GANDHI IN ACTION network

the Spirit of Mahatma Gandhi lives through every nonviolent action

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

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दुनिया में भौतिक समृद्धि चाहने वाले पुरुषों की संख्या लगातार बढ़ रही है- महात्मा गांधी

दुनिया में ऐसे विवेकी पुरूषों की संख्‍या लगातार बढ़ रही है, जो इस सभ्‍यता को-जिसके एक छोर पर तो भौतिक समृद्धि की कभी तृप्‍त न होने वाली आकांक्षा है और दूसरे छोर पर उसके फलस्‍वरूप पैदा होन वाला युद्ध है-अविश्‍वास की निगाह से देखते हैं । लेकिन यह सभ्‍यता अच्‍छी हो या बुरी, भारत का पश्चिम जैसा उद्योगीकरण करने की क्‍या जरूरत है ? पश्चिमी सभ्‍यता शहरी सभ्‍यता है । इग्‍लैंड और इटली जैसे छोटे देश अपनी व्‍यवस्‍थाओं का शहरीकरण कर सकते हैं । अमेरिका बड़ा देश है, किन्‍तु उसकी आबादी बहुत विरल है । इसलिए उसे भी शायद वैसा ही करना पड़ेगा । लेकिन कोई भी आदमी यदि सोचेगा तो यह मानेगा कि भारत जैसे बड़े देश को, जिसकी आबादी बहुत ज्‍यादा बड़ी है और ग्राम-जीवन की ऐसी पुरानी परम्‍परा में पोषित हुई है जो उसकी आवश्‍कताओं को बराबर पूरा करती आयी है, पश्चिमी नमूने की नकल करने की कोई जरूरत नहीं है और न ही उसे ऐसी नकल करनी चाहिये । विशेष परिस्‍थ‍ितियों वाले किसी एक देश के लिए जो बात अच्‍छी है वह भिन्‍न परिस्‍थतियों वाले किसी दूसरे देश के लिए भी अच्‍छी ही हो, यह जरूरी नहीं हैं । जो चीज किसी एक आदमी के लिए पोषक का काम देती हो, वही दूसरे के लिए जहर जैसी सिद्ध होती है । किसी देश की संस्‍कृति को निर्धारित करने में उसके प्राकृतिक भूगोल का प्रमुख हिस्‍सा होता है । ध्रुव-प्रदेश के निवासी के लिए ऊनी कोट जरूरी हो सकता है़, लेकिन भूमध्‍य-रेखावर्ती प्रदेशों के निवासियों का तो उससे दम ही घुट जायेगा ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

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बड़े पैमाने पर होने वाला सामूहिक उत्‍पादन ही दुनिया की मौजूदा संकटमय स्थिति के लिए जिम्‍मेदार है – महात्मा गांधी

मेरा स्‍पष्‍ट मत है और मैं उसे साफ-साफ कहता हूं कि बड़े पैमाने पर होने वाला सामूहिक उत्‍पादन ही दुनिया की मौजूदा संकटमय स्थिति के लिए जिम्‍मेदार है । एक क्षण के लिए मान भी लिया जाय कि यंत्र मानव-समाज की सारी आवश्‍यकताओं पूरी कर सकते हैं, तो भी उसका यह परिणाम तो होगा ही कि उत्‍पादन कुछ विशिष्‍ट क्षेत्रों में केन्द्रित हो जायेगा और इसलिए वितरण की योजना के लिए हमें द्राविड़ी प्राणायाम करना पड़ेगा । दूसरी ओर यदि जिन क्षेत्रों में वस्‍तुओं की आवश्‍यकता है वहीं उनका उत्‍पादन हो और वहीं वितरण हो, तो वितरण की नियंत्रण अपने-आप हो जाता है । उसमें धोखाधड़ी के लिए कम गुंजाइश होती है और सट्टे के लिए तो बिल्‍कुल नहीं ।

 

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सशक्‍त राष्ट्र कमजोर और असंगठित जातियों का शोषण करते हैं- महात्मा गांधी

यह तो आप देखते ही है कि ये राष्‍ट्र (यूरोप और अमेरिका) दुनिया की तथाकथित कमजोर या असंगठित जातियों का शोषण करते हैं । यदि एक बार इन जातियों को इस चीज का प्राथमिकत ज्ञान हो जाय और वे इस बात का निश्‍चय कर लें कि अब अपना शोषण नहीं होने देंगी, तो फिर वे जो कुछ खुद पैदा कर सकती हैं उतने से ही संतोष कर लेगीं, ऐसा हो तो जहां तक मुख्‍य आवश्‍यकताओं का सम्‍बन्‍ध है सामूहिक उत्‍पादन मिट जायेगा ।

 

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सीमित उपभोग से मूल्य वृद्धि नहीं होती- महात्मा गांधी

जब उत्‍पादन और उपभोग दोनों किसी सीमित क्षेत्र में होते हैं, तो उत्‍पादन को अनश्चित हद तक और किसी भी मूल्‍य पर बढ़ाने का लोभ फिर नहीं रह जाता । उस हालत में हमारी मौजूदा अर्थ-व्‍यवस्‍था से जो कठिनाइयां और समस्‍यायें पैदा होती हैं वे भी नहीं रह जायेंगी ।

 

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घर में चलाने लायक यंत्रों में सुधार किये जायं, तो मैं उसका स्‍वागत करूंगा – महात्मा गांधी

यंत्रों का भी स्‍थान है । और यंत्रों ने अपना स्‍‍थान प्राप्‍त भी कर लिया हैं । लेकिन मनुष्‍यों के लिए जिस प्रकार की मेहनत करना अनिवार्य होना चाहिये, उसी प्रकार की मेहनत का स्‍थान उन्‍हें ग्रहण न कर लेना चाहिये । घर में चलाने लायक यंत्रों में सुधार किये जायं, तो मैं उसका स्‍वागत करूंगा । लेकिन मैं यह भी समझता हूं कि जब तक लाखों किसानों को उनके घर में कोई दूसरा धंधा करने के लिए न दिया जाय, तब तक हाथ-मेहनत से चरखा चलाने के बदले किसी दूसरी शक्ति से कपड़े का कारखाना चलाना गुनाह है ।

 

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यंत्रों की ऊपरी विजय से चमत्‍कृत होने से मैं इनकार करता हूं – महात्मा गांधी

यंत्रों की ऊपरी विजय से चमत्‍कृत होने से मैं इनकार करता हूं । और मारक यंत्रों के में एकदम खिलाफ हूं; उसमें मैं किसी तरह का समझौता स्‍वीकार नहीं कर सकता । लेकिन ऐसे सादे औजारों, साधनों या यंत्रों का, जो व्‍यक्ति की मेहनत को बचायें और झोंपडि़यों में रहने वाले लाखों-करोड़ों लोगों का बोझ कम करें, मैं जरूर स्‍वागत करूंगा ।

 

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हिन्दुस्तान में यंत्रों की प्रतिद्वंदिता नहीं करनी चाहिए- महात्मा गांधी

हिन्‍दुस्‍तान के सात लाख गांवों में फैले हुए ग्रामवासी-रूपर करोड़ों जीवित यंत्रों के विरूद्ध इन जड़ यंत्रों को प्रतिद्वंद्विता में नहीं लाना चाहिये । यंत्रों का सदुपयोग तो यह कहा जायेगा कि उससे मनुष्‍य के प्रयत्‍न को सहारा मिले और उसे वह आसान बना दे । यंत्रों के मौजूदा उपयोग का झुकाव तो इस ओर ही बढ़ता जा रहा है कि कुछ इने-गिने लोगों के हाथ में खूब संपत्ति पहुंचाई जाय और भी परवाह न की जाय ।

 

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ज्‍यों-ज्‍यों प्रतिस्‍पर्धा और बाजार की समस्‍यायें खड़ी होगी त्‍यों-त्‍यों गांवों का प्रगट या अप्रगट शोषण होगा – महात्मा गांधी

बड़े पैमाने पर उद्योगीकरण का अनिवार्य परिणाम यह होगा कि ज्‍यों-ज्‍यों प्रतिस्‍पर्धा और बाजार की समस्‍यायें खड़ी होगी त्‍यों-त्‍यों गांवों का प्रगट या अप्रगट शोषण होगा । इसलिए हमें अपनी सारी शक्ति इसी प्रयन्‍त पर केन्द्रित करनी चाहिये कि गांव स्‍वयं पूर्ण बनें और वस्‍तुओं का निर्माण और उत्‍पादन तो‍ फिर गांव वाले ऐसे आधुनिक यंत्रों और औजारों का, जिन्‍हें वे बना सकते हों और जिनका उपयोग उन्‍हें आर्थिक दृष्टि से पुसा सकता हो, उपयोग खुशी से करें । उस पर आपत्ति नहीं की जा सकती । अलबत्‍ता, उनका उपयोग दूसरों का शोषण करने के लिए नहीं होना चाहिये ।

 

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मैं नहीं मानता कि उद्योगीकरण हर हालत में किसी भी देश के लिए जरूरी ही है – महात्मा गांधी

मैं नहीं मानता कि उद्योगीकरण हर हालत में किसी भी देश के लिए जरूरी ही है । भारत के लिए तो वह उससे भी कम जरूरी है । मेरा विश्‍वास है कि आजाद भारत दु:ख से कराहती हुई दुनिया के प्रति अपने कर्तव्‍य का ऋण अपने गांवों का विकास करके और दुनिया के साथ मित्रता का व्‍यवहार करके और इस तरह सादा परन्‍तु उदात्‍त जीवन अपनाकर ही चुका सकता है । धन की पूजा ने है, उसके साथ ‘उच्‍च चिन्‍तन’ का मेल नहीं बैठता । जीवन का सम्‍पूर्ण सौन्‍दर्य तभी खिल सकता है जब हम उच्‍च कोटि का जीवन जीना सीखें ।

 

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खतरों वाला जीवन जीने रोमांच और उत्‍तेजना का अनुभव हो सकता है – महात्मा गांधी

खतरों वाला जीवन जीने रोमांच और उत्‍तेजना का अनुभव हो सकता है । पर खतरों का सामना करने हुए जीने में और खतरों वाला जीवन जीने में भेद है । जो आदमी जंगली जानवरों से और उनसे भी ज्‍यादा जंगली आदमियों से भरपूर जंगल में अकेले, बिना बन्‍दूक के और केवल ईश्‍वर के सहारे रहने की हिम्‍मत हवा में उड़ता हुआ रहता है और टकटकी लगाकर देखने वाले दर्शक-समुदाय की वाहवाही लूटने के खयाल से नीचे की ओर उड़ी लगाता है; वह खतरों वाला जीता है । पहले आदमी का जीवन लक्ष्‍यपूर्ण है, दूसरे का लक्ष्‍यहीन ।

 

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यदि सादा जीवन जीने योग्य है तो उसे अवश्य अपनाना चाहिए- महात्मा गांधी

किसी अलग-अलग रहने वाले देश के लिए, भले वह भूविस्‍तार और जनसंख्‍या की दृष्टि से कितना भी बड़ा क्‍यों न हो, ऐसी दुनिया में जो शस्‍त्रास्‍त्रों से सिर से पांव तक लदी है और जिसमें सर्वत्र वैभव-विलास का ही वातावरण नजर आता है, ऐसा सादा जीवन जीना सम्‍भव है या नहीं-यह ऐसा सवाल है जिसमें संशयशील आदमी को अवश्‍य संन्‍देह होगा । लेकिन इसका उत्‍तर सीधा है । यदि सादा जीवन जीने योग्‍य है तो यह प्रयन्‍त भी करने योग्‍य है, चाहे वह प्रयन्‍त किसी एक ही व्‍यक्ति या किसी एक ही समुदाय द्वारा उद्योग जरूर होने चाहिये । आराम-कुर्सी वाले या हिंसा वाले समाजवाद में मेरा विश्‍वास नहीं है । मैं तो अपने विश्‍वास के अनुसार आचरण करने में मानता हूं और उसके लिए सब लोग मेरी बात मान लें तब तक ठहरना अनावश्‍यक समझता हूं । इसलिए इन प्रमुख्‍ा उद्योगों को गिनाये बिना ही मैं कह देता हूं कि जहां कहीं भी लोगों को काफी बड़ी संख्‍या में मिलकर काम करना पड़ता है वहां मैं राज्‍य की मालिकी की हिमायत करूंगा । उनकी कुशल या अकुशल मेहनत से जो कुछ उत्‍पन्‍न होगा, उसकी मालिकी राज्‍य के द्वारा उनकी ही होगी । लेकिन चूंकि मैं तो इस राज्‍य के अहिंसा पर ही आधारित होने की कल्‍पना कर सकता हूं, इसलिए मैं अमीरों से उनकी सम्‍पत्ति बलपूर्वक नहीं छीनूंगा, बल्कि उक्‍त उद्योगों पर राज्‍य की मालिकी कायम करने की प्रक्रिया में उनका सहयोग मागूंगा । अमीर हों या कंगाल, समाज में कोई भी अछूत या पतित नहीं हैं । अमीर और गरीब दोनों एक ही रोग के दा रूप हैं । और सत्‍य यह है कि कोई कैसा भी हो, हैं तो सब मनुष्‍य ही। और मैं अपना यह विश्‍वास उन सारी बर्बरताओं के बावजूद घोषित करना हूं, जो हमने भारत मे और दूसरे देशों में घटित होते देखी हैं और जिन्‍हें शायद हमें आगे और भी देखना पड़े । हम खतरों का सामना करते हुए जीना सीखें ।

 

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मुझे स्‍वीकार करना चाहिये कि बोलशेविज्‍म शब्‍द का अर्थ मैं अभी तक पूरा-पूरा नहीं समझा हूं – महात्मा गांधी

मुझे स्‍वीकार करना चाहिये कि बोलशेविज्‍म शब्‍द का अर्थ मैं अभी तक पूरा-पूरा नहीं समझा हूं। मैं इतना ही जानता हूं कि उसका उदे्श्‍य निजी सम्‍पत्ति की संस्‍था को मिटाना है। यह तो अपरिग्रह के नैतिक आदर्श को अर्थ क्षेत्र में प्रयुक्‍त करना हुआ; और यदि लोग इस आदर्श को स्‍वेच्‍छा से स्‍वीकार कर लें या उन्‍हें शांतिपूर्वक समझाया जाय और उसके फलस्‍वरूप वे उसे स्‍वीकार कर लें, तो इससे अच्‍छा कुछ हो ही नहीं सकता । लेकिन बोलेशेविज्‍म के बारे में मुझे जो कुछ जानने को मिला है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि वह न केवल हिंसा के प्रयोग का समर्थन करता है, बल्कि निजी सम्‍पति के अपहरण के लिए और उसे राज्‍य के स्‍वामित्‍व के अधीन बनाये रखने के लिए हिंसा के प्रयोग की खुली छूट देता है । और यदि ऐसा है तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बोलशेविक शासन अपने मौजूदा रूप में ज्‍यादा दिन तक नहीं टिक सकता । कारण, मेरा दृढ. विश्‍वास है कि हिंसा की नींव पर किसी भी स्‍थायी रचना का निर्माण नहीं हो सकता । लेकिन, वह जो भी हो, इसमें कोई संदेह नहीं कि बोलशेविक आदर्श के पीछे असंख्‍य पूरू षों और स्त्रियों के-जिन्‍होंने उसकी सिद्धि के लिए अपना सर्वस्‍व अर्पण कर दिया है-शुद्धतम त्‍याग का बल है; और एक ऐसा आदर्श, जिसके पीछे लेकिन जैसे महापुरूषों के त्‍याग का बल है, कभी व्‍यर्थ नहीं जा सकता । उनके त्‍याग का उज्‍जवल उदाहरण चिरकाल तक जीवित रहेगा और समय ज्‍यों-ज्‍यों बीतेगा त्‍यों-त्‍यों वह उस आदर्श को अधिकाधिक शुद्धि और वेग प्रदान करता रहेगा ।

 

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समाजवाद और साम्‍यवाद आदि पश्चिम के सिद्धांत हमारे तत्‍सम्‍बंधी विचारों से बुनियादी तौर पर भिन्‍न हैं – महात्मा गांधी

समाजवाद और साम्‍यवाद आदि पश्चिम के सिद्धांत जिन विचारों पर आधारित हैं वे हमारे तत्‍सम्‍बंधी विचारों से बुनियादी तौर पर भिन्‍न हैं । ऐसा एक विचार उनका यह विश्‍वास है कि मनुष्‍य-स्‍वभाव में मूलगामी स्‍वार्थ-भावना है। मैं इस विचार को स्‍वीकार नहीं करता; क्‍योंक मैं जानता हूं कि मनुष्‍य और पशु में यह बुनियादी फर्क है कि मनुष्‍य अपनी अंतर्हित आत्‍मा की पुकार का उत्‍तर दे सकता है, उन विकारों के ऊपर उठ सकता है जो उसमें और पशुओं में सामान्‍य रूप से पाये जाते है और इसलिए वह स्‍वार्थ-भावना और हिंसा के भी ऊपर उठ सकता है । क्‍योंकि स्‍वार्थ-भावना और हिंसा पशु-स्‍व‍भाव के अंग हैं, मनुष्‍य में अंतर्हित उसकी अमर आत्‍मा के नहीं । यह हिन्‍दू धर्म का एक बुनियादी विचार है और इस सत्‍य की शोध के पीछे कितने ही तपस्वियों की अनेक वर्षो की तपस्‍या और साधना है । यही कारण है कि हमारे यहां ऐसे संत और महात्‍मा तो हुए है, जिन्‍होने आत्‍मा के गूढ. रहस्‍यों की शोध में अपना शरीर घिसा है और अपने प्राण दिये है; परन्‍तु पश्चिम की तरह हमारे यहां ऐसे लोग नहीं हुए, जिन्‍होंने पृथ्‍वी के सुदूरतम कोनो या ऊंची चोटियों की खोज में अपने प्राणों की बलिदान किया हो । इसलिए हमारे समाजवाद या साम्‍यवाद की रचना अहिंसा के आधार पर और मजदूरों तथ‍ा पूंजीपतयों या जमींदारों तथा किसानों के मीठे सहयोग के आधार पर होनी चाहियें ।

 

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साम्यवाद का अर्थ है वर्गहीन समाज- महात्मा गांधी

साम्‍यवाद के अर्थ की छानबीन की जाय तो अन्‍त में हम इसी निश्‍चय पर पहुंचते हैं कि उसका मतलब हैं-वर्गहीन समाज । यह बेशक उत्‍तम आदर्श है और इसके लिए अवश्‍य कोशिश होनी चाहिये । लेकिन जब इस आदर्श को हासिल करने के लिए वह हिंसा का प्रयोग करने की बात करने लगता है, तब मेरा रास्‍ता उससे अलग हो जाता है । हम सब जन्‍म से समान ही हैं, लेकिन हम हमेशा से भगवान की इस इच्‍छा की अवज्ञा करते आये हैं । असमानता की या ऊंच-नीच की भावना एक बुराई है, किन्‍तु मैं इस बुराई को मनुष्‍य के मन से, उसे तलवार दिखाकर, निकाल भगाने में विशवास नहीं करता । मनुष्‍य के मन की शुद्धि के लिए यह कोई कारगर साधन नहीं है ।

 

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रूस का साम्यवाद भारत के लिए अनुपयोगी- महात्मा गांधी

रूस का समाजवाद, यानी जनता पर जबरदस्‍ती लादा जाने वाला साम्‍यवाद, भारत को रूचेगा नहीं; भारत की प्रकृति के साथ उसका मेल नहीं बैठ सकता । हां यदि साम्‍यवाद बिना किसी हिंसा के आये तो हम उसका स्‍वागत करेगें । क्‍योंकि तब कोई मनुष्‍य किसी भी तरह की सम्‍पत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्‍यथा नहीं । करोड.पति के पास उसके करोड. रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्‍हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा और सर्व-सामाम्‍य प्रयोजन के लिए आवश्‍यकता होने पर इस सम्‍पत्ति को राज्‍य अपने अधिकार में ले सकेगा ।

 

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मैं अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा- महात्मा गांधी

साम्‍यवादियों और समाजवादियों का कहना है कि आज वे आर्थिके समानता को जन्‍म देने के लिए कुछ नहीं कर सकते । वे उसके लिए प्रचार भर कर सकते है । इसके लिए लोगों में द्वेष या वैर पैदा करने और उसे बढा़ने में उनका विश्‍वास है ! उनका कहना है कि राज्‍यसत्‍ता पाने पर वे लोगों से समानता के सिद्धान्‍त पर अमल करवयेगें । मेरी योजना के अनुसार राज्‍य प्रजा की इच्‍छा को पूरा करेगा, न कि लोगों को हुक्‍म देगा या अपनी आज्ञा जबरन उन पर लादेगर । मैं घृणा से नहीं, बल्कि परन्‍तु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊंगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूंगा । मैं सारे समाज को अपने मत का बनाने तक रूकूंगा नहीं, बल्कि मैं 50 मोटरों का तो क्‍या, 10 बीघा जमीन का भी मालिक हूं, तो अपनी कल्‍पना की आर्थिक समानता को जन्‍म नहीं दे सकता । उसके लिए मुझे गरीब बन जाना होगा । यही मैं पिछले 50 सालों से या उससे भी ज्‍यादा वक्‍त से करता आया हूं ।

 

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मैं पक्‍का कम्‍युनिस्‍ट होने का दावा करता हूं – महात्मा गांधी

इसीलिए मैं पक्‍का कम्‍युनिस्‍ट होने का दावा करता हूं । अगरचे मैं धनवानों द्वारा दी गई मोटरों या दूसरे सुभीतों से फायदा उठाता हूं, मगर मैं उनके वश में नहीं हूं । अगर आम जनता के हितों का वैसा तकाजा हुआ, तो बात की बात में मैं उनको अपने से दूर हटा सकता हूं ।

 

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हममें विदेशों दान के बजाय धरती जो कुछ पैदा करती हो उस पर ही अपना निर्वाह कर सकने की योग्‍यता और साहस होना चाहिये – महात्मा गांधी

हममें विदेशों दान के बजाय हमारी धरती जो कुछ पैदा करती कर सकती हो उस पर ही अपना निर्वाह कर सकने की योग्‍यता और साहस होना चाहिये । अन्‍यथा हम एक स्‍वतंत्र देश की तरह रहने के हकदार न होंगे । यही बात विदेशी विचारधाराओं के लिए भी लागू होती है । मैं उन्‍हें उसी हद तक स्‍वीकार करूंगा जिस हद तक मैं उन्‍हें हजम कर सकता हूं और उनमें परिस्थितियों के अनुरूप फर्क कर सकता हूं । लेकिन मैं उनमें बह जाने से इनकार करूंगा ।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

सम्पर्क-सूत्र- 09404955338, 09415777229

पत्राचार का पता- सी- 29, स्वराज्य नगर, पनकी, कानपुर- 208020, उत्तर प्रदेश

E-mail- dr.yadav.yogendra@gandhifoundation.net;             dr.yogendragand...

 

हमने वैज्ञानिक समाजवाद की भावना भुला दी है- महात्मा गांधी

पूंजीपतियों द्वारा पूंजी के दुरूपयोग की बात लोगों के ध्यान में आयी, तब समाजवाद का जन्म हुआ यह ख्याल गलत है। जैसा कि मैंने पहले भी प्रतिपादित किया है समाजवाद, और उसी तरह साम्यवाद भी, ईशोपनिषद् के पहले श्लोक में स्पष्ट रूप से मिल जाता है। हां, यह बात सही है कि जब कुछ सुधारकों ने हृदय -परिवर्तन की क्रिया द्वारा आदर्श सिद्ध करने की प्रणाली में विश्वास खो दिया, तब जिसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है उसकी पद्धति ढूंढ़ी गयी। मैं उसी समस्या को हल करने में लगा हुआ हूं, जो वैज्ञानिक समाजवादियों के सामने है। अलबत्ता, काम का मेरा ढंग शुद्ध अहिंसा के अनुसार प्रयत्न करने का है। यह हो सकता है कि मैं इस सिद्धांत का, जिसमें मेरा विश्वास प्रतिदिन बढ़ रहा है, अच्छा व्याख्याता न होऊं। अखिल भारत चरखा-संघ और अखिल भारत ग्रामोद्योग-संघ ऐसी संस्थायें हैं, जिनके द्वारा अहिंसा की कार्य-पद्धति का अखिल भारतीय पैमाने पर प्रयोग किया जा रहा है। वे कांग्रेस के द्वारा बनायी ऐसी स्वतंत्र संस्थाएं हैं, जिनका उद्देश्य कांगे्रस जैसी लोकतांत्रिक संस्था की नीति में हमेशा जिन परिवर्तनों के होने की संभावना है उन परिवर्तनों से बंधे बिना मुझे अपने प्रयोग अपनी इच्छा के अनुसार करते रहने का मौका देना है।

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

गॉंधी रिसर्च फाऊंडेशन, जैन हिल्स, जलगॉंव, महाराष्ट्र

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सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ है – महात्मा गांधी

सच्चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्त हुआ है, जो हमें यह सिखा गये हैं कि ‘सब भूमि गोपाल की है, इसमें कहीं मेरी और तेरी की सीमायें नहीं है। ये सीमायें तो आदमियों ने बनायी हैं और इसलिए वे इन्हें तोड़ भी सकते हैं। गोपाल यानी कृष्ण यानी भगवान। आधुनिक भाषा मंे गोपाल यानी राज्य यानी जनता। आज ज़मीन जनता की नहीं है, यह बात सही है। पर इसमें दोष उस शिक्षा का नहीं है। दोष तो हमारा है जिन्होंने उस शिक्षा के अनुसार आचरण नहीं किया। मुझे इसमें कोई संदेह नहीं कि इस आदर्श को जिस हद तक रूस या और कोई देश पहुंच सकता है उसी हद तक हम भी पहुंच सकते हैं, और वह भी हिंसा का आश्रय लिये बिना। पंूजीवालों से उनकी पंूजी हिंसापूर्वक छीनी जाय, इसके बजाय यदि चरखा और उसके सारे फलितार्थ स्वीकार कर लिये जायेें तो वही काम हो सकता है। चरखा हिंसक अपहरण की जगह ले सकने वाला अत्यंत प्रभावकारी साधन है। जमीन और दूसरी सारी संपत्ति उसकी है, जो उसके लिए काम करे। दुःख इस बात का है कि किसान और मजदूर या तो इस सरल सत्य को जानते नहीं है, या यों कहो कि उन्हें इसे जानने नहीं दिया गया है।2

 

प्रो. डॉ. योगेन्द्र यादव

वरिष्ठ गॉंधीयन स्कालर

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कमजोर-से-कमजोर के प्रति हम जोर-जबरदस्ती से सामाजिक न्याय का पालन नहीं कर सकते – महात्मा गांधी

मैं सदा से यह मानता आया हूं कि नीचे-से-नीचे और कमजोर-से-कमजोर के प्रति हम जोर-जबरदस्ती से सामाजिक न्याय का पालन नहीं कर सकते। मैं यह भी मानता आया हूं कि पतित-से-पतित लोगों को भी मुनासिब तामील दी जाये, तो अहिंसक साधनों द्वारा सब प्रकार के अत्याचारों का प्रतिकार किया जा सकता है। अहिंसक असहयोग ही उसका मुख्य साधन है। कभी-कभी असहयोग भी उतना ही कर्तव्य-रूप हो जाता है जितना कि सहयोग। अपनी विफलता या गुलामी मे खुद सहायक होने के लिए कोई बंधा हुआ नही है। जो स्वतंत्रता दूसरांे के प्रयत्नों द्वारा-फिर वे कितने ही

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