंलाम बनते जा रहे है उनके बोझ से यदि उन्हे कुचल नही जाना है, तो युरोपीय लोगो को अपना दृष्टिकोण बदलना पडेगा। संभव है मेरा यह निष्कर्ष गलत हो, लेकिन यह मै निश्चयपूर्वक जानता हूं कि भारत के लिए स सुनहरे मायामृग के पीछे दौडने का अर्थ आत्मनाश के सिवा और कुछ न होगा। हमे अपने हृदयों पर एक पाश्यात्य तत्ववेत्ता का यह बोधवाक्य अंकित कर लेना चाहिये – ‘सादा जीवन और उच्च चित्तन‘। आज तो यह निश्चित है कि हमारे लाखों-करोडों लोगो के लिए सुख-सुविधाओं वाला उच्च जीवन संभव नही है और हम मुट्ठीभर लोग, जो सामान्य जनता के लिए चिंतन करने का दावा करते है, सुख-सुविधाओं वाले उच्च जीवन की निरर्थक खोज में उच्च चिंतन को खोने की उठा रहे है।

 

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मै ऐसे संविधान की रचना करवाने का प्रयत्न करूंगा, जो भारत को हर तरह की गुलामी और परावलम्बन से मुक्त कर दे – महात्मा गांधी

मै ऐसे संविधान की रचना करवाने का प्रयत्न करूंगा, जो भारत को हर तरह की गुलामी और परावलम्बन से मुक्त कर दे और उसे, आवश्यकता होत तो पाप करने तक का अधिकार दे। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमे गरीब-से-गरीब लोग भी यह महसूस करेंगे कि यह उनका देश है- जिसके निमार्ण में उनकी आवाज का महत्तव है। मैं ऐसे भारत के लिए कोशिश करूंगा, जिसमे ऊंचे और नीचे वर्गो का भेद नही होगा और जिसमें विविध सम्प्रदायों में पूरा मेलजोल होगा। ऐसे भारत में अस्पृश्यता के या शराब और दूसरी नशीली चीजों के अभिशाप के लिए कोई स्थान नही हो सकता। उसमें स्त्रियों को वही अधिकार हो्रगे जो पुरूषो को होेगे। चुंकि शेष सारी दुनिया के साथ हमारा संबंध शांति का होगा, यानी न तो हम किसी का शोषण करेंगे और न किसी के द्वारा अपना शोषण होने देंगे, इसलिए हमारी सेना छोटी-से-छोटी होगी। ऐसे सब हितो का, जिनका करोडों मूक लोगो के हितो से कोई विरोध नही है, पूरा सम्मान किया जायेगा, फिर वे हित देशी हों या विदेशी। अपने लिए तो मै यहभी कह सकता हूं कि मै देशी और विदेशी के फर्क से नफरत करता हूं। यचह है मेरे सपनों का भारत। इससे भिन्न किसी चीज से मुझे संतोष नही होगा।

 

 

 

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