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the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

Some Questions of Mahatma Gandhi in Hindi-XIII

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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दुनिया में भौतिक समृद्धि चाहने वाले पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है- महात्मा गांधी

दुनिया में ऐसे विवेकी पुरूषों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है, जो इस सभ्‍यता को-जिसके एक छोर पर तो भौतिक समृद्धि की कभी तृप्‍त न होने वाली आकांक्षा है और दूसरे छोर पर उसके फलस्‍वरूप पैदा होन वाला युद्ध है-अविश्‍वास की निगाह से देखते हैं । लेकिन यह सभ्‍यता अच्‍छी हो या बुरी, भारत का पश्चिम जैसा उद्योगीकरण करने की क्‍या जरूरत है ? पश्चिमी सभ्‍यता शहरी सभ्‍यता है । इग्‍लैंड और इटली जैसे छोटे देश अपनी व्‍यवस्‍थाओं का शहरीकरण कर सकते हैं । अमेरिका बड़ा देश है, किन्‍तु उसकी आबादी बहुत विरल है । इसलिए उसे भी शायद वैसा ही करना पड़ेगा । लेकिन कोई भी आदमी यदि सोचेगा तो यह मानेगा कि भारत जैसे बड़े देश को, जिसकी आबादी बहुत ज्‍यादा बड़ी है और ग्राम-जीवन की ऐसी पुरानी परम्‍परा में पोषित हुई है जो उसकी आवश्‍कताओं को बराबर पूरा करती आयी है, पश्चिमी नमूने की नकल करने की कोई जरूरत नहीं है और न ही उसे ऐसी नकल करनी चाहिये । विशेष परिस्‍थ‍ितियों वाले किसी एक देश के लिए जो बात अच्‍छी है वह भिन्‍न परिस्‍थतियों वाले किसी दूसरे देश के लिए भी अच्‍छी ही हो, यह जरूरी नहीं हैं । जो चीज किसी एक आदमी के लिए पोषक का काम देती हो, वही दूसरे के लिए जहर जैसी सिद्ध होती है । किसी देश की संस्‍कृति को निर्धारित करने में उसके प्राकृतिक भूगोल का प्रमुख हिस्‍सा होता है । ध्रुव-प्रदेश के निवासी के लिए ऊनी कोट जरूरी हो सकता है़, लेकिन भूमध्‍य-रेखावर्ती प्रदेशों के निवासियों का तो उससे दम ही घुट जायेगा ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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बड़े पैमाने पर होने वाला सामूहिक उत्‍पादन ही दुनिया की मौजूदा संकटमय स्थिति के लिए जिम्‍मेदार है – महात्मा गांधी

मेरा स्‍पष्‍ट मत है और मैं उसे साफ-साफ कहता हूं कि बड़े पैमाने पर होने वाला सामूहिक उत्‍पादन ही दुनिया की मौजूदा संकटमय स्थिति के लिए जिम्‍मेदार है । एक क्षण के लिए मान भी लिया जाय कि यंत्र मानव-समाज की सारी आवश्‍यकताओं पूरी कर सकते हैं, तो भी उसका यह परिणाम तो होगा ही कि उत्‍पादन कुछ विशिष्‍ट क्षेत्रों में केन्द्रित हो जायेगा और इसलिए वितरण की योजना के लिए हमें द्राविड़ी प्राणायाम करना पड़ेगा । दूसरी ओर यदि जिन क्षेत्रों में वस्‍तुओं की आवश्‍यकता है वहीं उनका उत्‍पादन हो और वहीं वितरण हो, तो वितरण की नियंत्रण अपने-आप हो जाता है । उसमें धोखाधड़ी के लिए कम गुंजाइश होती है और सट्टे के लिए तो बिल्‍कुल नहीं ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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सशक्‍त राष्ट्र कमजोर और असंगठित जातियों का शोषण करते हैं- महात्मा गांधी

यह तो आप देखते ही है कि ये राष्‍ट्र (यूरोप और अमेरिका) दुनिया की तथाकथित कमजोर या असंगठित जातियों का शोषण करते हैं । यदि एक बार इन जातियों को इस चीज का प्राथमिकत ज्ञान हो जाय और वे इस बात का निश्‍चय कर लें कि अब अपना शोषण नहीं होने देंगी, तो फिर वे जो कुछ खुद पैदा कर सकती हैं उतने से ही संतोष कर लेगीं, ऐसा हो तो जहां तक मुख्‍य आवश्‍यकताओं का सम्‍बन्‍ध है सामूहिक उत्‍पादन मिट जायेगा ।

 

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सीमित उपभोग से मूल्य वृद्धि नहीं होती- महात्मा गांधी

जब उत्‍पादन और उपभोग दोनों किसी सीमित क्षेत्र में होते हैं, तो उत्‍पादन को अनश्चित हद तक और किसी भी मूल्‍य पर बढ़ाने का लोभ फिर नहीं रह जाता । उस हालत में हमारी मौजूदा अर्थ-व्‍यवस्‍था से जो कठिनाइयां और समस्‍यायें पैदा होती हैं वे भी नहीं रह जायेंगी ।

 

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घर में चलाने लायक यंत्रों में सुधार किये जायं, तो मैं उसका स्‍वागत करूंगा – महात्मा गांधी

यंत्रों का भी स्‍थान है । और यंत्रों ने अपना स्‍‍थान प्राप्‍त भी कर लिया हैं । लेकिन मनुष्‍यों के लिए जिस प्रकार की मेहनत करना अनिवार्य होना चाहिये, उसी प्रकार की मेहनत का स्‍थान उन्‍हें ग्रहण न कर लेना चाहिये । घर में चलाने लायक यंत्रों में सुधार किये जायं, तो मैं उसका स्‍वागत करूंगा । लेकिन मैं यह भी समझता हूं कि जब तक लाखों किसानों को उनके घर में कोई दूसरा धंधा करने के लिए न दिया जाय, तब तक हाथ-मेहनत से चरखा चलाने के बदले किसी दूसरी शक्ति से कपड़े का कारखाना चलाना गुनाह है ।

 

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यंत्रों की ऊपरी विजय से चमत्‍कृत होने से मैं इनकार करता हूं – महात्मा गांधी

यंत्रों की ऊपरी विजय से चमत्‍कृत होने से मैं इनकार करता हूं । और मारक यंत्रों के में एकदम खिलाफ हूं; उसमें मैं किसी तरह का समझौता स्‍वीकार नहीं कर सकता । लेकिन ऐसे सादे औजारों, साधनों या यंत्रों का, जो व्‍यक्ति की मेहनत को बचायें और झोंपडि़यों में रहने वाले लाखों-करोड़ों लोगों का बोझ कम करें, मैं जरूर स्‍वागत करूंगा ।

 

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हिन्दुस्तान में यंत्रों की प्रतिद्वंदिता नहीं करनी चाहिए- महात्मा गांधी

हिन्‍दुस्‍तान के सात लाख गांवों में फैले हुए ग्रामवासी-रूपर करोड़ों जीवित यंत्रों के विरूद्ध इन जड़ यंत्रों को प्रतिद्वंद्विता में नहीं लाना चाहिये । यंत्रों का सदुपयोग तो यह कहा जायेगा कि उससे मनुष्‍य के प्रयत्‍न को सहारा मिले और उसे वह आसान बना दे । यंत्रों के मौजूदा उपयोग का झुकाव तो इस ओर ही बढ़ता जा रहा है कि कुछ इने-गिने लोगों के हाथ में खूब संपत्ति पहुंचाई जाय और भी परवाह न की जाय ।

 

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ज्‍यों-ज्‍यों प्रतिस्‍पर्धा और बाजार की समस्‍यायें खड़ी होगी त्‍यों-त्‍यों गांवों का प्रगट या अप्रगट शोषण होगा – महात्मा गांधी

बड़े पैमाने पर उद्योगीकरण का अनिवार्य परिणाम यह होगा कि ज्‍यों-ज्‍यों प्रतिस्‍पर्धा और बाजार की समस्‍यायें खड़ी होगी त्‍यों-त्‍यों गांवों का प्रगट या अप्रगट शोषण होगा । इसलिए हमें अपनी सारी शक्ति इसी प्रयन्‍त पर केन्द्रित करनी चाहिये कि गांव स्‍वयं पूर्ण बनें और वस्‍तुओं का निर्माण और उत्‍पादन तो‍ फिर गांव वाले ऐसे आधुनिक यंत्रों और औजारों का, जिन्‍हें वे बना सकते हों और जिनका उपयोग उन्‍हें आर्थिक दृष्टि से पुसा सकता हो, उपयोग खुशी से करें । उस पर आपत्ति नहीं की जा सकती । अलबत्‍ता, उनका उपयोग दूसरों का शोषण करने के लिए नहीं होना चाहिये ।

 

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मैं नहीं मानता कि उद्योगीकरण हर हालत में किसी भी देश के लिए जरूरी ही है – महात्मा गांधी

मैं नहीं मानता कि उद्योगीकरण हर हालत में किसी भी देश के लिए जरूरी ही है । भारत के लिए तो वह उससे भी कम जरूरी है । मेरा विश्‍वास है कि आजाद भारत दु:ख से कराहती हुई दुनिया के प्रति अपने कर्तव्‍य का ऋण अपने गांवों का विकास करके और दुनिया के साथ मित्रता का व्‍यवहार करके और इस तरह सादा परन्‍तु उदात्‍त जीवन अपनाकर ही चुका सकता है । धन की पूजा ने है, उसके साथ ‘उच्‍च चिन्‍तन’ का मेल नहीं बैठता । जीवन का सम्‍पूर्ण सौन्‍दर्य तभी खिल सकता है जब हम उच्‍च कोटि का जीवन जीना सीखें ।

 

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खतरों वाला जीवन जीने रोमांच और उत्‍तेजना का अनुभव हो सकता है – महात्मा गांधी

खतरों वाला जीवन जीने रोमांच और उत्‍तेजना का अनुभव हो सकता है । पर खतरों का सामना करने हुए जीने में और खतरों वाला जीवन जीने में भेद है । जो आदमी जंगली जानवरों से और उनसे भी ज्‍यादा जंगली आदमियों से भरपूर जंगल में अकेले, बिना बन्‍दूक के और केवल ईश्‍वर के सहारे रहने की हिम्‍मत हवा में उड़ता हुआ रहता है और टकटकी लगाकर देखने वाले दर्शक-समुदाय की वाहवाही लूटने के खयाल से नीचे की ओर उड़ी लगाता है; वह खतरों वाला जीता है । पहले आदमी का जीवन लक्ष्‍यपूर्ण है, दूसरे का लक्ष्‍यहीन ।

 

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यदि सादा जीवन जीने योग्य है तो उसे अवश्य अपनाना चाहिए- महात्मा गांधी

किसी अलग-अलग रहने वाले देश के लिए, भले वह भूविस्‍तार और जनसंख्‍या की दृष्टि से कितना भी बड़ा क्‍यों न हो, ऐसी दुनिया में जो शस्‍त्रास्‍त्रों से सिर से पांव तक लदी है और जिसमें सर्वत्र वैभव-विलास का ही वातावरण नजर आता है, ऐसा सादा जीवन जीना सम्‍भव है या नहीं-यह ऐसा सवाल है जिसमें संशयशील आदमी को अवश्‍य संन्‍देह होगा । लेकिन इसका उत्‍तर सीधा है । यदि सादा जीवन जीने योग्‍य है तो यह प्रयन्‍त भी करने योग्‍य है, चाहे वह प्रयन्‍त किसी एक ही व्‍यक्ति या किसी एक ही समुदाय द्वारा उद्योग जरूर होने चाहिये । आराम-कुर्सी वाले या हिंसा वाले समाजवाद में मेरा विश्‍वास नहीं है । मैं तो अपने विश्‍वास के अनुसार आचरण करने में मानता हूं और उसके लिए सब लोग मेरी बात मान लें तब तक ठहरना अनावश्‍यक समझता हूं । इसलिए इन प्रमुख्‍ा उद्योगों को गिनाये बिना ही मैं कह देता हूं कि जहां कहीं भी लोगों को काफी बड़ी संख्‍या में मिलकर काम करना पड़ता है वहां मैं राज्‍य की मालिकी की हिमायत करूंगा । उनकी कुशल या अकुशल मेहनत से जो कुछ उत्‍पन्‍न होगा, उसकी मालिकी राज्‍य के द्वारा उनकी ही होगी । लेकिन चूंकि मैं तो इस राज्‍य के अहिंसा पर ही आधारित होने की कल्‍पना कर सकता हूं, इसलिए मैं अमीरों से उनकी सम्‍पत्ति बलपूर्वक नहीं छीनूंगा, बल्कि उक्‍त उद्योगों पर राज्‍य की मालिकी कायम करने की प्रक्रिया में उनका सहयोग मागूंगा । अमीर हों या कंगाल, समाज में कोई भी अछूत या पतित नहीं हैं । अमीर और गरीब दोनों एक ही रोग के दा रूप हैं । और सत्‍य यह है कि कोई कैसा भी हो, हैं तो सब मनुष्‍य ही। और मैं अपना यह विश्‍वास उन सारी बर्बरताओं के बावजूद घोषित करना हूं, जो हमने भारत मे और दूसरे देशों में घटित होते देखी हैं और जिन्‍हें शायद हमें आगे और भी देखना पड़े । हम खतरों का सामना करते हुए जीना सीखें ।

 

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मुझे स्‍वीकार करना चाहिये कि बोलशेविज्‍म शब्‍द का अर्थ मैं अभी तक पूरा-पूरा नहीं समझा हूं – महात्मा गांधी

मुझे स्‍वीकार करना चाहिये कि बोलशेविज्‍म शब्‍द का अर्थ मैं अभी तक पूरा-पूरा नहीं समझा हूं। मैं इतना ही जानता हूं कि उसका उदे्श्‍य निजी सम्‍पत्ति की संस्‍था को मिटाना है। यह तो अपरिग्रह के नैतिक आदर्श को अर्थ क्षेत्र में प्रयुक्‍त करना हुआ; और यदि लोग इस आदर्श को स्‍वेच्‍छा से स्‍वीकार कर लें या उन्‍हें शांतिपूर्वक समझाया जाय और उसके फलस्‍वरूप वे उसे स्‍वीकार कर लें, तो इससे अच्‍छा कुछ हो ही नहीं सकता । लेकिन बोलेशेविज्‍म के बारे में मुझे जो कुछ जानने को मिला है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वह न केवल हिंसा के प्रयोग का समर्थन करता है, बल्कि निजी सम्‍पति के अपहरण के लिए और उसे राज्‍य के स्‍वामित्‍व के अधीन बनाये रखने के लिए हिंसा के प्रयोग की खुली छूट देता है । और यदि ऐसा है तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बोलशेविक शासन अपने मौजूदा रूप में ज्‍यादा दिन तक नहीं टिक सकता । कारण, मेरा दृढ. विश्‍वास है कि हिंसा की नींव पर किसी भी स्‍थायी रचना का निर्माण नहीं हो सकता । लेकिन, वह जो भी हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि बोलशेविक आदर्श के पीछे असंख्‍य पूरू षों और स्त्रियों के-जिन्‍होंने उसकी सिद्धि के लिए अपना सर्वस्‍व अर्पण कर दिया है-शुद्धतम त्‍याग का बल है; और एक ऐसा आदर्श, जिसके पीछे लेकिन जैसे महापुरूषों के त्‍याग का बल है, कभी व्‍यर्थ नहीं जा सकता । उनके त्‍याग का उज्‍जवल उदाहरण चिरकाल तक जीवित रहेगा और समय ज्‍यों-ज्‍यों बीतेगा त्‍यों-त्‍यों वह उस आदर्श को अधिकाधिक शुद्धि और वेग प्रदान करता रहेगा ।

 

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समाजवाद और साम्‍यवाद आदि पश्चिम के सिद्धांत हमारे तत्‍सम्‍बंधी विचारों से बुनियादी तौर पर भिन्‍न हैं – महात्मा गांधी

समाजवाद और साम्‍यवाद आदि पश्चिम के सिद्धांत जिन विचारों पर आधारित हैं वे हमारे तत्‍सम्‍बंधी विचारों से बुनियादी तौर पर भिन्‍न हैं । ऐसा एक विचार उनका यह विश्‍वास है कि मनुष्‍य-स्‍वभाव में मूलगामी स्‍वार्थ-भावना है। मैं इस विचार को स्‍वीकार नहीं करता; क्‍योंक मैं जानता हूं कि मनुष्‍य और पशु में यह बुनियादी फर्क है कि मनुष्‍य अपनी अंतर्हित आत्‍मा की पुकार का उत्‍तर दे सकता है, उन विकारों के ऊपर उठ सकता है जो उसमें और पशुओं में सामान्‍य रूप से पाये जाते है और इसलिए वह स्‍वार्थ-भावना और हिंसा के भी ऊपर उठ सकता है । क्‍योंकि स्‍वार्थ-भावना और हिंसा पशु-स्‍व‍भाव के अंग हैं, मनुष्‍य में अंतर्हित उसकी अमर आत्‍मा के नहीं । यह हिन्‍दू धर्म का एक बुनियादी विचार है और इस सत्‍य की शोध के पीछे कितने ही तपस्वियों की अनेक वर्षो की तपस्‍या और साधना है । यही कारण है कि हमारे यहां ऐसे संत और महात्‍मा तो हुए है, जिन्‍होने आत्‍मा के गूढ. रहस्‍यों की शोध में अपना शरीर घिसा है और अपने प्राण दिये है; परन्‍तु पश्चिम की तरह हमारे यहां ऐसे लोग नहीं हुए, जिन्‍होंने पृथ्‍वी के सुदूरतम कोनो या ऊंची चोटियों की खोज में अपने प्राणों की बलिदान किया हो । इसलिए हमारे समाजवाद या साम्‍यवाद की रचना अहिंसा के आधार पर और मजदूरों तथ‍ा पूंजीपतयों या जमींदारों तथा किसानों के मीठे सहयोग के आधार पर होनी चाहियें ।

 

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साम्यवाद का अर्थ है वर्गहीन समाज- महात्मा गांधी

साम्‍यवाद के अर्थ की छानबीन की जाय तो अन्‍त में हम इसी निश्‍चय पर पहुंचते हैं कि उसका मतलब हैं-वर्गहीन समाज । यह बेशक उत्‍तम आदर्श है और इसके लिए अवश्‍य कोशिश होनी चाहिये । लेकिन जब इस आदर्श को हासिल करने के लिए वह हिंसा का प्रयोग करने की बात करने लगता है, तब मेरा रास्‍ता उससे अलग हो जाता है । हम सब जन्‍म से समान ही हैं, लेकिन हम हमेशा से भगवान की इस इच्‍छा की अवज्ञा करते आये हैं । असमानता की या ऊंच-नीच की भावना एक बुराई है, किन्‍तु मैं इस बुराई को मनुष्‍य के मन से, उसे तलवार दिखाकर, निकाल भगाने में विशवास नहीं करता । मनुष्‍य के मन की शुद्धि के लिए यह कोई कारगर साधन नहीं है ।

 

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रूस का साम्यवाद भारत के लिए अनुपयोगी- महात्मा गांधी

रूस का समाजवाद, यानी जनता पर जबरदस्‍ती लादा जाने वाला साम्‍यवाद, भारत को रूचेगा नहीं; भारत की प्रकृति के साथ उसका मेल नहीं बैठ सकता । हां यदि साम्‍यवाद बिना किसी हिंसा के आये तो हम उसका स्‍वागत करेगें । क्‍योंकि तब कोई मनुष्‍य किसी भी तरह की सम्‍पत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्‍यथा नहीं । करोड.पति के पास उसके करोड. रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्‍हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा और सर्व-सामाम्‍य प्रयोजन के लिए आवश्‍यकता होने पर इस सम्‍पत्ति को राज्‍य अपने अधिकार में ले सकेगा ।

 

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मैं अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा- महात्मा गांधी

साम्‍यवादियों और समाजवादियों का कहना है कि आज वे आर्थिके समानता को जन्‍म देने के लिए कुछ नहीं कर सकते । वे उसके लिए प्रचार भर कर सकते है । इसके लिए लोगों में द्वेष या वैर पैदा करने और उसे बढा़ने में उनका विश्‍वास है ! उनका कहना है कि राज्‍यसत्‍ता पाने पर वे लोगों से समानता के सिद्धान्‍त पर अमल करवयेगें । मेरी योजना के अनुसार राज्‍य प्रजा की इच्‍छा को पूरा करेगा, न कि लोगों को हुक्‍म देगा या अपनी आज्ञा जबरन उन पर लादेगर । मैं घृणा से नहीं, बल्कि परन्‍तु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा । मैं सारे समाज को अपने मत का बनाने तक रूकूंगा नहीं, बल्कि मैं 50 मोटरों का तो क्‍या, 10 बीघा जमीन का भी मालिक हूं, तो अपनी कल्‍पना की आर्थिक समानता को जन्‍म नहीं दे सकता । उसके लिए मुझे गरीब बन जाना होगा । यही मैं पिछले 50 सालों से या उससे भी ज्‍यादा वक्‍त से करता आया हूं ।

 

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मैं पक्‍का कम्‍युनिस्‍ट होने का दावा करता हूं – महात्मा गांधी

इसीलिए मैं पक्‍का कम्‍युनिस्‍ट होने का दावा करता हूं । अगरचे मैं धनवानों द्वारा दी गई मोटरों या दूसरे सुभीतों से फायदा उठाता हूं, मगर मैं उनके वश में नहीं हूं । अगर आम जनता के हितों का वैसा तकाजा हुआ, तो बात की बात में मैं उनको अपने से दूर हटा सकता हूं ।

 

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हममें विदेशों दान के बजाय धरती जो कुछ पैदा करती हो उस पर ही अपना निर्वाह कर सकने की योग्‍यता और साहस होना चाहिये – महात्मा गांधी

हममें विदेशों दान के बजाय हमारी धरती जो कुछ पैदा करती कर सकती हो उस पर ही अपना निर्वाह कर सकने की योग्‍यता और साहस होना चाहिये । अन्‍यथा हम एक स्‍वतंत्र देश की तरह रहने के हकदार न होंगे । यही बात विदेशी विचारधाराओं के लिए भी लागू होती है । मैं उन्‍हें उसी हद तक स्‍वीकार करूंगा जिस हद तक मैं उन्‍हें हजम कर सकता हूं और उनमें परिस्थितियों के अनुरूप फर्क कर सकता हूं । लेकिन मैं उनमें बह जाने से इनकार करूंगा ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

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हमने वैज्ञानिक समाजवाद की भावना भुला दी है- महात्मा गांधी

पूंजीपतियों द्वारा पूंजी के दुरूपयोग की बात लोगों के ध्यान में आयी, तब समाजवाद का जन्म हुआ यह ख्याल गलत है। जैसा कि मैंने पहले भी प्रतिपादित किया है समाजवाद, और उसी तरह साम्यवाद भी, ईशोपनिषद् के पहले श्लोक में स्पष्ट रूप से मिल जाता है। हां, यह बात सही है कि जब कुछ सुधारकों ने हृदय -परिवर्तन की क्रिया द्वारा आदर्श सिद्ध करने की प्रणाली में विश्वास खो दिया, तब जिसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है उसकी पद्धति ढूंढ़ी गयी। मैं उसी समस्या को हल करने में लगा हुआ हूं, जो वैज्ञानिक समाजवादियों के सामने है। अलबत्ता, काम का मेरा ढंग शुद्ध अहिंसा के अनुसार प्रयत्न करने का है। यह हो सकता है कि मैं इस सिद्धांत का, जिसमें मेरा विश्वास प्रतिदिन बढ़ रहा है, अच्छा व्याख्याता न होऊं। अखिल भारत चरखा-संघ और अखिल भारत ग्रामोद्योग-संघ ऐसी संस्थायें हैं, जिनके द्वारा अहिंसा की कार्य-पद्धति का अखिल भारतीय पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। वे कांग्रेस के द्वारा बनायी ऐसी स्वतंत्र संस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य कांगे्रस जैसी लोकतांत्रिक संस्था की नीति में हमेशा जिन परिवर्तनों के होने की संभावना है उन परिवर्तनों से बंधे बिना मुझे अपने प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार करते रहने का मौका देना है।

 

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सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ है – महात्मा गांधी

सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ है, जो हमें यह सिखा गये हैं कि ‘सब भूमि गोपाल की है, इसमें कहीं मेरी और तेरी की सीमायें नहीं है। ये सीमायें तो आदमियों ने बनायी हैं और इसलिए वे इन्हें तोड़ भी सकते हैं। गोपाल यानी कृष्ण यानी भगवान। आधुनिक भाषा मंे गोपाल यानी राज्य यानी जनता। आज ज़मीन जनता की नहीं है, यह बात सही है। पर इसमें दोष उस शिक्षा का नहीं है। दोष तो हमारा है जिन्होंने उस शिक्षा के अनुसार आचरण नहीं किया। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि इस आदर्श को जिस हद तक रूस या और कोई देश पहुंच सकता है उसी हद तक हम भी पहुंच सकते हैं, और वह भी हिंसा का आश्रय लिये बिना। पंूजीवालों से उनकी पंूजी हिंसापूर्वक छीनी जाय, इसके बजाय यदि चरखा और उसके सारे फलितार्थ स्वीकार कर लिये जायेें तो वही काम हो सकता है। चरखा हिंसक अपहरण की जगह ले सकने वाला अत्यंत प्रभावकारी साधन है। जमीन और दूसरी सारी संपत्ति उसकी है, जो उसके लिए काम करे। दुःख इस बात का है कि किसान और मजदूर या तो इस सरल सत्य को जानते नहीं है, या यों कहो कि उन्हें इसे जानने नहीं दिया गया है।2

 

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कमजोर-से-कमजोर के प्रति हम जोर-जबरदस्ती से सामाजिक न्याय का पालन नहीं कर सकते – महात्मा गांधी

मैं सदा से यह मानता आया हूं कि नीचे-से-नीचे और कमजोर-से-कमजोर के प्रति हम जोर-जबरदस्ती से सामाजिक न्याय का पालन नहीं कर सकते। मैं यह भी मानता आया हूं कि पतित-से-पतित लोगों को भी मुनासिब तामील दी जाये, तो अहिंसक साधनों द्वारा सब प्रकार के अत्याचारों का प्रतिकार किया जा सकता है। अहिंसक असहयोग ही उसका मुख्य साधन है। कभी-कभी असहयोग भी उतना ही कर्तव्य-रूप हो जाता है जितना कि सहयोग। अपनी विफलता या गुलामी मे खुद सहायक होने के लिए कोई बंधा हुआ नही है। जो स्वतंत्रता दूसरांे के प्रयत्नों द्वारा-फिर वे कितने ही उदार क्यों न हों-मिलती है, वह उन प्रयत्नों के न रहने पर कायम नहीं रखी जा सकती। दूसरे शब्दों में, ऐसी स्वतंत्रता सच्ची स्वतंत्रता नहीं है। लेकिन जब पतित-से-पतित भी अहिंसक अहसहयोग द्वाा अपनी स्वतंत्रता प्राप्त करने की कला सीख लेते हैं, तो वे उसके प्रकाश का अनुभव किये बिना नहीं रह सकते।

 

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जिस चीज को हिंसा कभी नहीं कर सकती, वहीं अहिंसात्मक असहयोग द्वारा सिद्ध की जा सकती है – महात्मा गांधी

मेरा यह पक्का विश्वास है कि जिस चीज को हिंसा कभी नहीं कर सकती, वहीं अहिंसात्मक असहयोग द्वारा सिद्ध की जा सकती है। और अंत में जाकर उससे अत्याचारियों का हृदय-परिवर्तन भी हो सकता है। हमने हिंदुस्तान में अहिंसा को उसके अनुरूप मौका अभी तक दिया ही नहीं। फिर भी आश्चर्य है कि अपनी इस मिलावतटी अहिंसा द्वारा भी म इतनी शक्ति प्राप्त कर सके है।।

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प्रतिष्ठित जीवन के लिए जितनी जमीन की आवश्यकता है, उससे अधिक किसी आदमी के पास नहीं होनी चाहिये – महात्मा गांधी

प्रतिष्ठित जीवन के लिए जितनी जमीन की आवश्यकता है, उससे अधिक किसी आदमी के पास नहीं होनी चाहिये। ऐसा कौन है जो इस हकीकत से इनकार कर सके कि आम जनता की घोर गरीबी का कारण आज यही है कि उसके पास उसकी अपनी कही जाने वाली कोई जमीन नहीं है।

 

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सुधार तुरंत नहीं किये जा सकते – महात्मा गांधी

सुधार तुरंत नहीं किये जा सकते। अगर ये सुधार अहिंसात्मक तरीकों से करने हैं, तो जमींदारों और गैर जमीदारों दोनों को सुशिक्षित बनाना लाजिमी हो जाता है। जमींदारों को यह विश्वास दिलाना होगा कि उनके साथ कभी जोर-जबरदस्ती नहीं की जायेगी, और गैर जमींदारों को यह सिखाना और समझाना होगा कि उनसे उनकी मरजी के खिलाफ जबरन कोई काम नहीं ले सकता, और यह कि कष्ट-सहने या अंिहंसा की कला को सीखकर वे अपनी स्वतंत्रता प्राप्त कर सकते है। अगर इस लक्ष्य को हमें प्राप्त करना है, तो ऊपर मैंने जिस शिक्षा का जिक्र किया है उसका आरंभ अभी से हो जाना चाहिये। इसके लिए पहली जरूरत ऐसा वातावरण तैयार करने की है, जिसमें पारस्परिक आदर और सद्भाव का सुमेल हो। उस अवस्था में वर्गों और आम के बीच किसी प्रकार का हिंसात्मक संघर्ष हो ही नहीं सकता।4

 

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समाजवाद में समाज के सारे सदस्य बराबर होते हैं – महात्मा गांधी

समाजवाद एक सुदंर शब्द है। जहां तक मैं जानता हूं, समाजवाद में समाज के सारे सदस्य बराबर होते हैं, न कोई नीचा और न कोई ऊंचा। किसी आदमी के शरीर में सिर इसलिए ऊंचा नहीं है कि वह सबसे ऊपर है और पांव के तलुवे इसलिए नीचे नहीं है कि वे जमीन को छूते है। जिस तरह मनुष्य के शरीर के सारे अंग बराबर है, उसी तरह समाजरूपी शरीर के सारे अंग भी बराबर हैं। यही समाजवाद है। इस वाद में राजा और प्रजा, धनी और गरीब, मालिक और मजदूर सब बराबर हैं। इस तरह समाजवाद यानी। उसमें द्वैत या भेदभाव की गुंजाइश ही नहीं है।

 

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सारी दुनिया के समाज पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि हर जगह द्वैत-ही-द्वैत है – महात्मा गांधी

सारी दुनिया के समाज पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि हर जगह द्वैत-ही-द्वैत है एकता या अद्वैत कहीं नाम को भी नहीं दिखाई देता। वह आदमी ऊंचा है, वह आदमी नीचा है। वह हिंदू है, वह मुसलमान है, तीसरा ईसाई है, चैथा पारसी है, पांचवां सिक्ख है, छटा यहूदी है। इनमें भी बहुत सी उप-जातियां है। मेरे अद्वैतवाद में ये सब लोग एक हो जाते हैं, एकता में समा जाते हैं।

 

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जब तक सारे लोग समाजवादी न बन जाएं तब तक हम कोई हलचल न करें – महात्मा गांधी

इस वाद तक पहुंचने के लिए हम एक-दूसरे की तरफ ताकते न बैंठे। जब तक सारे लोग समाजवादी न बन जाएं तब तक हम कोई हलचल न करें, अपनी जीवन में कोई फेरफार न करके हम भाषण देते रहें, पार्टियां बनाते रहें और बाज पक्षी की तरह जहां शिकार मिल जाय वहां उस पर टूट पडे़-यह समाजवाद हरगिज़ नहीं है। समाजवाद जैसी शानदान चीज झड़प मारने से हमसे दूर ही जाने वाली है।

 

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समाजवाद की शुरूआत पहले समाजवादी से होती है – महात्मा गांधी

समाजवाद की शुरूआत पहले समाजवादी से होती है। अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो तो उस पर सिफर बढ़ाये जा सकते हैं। पहले सिफर से उसकी कीमत दस गुनी बढ़ती जायेगी। लेकिन अगर पहला सिर ही हो, दूसरे शब्दों में अगर कोई आरंभी ही न करे, तो उसके आगे कितने ही सिफर क्यों न बढ़ाये जायं उनकी कीमत सिफर ही रहेगी। सिफरों को लिखने में मेहनत और कागज की बरबादी ही होगी।

 

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समाजवाद बडी शुद्ध चीज़ है – महात्मा गांधी

यह समाजवाद बडी शुद्ध चीज़ है। इसलिए इसे पाने के साधन भी शुद्ध ही होने चाहिये। गंदे साधनों से मिलने वाली चीज़ भी गंदी ही होगी। इसलिए राजा को मारकर राजा और प्रजा एक से नहीं बन सकेंगे। यही बात सब पर लागू की जा सकती है।

 

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कोई असत्य से सत्य को नहीं पा सकता – महात्मा गांधी

कोई असत्य से सत्य को नहीं पा सकता। सत्य को पाने के लिए हमेशा सत्य का आचरण करना ही होगा। अहिंसा और सत्य की तो जोड़ी है न ? हरगिज़ नहीं। सत्य में अहिंसा छिपी हुई है और अहिंसा में सत्य। इसीलिए मैंने कहा है कि सत्य और अहिंसा एक ही सिक्के के दो रूप है। दोनों की कीमत एक ही है। केवल पढ़ने में ही फर्क है, एक तरह अहिंसा है, दूसरी तरफ सत्य। संपूर्ण पवित्रता के बिना अहिंसा और सत्य निभ ही नहीं सकते। शरीर या मन की अपवित्रता को छिपाने से असत्य और अहिंसा ही पैदा होगी। इसलिए केवल सत्यवादी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्तान में समाजवाद फैला सकता है। जहां तक में जानता हूं, दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो। मेरे बताये हुए साधनों के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है।

 

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सर्वोच्च कोटि की स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च कोटि का अनुशासन और विनय होता है – महात्मा गांधी

सर्वोच्च कोटि की स्वतंत्रता के साथ सर्वोच्च कोटि का अनुशासन और विनय होता है। अनुशासन और विनय से मिलने वाली स्वतंत्रता को कोई छीन नहीं सकता। संयमहीन स्वच्छंदता संस्कारहीनता की घोतक है, उससे व्यक्ति की अपनी और पड़ोसियों की भी हानि होती है।

 

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कोई भी मनुष्य की बनाई हुई संस्था ऐसी नहीं है जिसमें खतरा न हो – महात्मा गांधी

कोई भी मनुष्य की बनाई हुई संस्था ऐसी नहीं है जिसमें खतरा न हो। संस्था जितनी बड़ी होगी, उसके दुरूपयोग की संभावनायें भी उतनी ही बड़ी होंगी। लोकतंत्र एक बड़ी संस्था है, इसलिए उसका दुरूपयोग भी बहुत हो सकता है। लेकिन उसका इलाज लोकतंत्र से बचना नहीं, बल्कि दुरूपयोग की संभावना को कम-से-कम करना है।

 

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अनुशासन और विवेकयुक्त जनतंत्र दुनिया की सबसे सुंदर वस्तु है – महात्मा गांधी

जनता की राय के अनुसार चलने वाला राज्य जनमत से आगे बढ़कर कोई काम नहीं कर सकता। यदि वह जनमत के खिलाफ जाय तो नष्ट हो जाय। अनुशासन और विवेकयुक्त जनतंत्र दुनिया की सबसे सुंदर वस्तु है। लेकिन राग-द्वेष, अज्ञान और अंध-विश्वास आदि दुर्गुणों से ग्रस्त जनतंत्र अराजकता के गड्ढे में गिरता है और अपना नाश खुद कर डालता है।

 

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हम सबसे भूलें होती हैं और हमें अक्सर अपने निर्णयों में परिवर्तन करने पड़ते हैं – महात्मा गांधी

मैंने अक्सर यह कहा है कि अमुक विचार रखने वाला कोई भी पक्ष यह दावा नहीं कर सकता कि प्रस्तुत प्रश्नें के सही निर्णय केवल वही कर सकता है। हम सबसे भूलें होती हैं और हमें अक्सर अपने निर्णयों में परिवर्तन करने पड़ते हैं। हमारे जैसे विशाल देश में ईमानदारी से विचार करने वाले सभी पक्षों को स्थान होना चाहिये। इसलिए हमारा अपने प्रति और दूसरों के प्रति कम-से-कम यक कत्र्तव्य तो है ही कि हम प्रतिपक्षी का दृष्टिकोण समझने की कोशिश करें। और यदि हम उसे स्वीकार न कर सकें तो भी जिस तरह हम यह चाहेंगे कि वह हमारे मत का आदर करे, उसी तरह हम भी उसके मत का आदर करें। यह चीज स्वस्थ सार्वजनिक जीवन की और स्व्राज्य की योग्यता की अनिवार्य कसौटियों में से एक है। यदि हममें उदारता और सहिष्णुता नहीं है, तो हम अपने भेद कभी मित्रतापूर्वक नहीं सुलझा सकेंगे और फल यह होगा कि हमें तीसरे पक्ष को अपना पंच मानना पड़ेगा, यानी विदेषी अधीनता स्वीकार करनी पडेगी.

 

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जब राज्यसत्ता जनता के हाथ में आ जाती है, तब प्रजा की आजादी में होने वाले हस्तक्षेप की मात्रा कम-से-कम हो जाती है – महात्मा गांधी

जब राज्यसत्ता जनता के हाथ में आ जाती है, तब प्रजा की आजादी में होने वाले हस्तक्षेप की मात्रा कम-से-कम हो जाती है। दूसरे शब्दों में, जो राष्ट्र अपना काम राज्य के हस्तक्षेप के बिना ही शांतिपूर्वक और प्रभावपूर्ण ढंग से कर दिखाता है, उसे ही सच्चे अर्थों में लोकतंत्रात्मक कहा जा सकता है। जहां ऐसी स्थिति न हो वहां सरकार का बाहरी रूप लोकतंत्रात्मक भले हो, परंतु वह नाम के लिए ही लोकतंत्रात्मक है।

 

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लोकतंत्र और हिंसा का मेल नहीं बैठ सकता – महात्मा गांधी

लोकतंत्र और हिंसा का मेल नहीं बैठ सकता। जो राज्य आज नाम मात्र के लिए लोकतंत्रात्मक हैं उन्हें या तो स्पष्ट रूप से तानाशाही का हामी हो जाना चाहिये, या अगर उन्हें सचमुच लोकतंत्रात्मक बनना है तो उन्हें साहस के साथ अहिंसक बन जाना चाहिये। यह कहना बिलकुल अविचारपूर्ण है कि अहिंसा का पालन केवल व्यक्ति ही कर सकते हैं, और राष्ट्र-जो व्यक्तियों से ही बनते हैं-हरगिज नहीं।


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प्रजातंत्र का सार ही यह है कि उसमें हर एक व्यक्ति उन विविध स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करता है जिनसे राष्ट्र बनता है – महात्मा गांधी

प्रजातंत्र का सार ही यह है कि उसमें हर एक व्यक्ति उन विविध स्वार्थों का प्रतिनिधित्व करता है जिनसे राष्ट्र बनता है। यह सच है कि इसका यह मतलब नहीं कि विशेष स्वार्थों के विशेष प्रतिनिधियों को प्रतिनिधित्व करने से रोक दिया जाये, लेकिन ऐसा प्रतिनिधित्व उसकी कसौटी नहीं है। यह उसकी अपूर्णता की एक निशानी है।

 

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सच्ची लोकसत्ता या जनता का स्वराज्य कभी भी असत्यमय या हिंसक साधनों से नही आ सकता – महात्मा गांधी

सच्ची लोकसत्ता या जनता का स्वराज्य कभी भी असत्यमय या हिंसक साधनों से नही आ सकता। कारण स्पष्ट और सीधा है यदि असत्यमय और हिंसक उपायों का प्रयोग किया गया, तो उसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा, कि सारा विरोध या तो विरोधियों को दबाकर या उनका नाश करके खतम कर दिया जायेगा। ऐसी स्थिति में वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा नहीं हो सकती। वैयक्तिक स्वतंत्रता को प्रगट होने का पूरा अवकाश केवल विशुद्ध अहिंसा पर आधारित शासन में ही मिल सकता है।

 

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आजाद प्रजातांत्रिक भारत आक्रमण के खिलाफ रहेगा- महात्मा गांधी

आजाद प्रजातांत्रिक भारत आक्रमण के खिलाफ पारस्परिक रक्षण और आर्थिक सहकार के लिए दूसरे आजाद देशों के साथ खुशी से सहयोग करेगा। वह आजादी और जनतंत्र पर आधारित ऐसी विश्व-व्यवस्था की स्थापना के लिए काम करेगा, जो मानव-जाति की प्रगति और विकास के लिए दुनिया के समूचे ज्ञान और उसकी समूची साधन-संपत्ति का उपयोग करेगी।

 

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प्रजातंत्र का अर्थ नीचे-से-नीचे और ऊंचे-से-ऊंचे आदमी को आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिये – महात्मा गांधी

प्रजातंत्र का अर्थ मैं यह समझा हूं कि इस तंत्र में नीचे-से-नीचे और ऊंचे-से-ऊंचे आदमी को आगे बढ़ने का समान अवसर मिलना चाहिये। लेकिन सिवा अहिंसा के ऐसा कभी हो ही नहीं सकता। संसार में आज कोई भी देश ऐसा नहीं है जहां कमजोरों के हक की रक्षा बतौर फर्ज के होती हो। अगर गरीबांे के लिए कुछ किया भी जाता है, तो वह मेहरबानी के तौर पर किया जाता है।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

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पश्चिम का आज का प्रजातंत्र ज़रा हलके रंग का नाज़ी और फासिस्ट तंत्र ही है – महात्मा गांधी

पश्चिम का आज का प्रजातंत्र ज़रा हलके रंग का नाज़ी और फासिस्ट तंत्र ही है। ज्यादा-से-ज्यादा प्रजातंत्र साम्राज्यवाद की नाजी और फासिस्ट चाल को ढ़कने के लिए एक आडम्बर है। … हिंदुस्तान सच्चा प्रजातंत्र गढ़ने का प्रयत्न कर रहा है, अर्थात् ऐसा प्रजातंत्र जिसमें हिंसा के लिए कोई स्थान न होगा। हमारा हथियार सत्याग्रह है। उसका व्यक्त स्वरूप है चरख, ग्रामोद्योग, उद्योग के जरिये प्राथमिक शिक्षा-प्रणाली, अस्पृश्यता-निवारण, मद्य-निषेध, अहिंसक तरीके से मजदूरों का संगठन, जैसा कि अहमदाबाद में हो रहा है, और सांप्रदायिक ऐक्य। इस कार्यक्रम के लिए जनता को सामुदायिक रूप में प्रयत्न करना पड़ता है, और सामुदायिक रूप से जनता को शिक्षण भी मिल जाता है। इन प्रवृत्तियों को चलाने के लिए हमारे पास बड़े-बड़े संघ है, पर कार्यकत्र्ता पूरी तरह स्वेच्छा से इन कामों में आये हैं। उनके पीछे अगर कोई शक्ति है, तो वह उनकी अत्यंत दीन-दुर्बलांें की सेवा-भावना ही है।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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जन्मजात लोकतंत्रवादी वह होता है, जो जन्म से ही अनुशासन का पालन करने वाला हो – महात्मा गांधी

जन्मजात लोकतंत्रवादी वह होता है, जो जन्म से ही अनुशासन का पालन करने वाला हो। लोकतंत्र स्वाभाविक रूप में उसी को प्राप्त होता है, जो साधारण रूप में अपने को मानवी और दैवी सभी नियमों का स्वेच्छापूर्वक पालन करने का अभ्यस्त बना ले।… जो लोग लोकतंत्र के इच्छुक हैं उन्हंे चाहिये कि पहले वे लोकतंत्र की इस कसौटी पर अपने को परख लें। इसके अलावा, लोकतंत्रवादी को निःस्वार्थ भी होना चाहिये। उसे अपनी या अपने दल की दृष्टि से नहीं बल्कि एकमात्र लोकतंत्र की ही दृष्टि से सब-कुछ सोचना चाहिये। तभी वह सविनय अवज्ञा का अधिकारी हो सकता है।….. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की मैं कदर करता हूं, लेकिन आपको यह हरगिज नहीं भूलना चाहिये कि मनुष्य मूलतः एक सामाजिक प्राणी ही है। सामाजिक प्रगति की आवश्यकताओं के अनुसार अपने व्यक्तित्व को ढालना सीखकर ही वह वर्तमान स्थिति तक पहुंचा है। अबाध व्यक्तिवाद वन्य पशुओं का नियम है। हमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक संयम के बीच समन्वय करना सीखना है। समस्त समाज के हित के खातिर सामाजिक संयम के आगे स्वेच्छापूर्वक सिर झुकाने से व्यक्ति और समाज, जिसका कि वह एक सदस्य है, दोनों का ही कल्याण होता है।

 

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जो व्यक्ति अपने कर्तव्य का उचित पालन करता है, उसे अधिकार अपने-आप मिल जाते हैं – महात्मा गांधी

जो व्यक्ति अपने कर्तव्य का उचित पालन करता है, उसे अधिकार अपने-आप मिल जाते हैं। सच तो यह है कि एकमात्र अपने कर्तव्य के पालन का अधिकार ही ऐसा अधिकार है, जिसके लिए ही मनुष्य को जीना चाहिये और मरना चाहिये। उसमें सब उचित अधिकारों का समावेश हो जाता है। बाकी सब तो अनधिकार अपहरण जैसा है और उसमें हिंसा के बीज छपे रहते हैं।

 

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लोकशाही में हर आदमी को समाज की इच्छा यानी राज्य की इच्छा के मुताबिक चलना होता है – महात्मा गांधी

लोकशाही में हर आदमी को समाज की इच्छा यानी राज्य की इच्छा के मुताबिक चलना होता है और उसी के मुताबिक अपनी इच्छाओं की हद बांधनी होती है। स्टेट लोकशाही के द्वारा और लोकशाही के लिए राज्य चलाती है। अगर हर आदमी कानून को अपने हाथ में ले ले तो स्टेट नहीं रह जायेंगी, वह अराजकता हो जायेगी, यानी सामाजिक नियम या स्टेट की हस्ती मिट जायेगी। यह आजादी को मिटा देने वाला रास्ता है। इसलिए आपको अपने गुस्से पर काबू पाना चाहिये और राज्य को न्याय पाने का मौका देना चाहिये।

 

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प्रजातंत्र में लोगों को चाहिये कि वे सरकार की कोई गलती देखें, तो उसकी तरफ उसका ध्यान खीचें – महात्मा गांधी

प्रजातंत्र में लोगों को चाहिये कि वे सरकार की कोई गलती देखें, तो उसकी तरफ उसका ध्यान खीचें और संतुष्ट हो जाएँ। अगर वे चाहें तो अपनी सरकार को हटा सकते हैं, मगर उसके खिलाफ आंदोलन करके उसके कामों में बाधा न डालें। हमारी सरकार जबरदस्त जल सेना आर थल सेना रखने वाली कोई विदेशी सरकार तो है नहीं। उसका बल तो जनता ही है। सच्ची नौकरशाही केंद्र में बैठे हुए बीस आदमी नहीं चला सकते। वह तो नीचे से हर एक गांव के लोगों द्वारा चलायी जानी चाहिये।


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मैं जनता की नाराजगी की परवाह करता हूं- महात्मा गांधी

मैं खुद तो सरकार की नाराजी की उतनी परवाह नहीं करता जितनी भीड़ की नाराजी की। भीड़ की मनमानी राष्ट्रीय बीमारी का लक्षण है और इसलिए सरकार की नाराजी की -जो कि अल्पकाय संघ तक ही सीमित होती है-तुलना में उससे निपटना ज्यादा मुश्किल है। ऐसी किसी सरकार को, जिसने अपने को शासन के लिए अयोग्य सिद्ध कर दिया हो, अपदस्थ करना आसान है, लेकिन किसी भीड़ में शामिल अनजाने आदमियों का पागलपन दूर करना कठिन है।

 

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भीड़ को अनुशासन सिखाने से ज्यादा आसान और कुछ नहीं है – महात्मा गांधी

भीड़ को अनुशासन सिखाने से ज्यादा आसान और कुछ नहीं है। कारण सीधा है। भीड़ कोई काम बुद्धिपूर्वक नहीं करती, उसकी कोई पहले से सोची हुई योजना नहीं होती। भीड़ के लोग जो कुछ करते हैं सो आवेश में करते हैं। अपनी गलती के लिए पश्चाताप भी वे जल्दी करते हैं। मैं असहयोग का उपयोग लोकशाही का विकास करने के लिए कर रहा हूं।

 

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जो देशप्रेम सीखना चाहते हैं, उनका नेतृत्व करें- महात्मा गांधी

हमें इन हजारों-लाखों लोगों को, जिनका हृदय सोने का है, जिन्हें देश से प्रेम है, जो सीखना चाहते हैं और यह इच्छा रखते हें कि कोई उनका नेतृत्व करें, सही तालीम देनी चाहिये। केवल थोड़े से बुद्धिमान और निष्ठावान कार्यकत्र्ताओं की जरूरत है। वे मिल जाएं तो सारे राष्ट्र को बुद्धिपूर्वक काम करने के लिए संघटित किया जा सकता है तथा भीड़ की अराजकता की जगह सही प्रजातंत्र का विकास किया जा सकता है।

 

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सरकारी आतंकवाद की तुलना में प्रजाकीय आतंकवाद लोकशाही की भावना के प्रसार का ज्यादा बड़ा शत्रु है – महात्मा गांधी

सरकार की ओर से या प्रजा की ओर से आतंकवाद चलाया जा रहा हो, तब लोकशाही की भावना की स्थापना करना असंभव है। और कुछ अंशों में सरकारी आतंकवाद की तुलना में प्रजाकीय आतंकवाद लोकशाही की भावना के प्रसार का ज्यादा बड़ा शत्रु है। कारण, सरकारी आतंकवाद से लोकशाही की भावना को बल मिलता है, जब कि प्रजाकीय आतंकवाद तो उसका हनन करता है।

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लोकशाही की सच्ची भावना के लिए सहिष्णुता जरूरी- महात्मा गांधी

अगर हम लोकशाही की सच्ची भावना का विकास करना चाहते हैं, तो हम असहिष्णु नहीं हो सकते। असहिष्णु नहीं हो सकते। असहिष्णुता यह बताती है कि अपने ध्येय की सचाई में हमारा पूरा विश्वास नहीं है। हम अपने लिए यदि स्वतंत्रतापूर्वक अपना मत प्रकट करने और कार्य करने के अधिकार का दावा करते हैं, तो यही अधिकार हमें दूसरों को भी देना चाहिये। बहुसंख्यक दल का शासन, जब वह लोगों के साथ जबरदस्ती करने लगता है तब, उतना ही हसहाय हो उठता है जितना किसी अल्पसंख्यक नौकरशाही का। हमें अल्पसंख्यकों को अपने पक्ष में धीरज के साथ, समझा-बुझाकर और दलील करके ही लाने की कोशिश करनी चाहिये।

 

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लोकशाही किसी ऐसी स्थिति का नाम नहीं है, जिसमें लोग भेड़ों की तरह व्यवहार करें- महात्मा गांधी

बहुसंख्यक दल का शासन अमुक हद तक जरूर माना जाना चाहिये। यानी, ब्यौरे की बातों में हमें बहुसंख्यक दल का निर्णय स्वीकार कर लेना चाहिये। लेकिन उसके निर्णय कुछ भी क्यों न हों, उन्हें हमेशा स्वीकार कर लेना गुलामी का चिन्ह नहीं है। लोकशाही किसी ऐसी स्थिति का नाम नहीं है, जिसमें लोग भेड़ों की तरह व्यवहार करें। लोकशाही में व्यक्ति के मत-स्वातंत्र्य और कार्य स्वातंत्र्य की रक्षा अत्यंत सावधानी से की जाती है, और की जानी चाहिये। इसलिए मैं यह विश्वास करता हूं कि अल्पसंख्यकों को बहुसंख्यकों से अलग ढंग से चलने का पूरा अधिकार है।

 

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अगर व्यक्ति का महत्व न रहे, तो समाज में भी क्या सत्व रह जायेगा – महात्मा गांधी

अगर व्यक्ति का महत्व न रहे, तो समाज में भी क्या सत्व रह जायेगा ? वैयक्तिक स्वतंत्रता ही मनुष्य को समाज की सेवा के लिए स्वेच्छापूर्वक अपना सब-कुछ अर्पण करने की प्रेरणा दे सकती है। यदि उससे यह स्वतंत्रता छीन ली जाय, तो वह एक जड़ यंत्र जैसा हो जाता है और समाज की बरदारी होती है। वैयक्तिक स्वतंत्रता को अस्वीकार करके कोई सभ्य समाज नहीं बनाया जा सकता।

 

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मेरे लिए देश-प्रेम और मानव-प्रेम; दोनो एक ही है – महात्मा गांधी

मेरे लिए देश-प्रेम और मानव-प्रेम में कोई भेद नही है; दोनो एक ही है। मै देशप्रेमी हूं, क्योकि मै मानव-प्रेमी हूं। मेरा देशप्रेम वर्जनशील नही है। मै भारत के हित की सेवा के लिए इंग्लैंड या जर्मनी का नुकसान नही करूंगा। जीवन की मेरी योजना में साम्राज्यवाद के लिए कोई स्थान नही है। देशप्रेमी की जीवननीति किसी कुल या कबीले के अधिपति की जीवन-नीति से भिन्न नही है। और यदि कोई देशप्रेमी उतना ही उग्र मानव-प्रेमी नही है, तो कहना चाहिये कि उसके देशप्रेम में उतनी न्यूनता है। वैयक्तिक आचरण और राजनीतिक आचरण में कोई विरोध नही है; सदाचार का नियम दोनों को लागू होता है।

 

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आवश्यकता होने पर संसार के कल्याण के लिए अपना बलिदान करें – महात्मा गांधी

जिस तरह देशप्रेम का धर्म आज यह सिखाता है कि व्यक्ति को परिवार के लिए, परिवार को ग्राम के लिए, ग्राम को जनपद के लिए और जनपद को प्रदेश के लिए मरना सीखना चाहिये, उसी तरह किसी देश को स्वतंत्र इसलिए होना चाहिये कि वह आवश्यकता होने पर संसार के कल्याण के लिए अपना बलिदान दे सके। इसलिए राष्ट्रवाद की मेरी कल्पना यह है कि मेरा देश इसलिए स्वाधीन हो कि प्रयोजन उपस्थित होने पर सारा ही देश मानव-जाति की प्राणरक्षा के लिए स्वेच्छापूर्वक मृत्यु का आलिंगन करे। उसमें जातिद्वेष के लिए कोई स्थान नहीं है। मेरी कामना है कि हमारा राष्ट्रप्रेम ऐसा ही हो।

 

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यूरोप के पांवों में पड़ा हुआ अवनत भारत मानव-जाति को कोई आशा नहीं दे सकता – महात्मा गांधी

मैं भारत का उत्थान इसलिए चाहता हूं कि सारी दुनिया उससे लाभ उठा सके। मैं यह नहीं चालता कि भारत का उत्थान दूसरे देशों के नाश की नींव पर हो। यूरोप के पांवों में पड़ा हुआ अवनत भारत मानव-जाति को कोई आशा नहीं दे सकता। किंतु जाग्रत और स्वतंत्र भारत दर्द से कराहती हुई दुनिया को शांति और सद्भाव का संदेश अवश्य देगा।


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राष्ट्रवादी हुए बिना कोई अंतर-राष्ट्रीयतावादी नहीं हो सकता – महात्मा गांधी

राष्ट्रवादी हुए बिना कोई अंतर-राष्ट्रीयतावादी नहीं हो सकता। अंतर-राष्ट्रीयतावाद तभी संभव है जब राष्ट्रवाद सिद्ध हो चुके-यानी जब विभिन्न देशों के निवासी अपना संघटन कर लें और हिल-मिलकर एकतापूर्वक काम करने की सामथ्र्य प्राप्त कर लें। राष्ट्रवाद में कोई बुराई नहीं है, बुराई तो उस संकुचितता, स्वार्थवृत्ति और बहिष्कार-वृृत्त में है, जो मौजूदा राष्ट्रों के मानस में जहर की तरह मिली हुई है। हर एक राष्ट्र दूसरे की हानि करके अपना लाभ करना चाहता है और उसके नाश पर अपना निर्माण करना चाहता है। भारतीय राष्ट्रवाद ने एक नया रास्ता लिया है। वह अपना संघटन या अपने लिए आत्म-प्रकाशन का पूरा अवकाश विशाल मानव-जाति के लाभ के लिए, उसकी सेवा के लिए ही चाहता है।

 

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यदि मैं भारत की सेवा न करूं तो विधाता के सामने अपराधी ठहरूंगा- महात्मा गांधी

भगवान ने मुझे भारत में जन्म दिया है और इस तरह मेरा भाग्य इस देश की प्रजा के भाग्य के साथ बांध दिया है, इसलिए यदि मैं उसकी सेवा न करूं तो मैं अपने विधाता के सामने अपराधी ठहरूंगा। यदि मैं यह नहीं जानता कि उसकी सेवा कैसे की जाय, तो मैं मानव-जाति की सेवा करना सीख ही नहीं सकता। और यदि अपने देश की सेवा करते हुए मैं दूसरे देशों को कोई नुकसान नहीं पहुंचाता, तो मेरे पथभ्रष्ट होने की कोई संभावना नहीं है।

 

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मेरा देशप्रेम कोई बहिष्कारशील वस्तु नहीं बल्कि अतिशय व्यापक वस्तु है – महात्मा गांधी

मेरा देशप्रेम कोई बहिष्कारशील वस्तु नहीं बल्कि अतिशय व्यापक वस्तु है और मैं उस देशप्रेम को वज्र्य मानता हूं जो दूसरे राष्ट्रों को तकलीफ देकर या उनका शोषण करके अपने देश को उठाना चाहता है। देशप्रेम की मेरी कल्पना यह है कि वह हमेशा, बिना किसी अपवाद के हर एक स्थिति में, मानव-जाति के विशालतम हित के साथ सुसंगत होना चाहिये। यदि ऐसा न हो तो देशप्रेम की कोई कीमत नहीं। इतना ही नहीं, मेरे धर्म और उस धर्म से ही प्रसूत मेरे देशप्रेम के दायरे में प्राणि मात्र का समावेश होता है। मैं न केवल मनुष्य नाम से पहचाने जाने वाले प्राणियों के साथ भ्रातृत्व और एकात्मता सिद्ध करना चाहता हूं, बल्कि समस्त प्राणियों के साथ-रेंगने वाले सांप आदि जैसे प्राणियों के साथ भी-उसी एकात्मता का अनुभव करना चाहता हूं। कारण, हम सब उसी एक सृष्टा की संतति होने का दावा करते हैं और इसलिए सब प्राणी, उनका रूप कुछ भी हो, मूल में एक ही है।

 

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हमारा राष्ट्रवाद दूसरे देशों के लिए कभी संकट का कारण नहीं हो सकता – महात्मा गांधी

हमारा राष्ट्रवाद दूसरे देशों के लिए कभी संकट का कारण नहीं हो सकता। क्योंकि जिस तरह हम किसी को अपना शोषण नहीं करने देंगे, उसी तरह हम भी किसी का शोषण नहीं करेंगे। स्वराज्य के द्वारा हम सारी मानव-जाति की सेवा करेंगे।

 

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विभिन्न राष्ट्रों में जो पारस्परिक द्वेषभाव नजर आता है उसे रोका जा सकता है – महात्मा गांधी

सार्वजनिक जीवन के लगभग 50 वर्ष के अनुभव के बाद आज मैं यह कह सकता हूं कि अपने देश की सेवा से असंगत नहीं है- इस सिद्धांत में मेरा विश्वास बढ़ा है। यह एक उत्तम सिद्धांत है। इस सिद्धांत को स्वीकार करके ही दुनिया की मौजूदा कठिनाइयां आसान की जा सकती है और विभिन्न राष्ट्रों में जो पारस्परिक द्वेषभाव नजर आता है उसे रोका जा सकता है।

 

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स्वराज्य एक पवित्र शब्द है – महात्मा गांधी

स्वराज्य एक पवित्र शब्द है; वह एक वैदिक शब्द है, जिसका अर्थ आत्म-शासन और आत्म-संयम है। अंग्रेजी शब्द ‘ इंडिपेंडेन्स ‘ अक्सर सब प्रकार की मर्यादाओं से मुक्त निरंकुश आजादी का या स्वच्छंदता का अर्थ देता है; वह अर्थ स्वराज्य शब्द में नही है।

 

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स्वराज्य से मेरा अभिप्राय है लोक-सम्मति के अनुसार होने वाला भारतवर्ष का शासन – महात्मा गांधी

स्वराज्य से मेरा अभिप्राय है लोक-सम्मति के अनुसार होने वाला भारतवर्ष का शासन। लोक-सम्मति का निश्चय देश के बालिग लोगों की बडी-से-बडी तादाद के मत के जरिये हो, फिर वो चाहे स्त्रियां हो या पुरूष, इसी देश के हो या इस देश में आकर बस गये हों। वे लोग ऐसे हों जिन्होने अपने शारीरिक श्रम के द्वारा राज्य की कुछ सेवा की हो और जिन्होने मतदाताओं की सूची में अपना नाम लिखवा लिया हो।…… सच्चा स्वराज्य थोड़े लोगो के द्वारा सत्ता प्राप्त कर लेने से नही, बल्कि जब सत्ता का दुरूपयोग होता हो तब सब लोगों के द्वारा उसका प्रतिकार करने की क्षमता प्राप्त करके हासिल किया जा सकता है। दूसरे शब्दों में, स्वराज्य जनता में इस बात का ज्ञान पैदा करके प्राप्त किया जा सकता है कि सत्ता पर कब्जा करने और उसका नियमन करने की क्षमता उसमें है।

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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स्वराज्य हमारी आंतरिक शक्ति पर निर्भर करता है- महात्मा गांधी

आखिर स्वराज्य निर्भर करता है हमारी आंतरिक शक्ति पर, बडी-से-बडी कठिनाइ्रयों से जूझने की हमारी ताकत पर। सच पूछो तो वह स्वराज्य, जिसे पाने के लिए अनवरत प्रयत्न और बचाये रखने के लिए सतत् जागृति नही चाहिये, स्वराज्य कहलाने के लायक ही नही है। जैसा कि आपको मालूम है, मैने वचन और कार्य से यह दिखलाने की कोशिश् की है कि स्त्री-पुरूषो के विशाल समूह का राजनीतिक स्वराज्य एक-एक शख्स के अलग-अलग स्वराज्य से कोई ज्यादा अच्छी चीज नही है, और इसलिए उसे पाने का तरीका वही है जो एक-एक आदमी के आत्म-स्वराज्य या आत्म-संयम का है।

 

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स्वराज्य का अर्थ है सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के लिए लगातार प्रयत्न करना – महात्मा गांधी

स्वराज्य का अर्थ है सरकारी नियंत्रण से मुक्त होने के लिए लगातार प्रयत्न करना, फिर वह नियंत्रण विदेशी का हो या स्वदेशी का। यदि स्वराज्य हो जाने पर लोग अपने जीवन की हर छोटी बात के नियमन के लिए सरकार का मुंह ताकना शुरू कर दें तो वह स्वराज्य-सरकार किसी काम की नहीं होगी।

 

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मेरा स्वराज्य तो हमारी सभ्यता की आत्मा को अक्षुण्ण रखता है – महात्मा गांधी

मेरा स्वराज्य तो हमारी सभ्यता की आत्मा को अक्षुण्ण रखना है। मैं बहुतसी नई चीजें लिखना चाहता हूं, परंतु वे तमाम हिंदुस्तान की स्लेट पर लिखी जानी चाहिये। हां, मैं पश्चिम से भी खुशी से उधार लूंगा, पर तभी जब कि मैं उसे अच्छे सूद के साथ वापस कर सकूं।

 

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स्वराज्य की रक्षा केवल वहीं हो सकती है, जहां देशवासियों की ज्यादा बड़ी संख्या ऐसे देशभक्तों की हो – महात्मा गांधी

स्वराज्य की रक्षा केवल वहीं हो सकती है, जहां देशवासियों की ज्यादा बड़ी संख्या ऐसे देशभक्तों की हो, जिनके लिए दूसरी सब चीजों से-अपने निजी लाभ से भी -देश की भलाई का ज्यादा महत्व हो। स्वराज्य का अर्थ है देश की बहुसंख्यक जनता का शासन। जाहिर है कि जहां बहुसंख्यक जनता नीति-भ्रष्ट हो या स्वार्थी हो, वहां उसकी सरकार अराजकता की ही स्थिति पैदा कर सकती है, दूसरा कुछ नहीं।

 

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मेरे सपनों के स्वराज्य में जाति या धर्म के भेदों का कोई स्थान नहीं हो सकता – महात्मा गांधी

मेरे सपनों के स्वराज्य में जाति या धर्म के भेदों का कोई स्थान नहीं हो सकता। उस पर शिक्षितों या धनवानों का एकाधिपत्य नहीं होगा। वह स्वराज्य सबके लिए-सबके कल्याण के लिए होगा। सबकी गिनती में किसान तो आते ही हैं किंतु लूले, लंगड़े, अंधे और भूख से मरने वाले लाखों-करोड़ों मेहनतकश मजदूर भी अवश्य आते हैं।

 

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मेरे लिए हिन्द स्वराज्य का अर्थ सब लोगों का राज्य, न्याय का राज्य है – महात्मा गांधी

कुछ लोग ऐसा कहते हैं कि भारतीय स्वराज्य तो ज्यादा संख्या वाले समाज का यानी हिंदुओं का ही राज्य होगा। इस मान्यता से ज्यादा बड़ी कोई दूसरी गलती नहीं हो सकती। अगर यह सही सिद्ध हो तो अपने लिए मैं ऐसा कह सकता हूं कि उसे स्वराज्य मानने से इनकार कर दूंगा और अपनी सारी शक्ति लगाकर उसका विरोध करूंगा। मेरे लिए हिन्द स्वराज्य का अर्थ सब लोगों का राज्य, न्याय का राज्य है।


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स्वराज्य का अर्थ हमें सभ्य बनाना है – महात्मा गांधी

अगर स्वराज्य का अर्थ हमें सभ्य बनाना और हमारी सभ्यता को अधिक शुद्ध तथा मजबूत बनाना न हो, तो वह किसी कीमत का नहीं होगा। हमारी सभ्यता का मूल तत्व ही यह है कि हम अपने सब कामों में, फिर वे निजी हों या सार्वजनिक, नीति के पालन को सर्वोच्च स्थान देते हैं।

 

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पूर्ण स्वराज्य कहने का आशय- महात्मा गांधी

पूर्ण स्वराज्य कहने में आशय यह है कि वह जितना किसी राजा के लिए होगा उतना ही किसान के लिए, जितना किसी धनवान जमींदार के लिए होगा उतना ही भूमिहीन खेतिहर के लिए, जितना हिंदुओं के लिए होगा उतना ही पारसियों और ईसाइयों के लिए। हमें जाति-पाति, धर्म अथवा दरजे के भेदभाव के लिए कोई स्थान नहीं होगा।

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स्वराज्य सत्य और अहिंसा पालन करने की प्रतिज्ञा है- महात्मा गांधी

स्वराज्य शब्द का अर्थ स्वयं और उसकी प्राप्ति के साधन यानी सत्य और अहिंसा-जिनका पालन करने के लिए हम प्रतिज्ञा हैं- ऐसी किसी संभावना को असंभव सिद्ध करते हैं कि हमारा स्वराज्य किसीके लिए तो अधिक होगा और किसी के लिए कम, किसी के लिए लाभकारी होगा और किसी के लिए हानिकारी या कम लाभकारी।

 

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मेरे सपने का स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा – महात्मा गांधी

मेरे सपने का स्वराज्य तो गरीबों का स्वराज्य होगा। जीवन की जिन आवश्यकताओं का उपभोग राजा और अमीर लोग करते हैं, वही तुम्हंे भी सुलभ होनी चाहिये, इसमें फर्क के लिए स्थान नहीं हो सकता। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि हमारे पास उनके जैसे महल होने चाहिये। सुखी जीवन के लिए महलों की आवश्यकता नहीं। हमें महलांे में रख दिया जाये तो हम घबरा जायें। लेकिन तुम्हें जीवन की वे सामान्य सुविधाएं अवश्य मिलनी चाहिये, जिनका उपभोग अमीर आदमी करता है। मुझे इस बात में बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि हमारा स्व्राज्य तब तक पूर्ण स्वराज्य नहीं होगा, जब तक वह तुम्हें ये सारी सुविधाएं देने की पूरी व्यवस्था नहीं कर देता।

 

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मेरा राष्ट्रप्रेम उग्र तो है, पर वह वर्जनशील नही है – महात्मा गांधी

पूर्ण स्वराज्य की कल्पना दूसरे देशों से कोई नाता न रखने वाली स्वतंत्रता की नही, बल्कि स्वस्थ और गम्भीर किस्म की स्वतंत्रता की है। मेरा राष्ट्रप्रेम उग्र तो है, पर वह वर्जनशील नही है; उसमें किसी दूसरे राष्ट्र या व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने की भावना नही है। कानूनी सिद्धांत असल मे नैतिक सिद्धांत ही है। ‘ अपनी संपत्ति का उपयोग इस तरह करो कि पड़ोसी की सम्पत्ति को कोई हानि नही पहुंचे।‘- यह कानूनी सिद्धांत एक सनातन सत्य को प्रकट करता है और उसमें मेरा पूरा विश्वास है।

 

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पूर्ण स्वराज्य का अर्थ जनता में जागृति होनी चाहिए- महात्मा गांधी

यह सब इस बात पर निर्भर है कि पूर्ण स्वराज्य से हमारा आशय है और उसके द्वारा हम पाना क्या चाहते है। अगर हमारा आशय यह है कि जनता में जागृति होनी चाहिये, उसे अपने सच्चे हित का ज्ञान होना चाहिये और सारी दुनिया के विरोध का सामना करके भी उस हित की सिद्धि के लिए कोशिश करने की योग्यता होनी चाहिये; और यदि पूर्ण स्वराज्य के द्वार हम सुमेल, भीतरी या बाहरी आक्रमण से रक्षा और जनता की आर्थिक स्थिति में उत्तरोत्तर सुधार चाहते हो, तो हम अपना उद्धेश्य राजनीतिक सत्त के बिना ही सत्ता में हो उन पर अपना सीधा प्रभाव डालकर, सिद्ध कर सकते है।

 

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स्वराज्य का अर्थ विदेशी नियंत्रण से पूरी मुक्ति – महात्मा गांधी

स्वराज्य की मेरी कल्पना के विषय में किसी को कोई गलतफहमी नही होनी चाहिये। उसका अर्थ विदेशी नियंत्रण से पूरी मुक्ति और पूर्ण आर्थिक स्वतंत्रता है। उसके दो दूसरे उद्धेश्य भी है; एक छोर पर है नैतिक और सामाजिक उद्धेश्य और दूसरे छोर पर इसी कक्षा का दूसरा उद्धेश्य है धर्म। यहां धर्म शब्द का सर्वोच्च अर्थ अभीष्ट है। उसमें हिंदु धर्म, इस्लाम,ईसाई धर्म ंआदि सबका समावेश होता है, लेकिन वह इन सबसे ऊंचा है।… इसे हम स्वराज्य का सम-चतुभुर्ज कह सकते है; यदि उसका एक भी कोण विषम हुआ तो उसका रूप विकृत हो जायेगा।

 

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वैयक्तिक स्वतंत्रता को प्रकट होने का पूरा अवकाश केवल विशुद्ध अहिंसा पर आधारित शासन में ही मिल सकता है – महात्मा गांधी

मेरे कल्पना का स्वराज्य तभी आयेगा जब हमारे मन में यह बात अच्छी तरह जम जाय कि हमें अपने स्वराज्य सत्य और अहिंसा के शुद्ध साधनों द्वारा ही हासिल करना है, उन्ही के द्वारा हमें उसे कायम रखना है। सच्ची लोकसत्ता या जनता का स्वराज्य कभी भी असत्यमय और हिंसक उपयों का प्रयोग किया गया, तो उसका स्वाभाविक परिणाम यह होगा कि सारा विरोध या तो विरोधियों को दबाकर या उनका नाश करके खत्म कर दिया जायेगा। ऐसी स्थ्तिी में वैयक्तिक स्वतंत्रता की रक्षा नही हो सकती। वैयक्तिक स्वतंत्रता को प्रकट होने का पूरा अवकाश केवल विशुद्ध अहिंसा पर आधारित शासन में ही मिल सकता है।


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सच्चे अधिकार तो वे ही है जो अपने कर्तव्यों का योग्य पालन करके प्राप्त किये गये हों – महात्मा गांधी

अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में लोगो को अपने अधिकारो का ज्ञान न हो तो कोई बात नही, लेकिन उन्हे अपने कत्तर्वयो के साथ उसकी तौल का अधिकार जुड़ा हुआ होता ही है, और सच्चे अधिकार तो वे ही है जो अपने कर्तव्यों का योग्य पालन करके प्राप्त किये गये हों। इसलिए नागरिकता के अधिकार सिर्फ उन्ही को मिल सकते है, जो जिस राज्य में वे रहते हों उसकी सेवा करता हों। और सिर्फ वे ही इन अधिकारा के साथ पूरा न्याय कर सकते है। हर एक आदमी को झूठ बोलने ओर गुंडागिरी करने का अधिकार है, किन्तु इस अधिकार का प्रयोग उस आदमी और समाज, दोनो के लिए हानिकारक है। लेकिन जो व्यक्ति सत्य और अहिंसा का पालन करता है, उसे प्रतिष्ठा मिलती है और इस प्रतिष्ठा के फलस्वरूप उसे अधिकार मिल जाते है। और जिन लोगो को अधिकार अपने कत्र्तव्यो के पालन के फलस्वरूप मिलते है, वे उनका उपयोग समाज की सेवा के लिए ही करते है, अपने लिए कभी नही। किसी राष्ट्रीय समाज के स्वराज्य का अर्थ उस समाज के विभिन्न व्यक्तियों के स्वराज्य (अर्थात आत्म-शासन) का योग ही है। और ऐसा स्वराज्य व्यक्तियों के द्वारा नागरिकों के रूप में अपने कत्र्तव्य के पालन से ही आता है। उसमें कोई अपने अधिकारो की बात नही साचता। जब उनकी आवश्यकता होती है तब वे उन्हे अपने-आप मिल जाते है और इसलिए मिलते है कि वे अपने कत्र्तव्य का सम्पादन ज्यादा अच्छी तरह कर सके।

 

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अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में कोई किसी का शत्रु नही होता – महात्मा गांधी

अहिंसा पर आधारित स्वराज्य में कोई किसी का शत्रु नही होता, सारी जनता की भलाई का सामान्य उद्धेश्य सिद्ध करने में हर एक अपना अभीष्ट योग देता है, सब लिख पढ सकते है और उनका ज्ञान दिन-दिन बढ़ता रहता है। बीमारी और रोग कम -से-कम हो जाएं, ऐसी व्यवस्था की जाती है। कोई कंगाल नही होता और मजदूरी करना चाहने वाले को काम अवश्य मिल जाता है। ऐसी शासन व्यवस्था मे जुआ,शराबखोरी और दुराचार का या वर्ग-विद्वेष का कोई स्थान नही होता। अमीर लोग अपने धन का उपयोग बुद्धिपूर्वक उपयोगी कार्यो में करेंगे; अपनी शान-शौकत बढाने में या शारीरिक सुखों की वृद्धि में उसका अपव्यय नही करेंगे। उसमें ऐसा नही हो सकता, होना नही चाहिये, कि चंद अमीर तो रत्न-जटित महलों में रहे और लाखो-करोडो ऐसी मनहूस झापडियों मे, जिनमे हवा और प्रकाश का प्रवेश न हो। अहिंसक अहिंसक स्वराज्य में न्यायपूूर्ण अधिकारों का किसी के भी द्वारा कोई अतिक्रमण नही हो सकता और इसी तरह किसी को कोई अन्नायपूर्ण अधिकार नही हो सकते। सुसंघटित राज्य में किसी के न्याय अधिकार का किसी दूसरे के द्वारा अन्नायपूर्वक छीना जाना असंभव होना चाहिये और कभी ऐसा हो जाय तो अपहर्ता को अपदस्थ करने के लिए हिंसा का आश्रय लेने की जरूरत नही होनी चाहिये।

 

 

 

 

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